कटघरे में खाकी: जमीन सौदे से शुरू हुई कहानी अब भ्रष्टाचार की धाराओं तक पहुंची नेहा पच्चीसिया की अग्रिम जमानत पर 29 अगस्त को फैसला; तीन घंटे की अदालती बहस के बाद मामला टला—SIT के हाथ लगे बयानों, बैंक लेनदेन और दस्तावेजों की कड़ियां खंगालने में जुटी; मारूफ अहमद की जमानत अर्जी अब तक क्यों नहीं, यह भी बना बड़ा सवाल

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कटघरे में खाकी: जमीन सौदे से शुरू हुई कहानी अब भ्रष्टाचार की धाराओं तक पहुंची
नेहा पच्चीसिया की अग्रिम जमानत पर 29 अगस्त को फैसला; तीन घंटे की अदालती बहस के बाद मामला टला—SIT के हाथ लगे बयानों, बैंक लेनदेन और दस्तावेजों की कड़ियां खंगालने में जुटी; मारूफ अहमद की जमानत अर्जी अब तक क्यों नहीं, यह भी बना बड़ा सवाल
कभी कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाली पुलिस अधिकारी आज खुद कानून की कसौटी पर खड़ी हैं। कटनी का बहुचर्चित जमीन सौदा मामला अब महज एक विवादित रजिस्ट्री का प्रकरण नहीं रह गया है। इसकी परतें खुलते-खुलते कथित दबाव, करोड़ों की जमीन, संदिग्ध वित्तीय लेनदेन, पुलिस कार्रवाई, पद के कथित दुरुपयोग और अब भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं तक पहुंच चुकी हैं।
मामले में निलंबित तत्कालीन CSP नेहा पच्चीसिया की मुश्किलें इसलिए भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं क्योंकि जिला न्यायालय में दायर अग्रिम जमानत याचिका पर मंगलवार को करीब तीन घंटे तक बहस हुई, लेकिन अदालत ने तत्काल कोई राहत नहीं दी। अब इस हाईप्रोफाइल प्रकरण में 29 अगस्त का दिन बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुश्री लीला लोधी की अदालत में नेहा पच्चीसिया और क्षितिज राज बारापात्रे की ओर से प्रस्तुत अग्रिम जमानत याचिकाओं पर दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला टल गया। अब अगली सुनवाई पर अदालत का रुख इस मामले की आगे की कानूनी दिशा तय करेगा।

कटनी। मध्यप्रदेश के कटनी से उठी जमीन सौदे की वह कहानी, जिसने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली, कथित पद के दुरुपयोग और करोड़ों की जमीन के लेनदेन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, अब अदालत और जांच एजेंसियों के अगले कदम पर आकर टिक गई है। मामले में निलंबित तत्कालीन CSP नेहा पच्चीसिया की अग्रिम जमानत याचिका पर मंगलवार को प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुश्री लीला लोधी की अदालत में करीब तीन घंटे तक बहस चली, लेकिन तत्काल कोई फैसला नहीं हो सका। अब अगली सुनवाई 29 अगस्त को निर्धारित की गई है।
यह महज किसी जमीन की रजिस्ट्री का विवाद नहीं रह गया है। FIR के बाद जिस तरह जांच का दायरा बढ़ा है, उससे प्रकरण अब कथित जमीन सौदे से आगे बढ़कर पद के कथित दुरुपयोग, पैसों के लेनदेन, पुलिस कार्रवाई और भ्रष्टाचार के आरोपों तक पहुंच गया है। पुलिस ने विवेचना के दौरान भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 12 और 13 भी प्रकरण में जोड़ी हैं।

तीन घंटे की बहस, लेकिन फैसला नहीं
मंगलवार को अदालत में नेहा पच्चीसिया और क्षितिज राज बारापात्रे की ओर से पेश अग्रिम जमानत याचिकाओं पर दोनों पक्षों ने विस्तृत दलीलें रखीं। करीब तीन घंटे चली सुनवाई के बाद अदालत ने तत्काल आदेश नहीं दिया। अब 29 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं। यानी फिलहाल नेहा पच्चीसिया को अदालत से वह अंतरिम राहत नहीं मिली है, जिसकी उम्मीद गिरफ्तारी की आशंका के बीच की जा रही थी। हालांकि, अंतिम निर्णय न्यायालय के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।

