आरटीआई कानून का मज़ाक: 30 दिन बीते, पर पंचायत सचिव को आवेदन देखने की फुर्सत नहीं

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(मोहम्मद शाकिब खान, मुख्य संवाददाता, गौरेला)

ग्राम पंचायत गोरखपुर का मामला: 15वें वित्त आयोग और विकास कार्यों के खर्चों का मांगा गया था हिसाब, सचिव कविता राठौर की मनमानी के खिलाफ अब प्रथम अपील दर्ज।

 

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही:

शासन की योजनाओं में पारदर्शिता लाने के लिए बनाए गए सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की ग्राम पंचायत स्तर पर किस कदर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, इसका एक ताजा उदाहरण गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के ग्राम पंचायत गोरखपुर में सामने आया है। यहां की पंचायत सचिव कविता राठौर को आरटीआई आवेदन का जवाब देना तो दूर, उसे देखने तक का समय नहीं है।

 

क्या है पूरा मामला?

दिनांक 19 मार्च 2026 को ऑनलाइन आरटीआई पोर्टल के माध्यम से ग्राम पंचायत गोरखपुर की सचिव व जन सूचना अधिकारी कविता राठौर से वर्ष 2024-2026 के बीच हुए विकास कार्यों, आय-व्यय की जानकारी और 15वें वित्त आयोग के तहत प्राप्त राशि व खर्चों (एमबी रिकॉर्ड सहित) की प्रमाणित जानकारी मांगी गई थी। आरटीआई अधिनियम के नियमानुसार 30 दिन के भीतर जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है। लेकिन एक माह बीत जाने के बाद भी पोर्टल पर आवेदन की स्थिति केवल ‘Under Process’ ही दिखाई दे रही है।

 

सचिव का हैरान करने वाला जवाब:

आरटीआई की निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के बाद जब जन सूचना अधिकारी (सचिव) से दूरभाष पर संपर्क कर जानकारी न मिलने का कारण पूछा गया, तो उनका रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना रहा। सचिव ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि अन्य शासकीय कार्यक्रमों में व्यस्तता के कारण उन्होंने अब तक यह आवेदन देखा ही नहीं है।

 

एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी का यह बयान न केवल आरटीआई कानून के मूल उद्देश्यों का खुला उल्लंघन है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। लाखों रुपये के विकास कार्यों की जानकारी देने से इस तरह का कतराना पंचायत के कामकाज में किसी बड़ी गड़बड़ी को छिपाने के संदेह को भी जन्म देता है।

 

अब उच्चाधिकारी से कार्रवाई की मांग:

जन सूचना अधिकारी की इस घोर लापरवाही और मनमानी के खिलाफ अब जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) के समक्ष ऑनलाइन प्रथम अपील दर्ज कर दी गई है। इस अपील में स्पष्ट मांग की गई है कि आरटीआई अधिनियम की धारा 7(6) के तहत अब चाही गई संपूर्ण जानकारी निःशुल्क उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही, पदीय कर्तव्यों में लापरवाही बरतने और जानबूझकर जानकारी रोकने के लिए सचिव पर धारा 20(1) के तहत दंडात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की भी मांग की गई है।

 

इस पूरे प्रकरण ने स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब देखना यह है कि जनपद स्तर के आला अधिकारी आरटीआई एक्ट के इस मज़ाक पर क्या संज्ञान लेते हैं और जिम्मेदार सचिव पर क्या कार्रवाई होती है।

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