MP के इस जिलेमें No Call resiv का कल्चर : मुखिया से चाकर तक फैली बीमारी

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भोपाल । मध्यप्रदेश सहित पूरे देश में विजन 2047 को लेकर सरकार आगे बढ़ रही है, वहीं जिले के नौकरशाह बेलगाम हो चुके हैं, सरकारी खर्चे पर मिले मोबाइल नंबरों को ‘‘नो रिसीव कॉल’’ की आदत लगभग ने डाल रखी है, आदिवासी जिले की लगभग जनता इस परिपाटी से आजिज हो चुकी है, इस पर मोहन सरकार के नये आदेश भी बेअसर दिख रहे हैं।
शहडोल के अधिकांश सरकारी अधिकारी-कर्मचारी जनहितैषी होने की बात तो करते हैं पर उनका बर्ताव बिल्कुल उलट होता है। ज्यादातर अधिकारी आमजंसरकारी काम-काज समय सीमा में नहीं होने से आम लोगों को बड़ी परेशानी उठानी पड़ रही है। इस पर सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों का रवैया और भारी पड़ रहा है। सरकार की मंशा है कि सभी सरकारी योजनाएं और सुविधाएं लोगों तक आसानी पहुंचे। इसके ज्यादातर सुविधाओं को ऑनलाइन किया गया है। अधिकारियों के कारनामें इतने अच्छे हैं कि जवाबदेही से बचने के लिए अधिकारी फोन उठाने से बचते हैं, सुविधाओं को आनलाइन करने के पीछे लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने और दलालों के चंगुल में फंसने से बचाना मुख्य ध्येय है, लेकिन सरकार की इस मंशा पर अधिकारी-कर्मचारी पानी फेर रहे हैं।

समस्याओं को दूर करने से परहेज

आम तौर पर सरकारी नुमाइन्दों का मुख्य काम लोगों को सुविधा पहुंचाने का होता है। व्यवस्था अनुसार लोगों की समस्याओं को दूर करना इनकी जिम्मेदारी होती है, लेकिन वर्तमान में अधिकारी-कर्मचारी जवाबदारियों से बचने ड्यूटी के नाम पर समय ही काटते हैं। वैसे तो ये खुद को इतना व्यस्त जताते हैं कि अपनी समस्यायों और परेशानियों को लेकर फोन करने वाले लोगों की कॉल तक रिसीव नहीं करते। कई बार लोग अपने कामों के संदर्भ में जानकारी लेने के लिए अधिकारियों व संबंधित कर्मचारियों को फोन लगाते हैं, लेकिन मजाल है कि कुछ अधिकारी-कर्मचारी फोन रिसीव कर संबंधित व्यक्ति की समस्या का समाधान कर दे या परामर्श दे दे। दफ्तर के बाबू से लेकर अधिकारी आम लोगों का फोन रिसीव नहीं करते।

दोबारा नहीं होता कॉल

अगर आप मुसीबत में हैं तो सरकारी सीयूजी नंबर डायल न करें। मुसीबत पडऩे पर अफसरों तक के सरकारी सीयूजी नंबर नहीं उठते। ये हाल किसी एक दिन का नहीं हर रोज यही होता है। आलम यह है कि जिले के आला अफ्सर भी अपना सरकारी फोन नहीं उठाते। आला अधिकारियों को जनसमस्याओं के निराकरण के लिए सरकार द्वारा फ्री नम्बर दिया गया है। इस नम्बर पर न ही अधिकारियों को अपने पास से रिचार्ज करवाना होता है और न ही अपने पास से आउटगोइंग एवं इनकमिंग के लिए कोई चार्ज देना होता है। इसके बावजूद भी जिले के अधिकारी फोन उठाने और दोबारा काल करने से कतराते हैं। सवाल पैदा होता है कि आखिर ये किस तरीके से समाज एवं जनता के हितार्थ अपनी सेवायें दे सकेंगे।

अधिकारियों का अडिय़ल रवैया

अधिकांश सरकारी अधिकारी-कर्मचारी जनहितैषी होने की बात तो करते हैं पर उनका बर्ताव बिल्कुल उलट होता है। ज्यादातर अधिकारी आमजनों का मोबाइल तक नहीं उठाते। सरकार के प्राय: सभी विभागों के अधिकांश कार्यालयों में अधिकारियों के अडिय़ल रवैये और मनमानी के कारण आम जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, सही तरीके से जानकारी उपलब्ध कराना सरकार की कार्यक्रमों और योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाना अधिकारियों का दायित्व है, लेकिन अधिकारी फोन उठाना तो दूर जनता का काम करने से भी कतराते हैं, जबकि हर विभाग दफ्तरों में सरकारी फोन से लेकर उच्चाधिकारियों व प्रभारी अधिकारियों को सरकारी मोबाइल भी उपलब्ध रहता है और ये नंबर वेबसाइट में भी प्रदर्शित होता है, ऐसे में जरूरत में सुझाव या समस्या समाधान के लिए अगर आम आदमी फोन करे तो, उस पर रिस्पांस कर उक्त व्यक्ति की समस्या सुनना और समाधान बताना भी अधिकारियों की ड्यूटी है, लेकिन जिले में पुलिस-प्रशासन के कई अधिकारी आमलोगों और मीडिया के फोन उठाने से परहेज करते हैं।

प्रेसवार्ता में उठा था मुद्दा

जिले के नौकरशाह बेलगाम हो चुके हैं, ग्राम पंचायत के सचिव से लेकर जिले के मुखिया आमजनों और मीडिया से दूरी बनाकर रखते हैं, जनसुनवाई में समस्याओं को सुना तो जाता है, लेकिन उस समस्या समाधान की जानकारी अगर फरियादी लेना चाहे तो, दूर-दराज से लोगों को जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ती है, वहीं अगर मीडिया किस मामले में अधिकारियों सहित जिले के मुखिया का पक्ष जानने का प्रयास करे तो, वह फोन रिसीव करना अपनी सान के खिलाफ समझते हैं, बीते दिनों उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने जिले के भ्रमण के दौरान प्रेसवार्ता की थी, जिसमें यह मुद्दा उठा था, लेकिन श्री शुक्ल ने इसके बाद अधिकारियों को क्या आदेश दिया, यह तो वही जाने, लेकिन अधिकारियों का रवैया बदला नहीं है।

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