78 बंदूकें, 13 हजार कारतूस और 8 महीने की खामोशी सब सही फिर भी जमा नहीं,सत्यापन बार-बार…जब सब कुछ सही है तो डर किस बात का? प्रशासन क्यों टाल रहा आर्म्स जमा?

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78 बंदूकें, 13 हजार कारतूस और 8 महीने की खामोशी सब सही फिर भी जमा नहीं,सत्यापन बार-बार…जब सब कुछ सही है तो डर किस बात का? प्रशासन क्यों टाल रहा आर्म्स जमा?
कटनी।। एमपी के कटनी में आर्म्स जैसे बेहद संवेदनशील मामले पर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां पूर्व आर्म्स डीलर का स्टॉक दो बार सही पाया गया, लेकिन प्रशासन आज तक उसे नजरात में जमा नहीं करा सका। जब सत्यापन पूरा है, स्टॉक सही है, तो फिर देरी क्यों? क्या आर्म्स का यह मामला सिर्फ फाइलों में उलझ कर रह गया है? प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है। दो बार भौतिक सत्यापन, सब कुछ सही…फिर भी 78 बंदूकें और 13 हजार कारतूस आज तक सरकारी नजरात में जमा नहीं हो पाए। भट्ठा मोहल्ला स्थित पूर्व आर्म्स डीलर नाजिम खान के कार्यालय पर जिला स्तरीय संयुक्त जांच दल पहुंचा था। कलेक्टर के निर्देश पर एसडीएम, सीएसपी और राजस्व विभाग की टीम ने करीब तीन घंटे तक बंदूकों और कारतूस का भौतिक सत्यापन किया। इस दौरान 78 बंदूकें और 13 हजार से अधिक कारतूस दस्तावेजों के अनुसार पूरी तरह सही पाए गए। जांच के बाद पंचनामा तैयार कर रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपी जा रही है।
जिले में आर्म्स जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय पर जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली चौंकाने वाली तस्वीर पेश कर रही है। आमतौर पर आर्म्स लाइसेंस, बंदूक और कारतूस से जुड़े मामलों में प्रशासन अत्यधिक सतर्कता बरतता है, लेकिन कटनी में पूर्व आर्म्स डीलर नाजिम खान का मामला इस स्थापित धारणा को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। पूर्व आर्म्स डीलर नाजिम खान ने करीब दो वर्ष पूर्व, 19 दिसंबर 2023 को आर्म्स व्यापार बंद कर दिया था। इसके बाद 25 सितंबर 2024 को उन्होंने विधिवत रूप से जिला कलेक्टर को आवेदन देकर अपना आर्म्स लाइसेंस सरेंडर करने और शेष बची बंदूकें एवं कारतूस नजरात शाखा में जमा करने की अनुमति मांगी। इस आवेदन पर 8 अक्टूबर 2024 को कलेक्टर द्वारा कारतूस जमा करने की अनुमति भी दे दी गई, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि ठीक अगले दिन 9 अक्टूबर 2024 को यह आदेश यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया कि बिना भौतिक सत्यापन के इतनी संवेदनशील सामग्री जमा कराना उचित नहीं है। यह निर्णय प्रशासनिक दृष्टि से सही माना गया।
आठ माह बाद पहली जांच, फिर भी अनुमति नहीं
इस आदेश के बाद करीब आठ महीने तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अंततः 14 मई 2025 को कलेक्टर के निर्देश पर पहली बार नाजिम खान के आर्म्स स्टॉक का भौतिक सत्यापन कराया गया। जांच में बंदूकें और कारतूस पूरी तरह दस्तावेजों के अनुरूप और सही पाए गए। इसके बावजूद सवाल यह है कि जब भौतिक सत्यापन में कोई गड़बड़ी नहीं मिली, तो फिर बंदूक और कारतूस को नजरात शाखा में जमा कराने की अनुमति क्यों नहीं दी गई? सत्यापन के बाद भी प्रशासन की निष्क्रियता आज तक बनी हुई है।
बार-बार आवेदन, लेकिन नतीजा शून्य
भौतिक सत्यापन के कई महीनों बाद भी जब कोई अनुमति नहीं मिली तो नाजिम खान ने 6 नवंबर 2025 को एक बार फिर कलेक्टर को आवेदन देकर स्टॉक जमा कराने की मांग की। बावजूद इसके, प्रशासन की ओर से कोई निर्णायक कदम सामने नहीं आया।
8 जनवरी 2026 को फिर हुआ भौतिक सत्यापन
लगातार उठते सवालों और आवेदनों के बाद आज 8 जनवरी 2026 को एक बार फिर जिला स्तरीय संयुक्त जांच दल नाजिम खान के भट्ठा मोहल्ला स्थित निवास/कार्यालय पहुंचा। करीब 3 घंटे चली जांच में एसडीएम, सीएसपी सहित राजस्व विभाग की टीम ने बंदूकों और कारतूस का दस्तावेजी मिलान करते हुए भौतिक सत्यापन किया। एसडीएम प्रमोद चतुर्वेदी ने बताया कि पूर्व आर्म्स डीलर द्वारा लंबे समय से लाइसेंस सरेंडर का आवेदन दिया जा रहा था, उसी क्रम में यह सत्यापन किया गया। जांच के दौरान 78 बंदूकें और 13 हजार से अधिक कारतूस पूरी तरह सही पाए गए। मौके पर पंचनामा तैयार कर रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपने की प्रक्रिया की गई है।

सब सही, फिर भी जमा क्यों नहीं?
अब सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि जब दो बार भौतिक सत्यापन में सारा स्टॉक सही पाया गया, तो फिर जिला प्रशासन बंदूकें और कारतूस नजरात शाखा में जमा कराने में रुचि क्यों नहीं दिखा रहा? क्या यह केवल फाइलों में चल रही प्रक्रिया है या फिर कोई ऐसी प्रशासनिक उदासीनता है, जो भविष्य में गंभीर खतरे का कारण बन सकती है? आर्म्स और कारतूस जैसे संवेदनशील विषय पर बार-बार सत्यापन तो किया जा रहा है, लेकिन अंतिम और सबसे जरूरी कदम सुरक्षित रूप से सरकारी नजरात में जमा कराना अब भी अधूरा है। यह स्थिति न केवल सवाल खड़े करती है, बल्कि प्रशासन की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता पर भी गंभीर टिप्पणी करती है। अब क्या दूसरी बार सत्यापन के बाद जिला प्रशासन वास्तव में ठोस निर्णय लेगा, या फिर यह भौतिक सत्यापन भी केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगा। आर्म्स जैसे बेहद संवेदनशील मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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