फिर वही सचिव और एक नया कारनामा
सुधीर कुमार यादव (9407070722)
शहडोल। जिले की पंचायत व्यवस्था इन दिनों सवालों के घेरे में है। ग्रामीण विकास और पारदर्शिता का दावा करने वाली व्यवस्था में लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जो न केवल नियमों की अनदेखी को उजागर करती हैं बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। ताजा मामला जिले के सिंहपुर का है जहां सरकारी पानी की टंकी को निजी कंपनी के विज्ञापन का माध्यम बना दिया गया।
सिंहपुर पानी टंकी पर Jk Super Cement का विज्ञापन
सिंहपुर ग्राम पंचायत की सरकारी पानी की टंकी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। दरअसल, इस सरकारी संरचना पर बिना किसी अनुमति और पंचायत की सहमति के निजी कंपनी Jk Super Cement का विज्ञापन पेंट कर दिया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह कार्य पंचायत सचिव और कंपनी एजेंट की मिलीभगत से हुआ है, क्योंकि बिना प्रशासनिक अनुमति ऐसा संभव नहीं है।
पानी की टंकी गांव की जीवनरेखा कही जाती है। इसके जरिए सैकड़ों परिवारों तक पेयजल आपूर्ति होती है। ऐसे में इस संरचना को विज्ञापन का माध्यम बना देना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सरकारी संपत्ति के निजीकरण की मानसिकता को भी उजागर करता है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत की बैठक में इस तरह की अनुमति देने का कोई प्रस्ताव नहीं आया और न ही पंचायत कार्यालय में विज्ञापन शुल्क जमा होने का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध है।
सूत्रों का दावा है कि यह काम पंचायत सचिव की मौन सहमति से हुआ है, संभवतः निजी लाभ के लिए।
पूर्व में गोरतरा तालाब खुदाई भी विवादों मे थी
यही पंचायत सचिव पूर्व में गोरतरा ग्राम पंचायत में भी पदस्थ थे। वहां भी नियमों को दरकिनार करने के आरोप लगे थे। गोरतरा के खसरा नंबर 111 पर स्थित पुराने तालाब की खुदाई का कार्य किया था। ग्रामवासियों ने आरोप लगाया था कि तालाब की खुदाई का कार्य पंचायत द्वारा जेसीबी मशीन लगाकर कराया गया था , जबकि इस कार्य के लिए न तो जनपद पंचायत सोहागपुर से एस्टीमेट स्वीकृत था और न ही तकनीकी अनुमति (टेक्निकल सैक्शन) प्राप्त था।
नियम और पारदर्शिता पर उठे सवाल
पंचायत राज अधिनियम के तहत किसी भी सरकारी भवन, संरचना या भूमि पर काम करने से पहले पंचायत की आमसभा की स्वीकृति और उच्च अधिकारियों की अनुमति अनिवार्य है। वहीं, मनरेगा जैसी योजनाओं का स्पष्ट उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराना है। लेकिन सिंहपुर और गोरतरा के इन मामलों में नियमों को दरकिनार कर सीधे निजी स्वार्थ और सुविधा के अनुसार निर्णय लिए गए।
ग्रामीणों का कहना है कि यह घटनाएं भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण हैं। एक ओर सरकारी संपत्तियों को निजी कंपनियों के विज्ञापन के लिए सौंपा जा रहा है, तो दूसरी ओर मजदूरों को काम देने की बजाय मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे पंचायत व्यवस्था की गरिमा और पारदर्शिता दोनों पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
ग्रामीणों की मांग और प्रशासन की जिम्मेदारी
सिंहपुर में ग्रामीणों ने मांग की है कि जिला प्रशासन तत्काल जांच टीम गठित कर मामले की पड़ताल करे और यदि यह विज्ञापन अवैध पाया जाता है तो कंपनी और पंचायत सचिव दोनों पर कड़ी कार्रवाई हो।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में पंचायतें अपने अधिकार और गरिमा खो देंगी और सरकारी संपत्तियां निजी कंपनियों या अधिकारियों के निजी लाभ का साधन बन जाएंगी।
निष्कर्ष
सिंहपुर और गोरतरा की ये दोनों घटनाएं पंचायत व्यवस्था के लिए चेतावनी हैं। ये सवाल उठाती हैं कि आखिर किस आधार पर सरकारी संपत्तियों का दुरुपयोग किया जा रहा है? क्या पंचायत सचिव और अधिकारी अपने निजी फायदे के लिए जनता की संपत्ति का सौदा कर रहे हैं? प्रशासन की जिम्मेदारी है कि इन मामलों को गंभीरता से लेते हुए पारदर्शिता और जिम्मेदारी की मिसाल कायम करे, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी या कंपनी इस तरह की मनमानी न कर सके।