एक जमीन, तीन नाम और पैसों की उलझी कड़ी
पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी कन्हवारा क्षेत्र की उस जमीन को माना जा रहा है, जिसकी सरकारी गाइडलाइन कीमत जांच रिपोर्टों में करीब 82.86 लाख रुपये बताई गई है, जबकि रजिस्ट्री करीब 18.20 लाख रुपये में होने का आरोप है। शिकायत में जमीन का सौदा करीब 1.07 करोड़ रुपये में तय होने का भी दावा किया गया है। इन आरोपों की जांच अभी जारी है। जांच में बैंक खातों के लेनदेन ने भी इस कहानी को और पेचीदा बनाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, रजिस्ट्री के समय जमीन के खरीदार के खाते में रकम दूसरे खातों से पहुंची थी और क्षितिज राज बारापात्रे के खाते से भी राशि ट्रांसफर होने की बात जांच में सामने आई है। यही वह बिंदु है जहां जांच का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—जमीन जिसके नाम हुई, भुगतान किसके माध्यम से हुआ और इस पूरे सौदे में किसकी वास्तविक भूमिका थी। इस सवाल का अंतिम उत्तर जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

मारूफ अहमद की जमानत अर्जी क्यों नहीं
मामले में नेहा पच्चीसिया और क्षितिज राज बारापात्रे की ओर से अग्रिम जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है। वहीं तीसरे आरोपी मारूफ अहमद हनफी की ओर से अब तक अग्रिम जमानत याचिका सामने नहीं आने का मुद्दा भी चर्चा में है। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है.क्या तीनों की कानूनी रणनीति अलग-अलग है. क्या मारूफ की भूमिका को लेकर कोई अलग परिस्थिति है. या फिर आने वाले दिनों में उसकी ओर से भी अदालत का रुख किया जाएगा। इन सवालों का जवाब अभी सामने नहीं आया है। इसलिए इस पहलू पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय इसे जांच और आगामी न्यायिक कार्रवाई के संदर्भ में देखना जरूरी है।
SIT ने खोली जांच की नई परतें
FIR के बाद मामले की जांच के लिए SIT गठित की गई है और जबलपुर की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अंजना तिवारी को विवेचना की जिम्मेदारी सौंपी गई है। SIT ने न्यायालय की अनुमति के बाद जेल में बंद आकाश लोधी और रमेश लोधी के बयान दर्ज किए हैं। अब इन बयानों का मिलान दस्तावेजों, बैंक लेनदेन, डिजिटल साक्ष्यों और पहले दर्ज बयानों से किया जा रहा है। जांच की दिशा अब सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि जमीन किसके नाम हुई। असली सवाल यह है कि सौदे की शुरुआत किसने की, दबाव किसने बनाया,रकम किसने उपलब्ध कराई, रजिस्ट्री किसके निर्देश या प्रभाव में हुई और पुलिस की कार्रवाई तथा जमीन सौदे के बीच कोई संबंध था या नहीं। यही सवाल इस पूरे प्रकरण की असली धुरी बन चुके हैं।

सील कार्यालय भी जांच की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा
तत्कालीन CSP कार्यालय को सील किए जाने के बाद वहां मौजूद फाइलों, रजिस्टरों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की जांच SIT द्वारा की जानी है। जांच टीम यह भी देख रही है कि जमीन विवाद अथवा संबंधित आपराधिक प्रकरण से जुड़े कोई विभागीय पत्राचार, दस्तावेज या डिजिटल रिकॉर्ड वहां मौजूद हैं या नहीं। CCTV फुटेज, बैंक रिकॉर्ड और दस्तावेजों को आपस में जोड़कर घटनाक्रम की टाइमलाइन तैयार करना भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जा रहा है।

जिस पुलिस अधिकारी के हाथ में कानून था, अब उसी मामले में कानून का फैसला बाकी
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है।
जिस अधिकारी के पद और अधिकार को लेकर शिकायत में कथित दबाव के आरोप लगाए गए, वही अधिकारी आज स्वयं एक आपराधिक प्रकरण में आरोपी हैं और गिरफ्तारी से राहत के लिए न्यायालय की शरण में हैं। सरकार पहले ही निलंबन की कार्रवाई कर चुकी है और FIR के बाद पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए निलंबन की कार्रवाई की थी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर केवल तीन आरोपियों की कानूनी स्थिति तक सीमित नहीं है। यह सवाल सीधे उस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ता है जिसमें पुलिस अधिकारी को आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा करनी होती है।

29 अगस्त अब सिर्फ जमानत का दिन नहीं
29 अगस्त को अदालत में क्या होता है, यह इस प्रकरण की अगली दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव होगा। क्या नेहा पच्चीसिया और क्षितिज राज को अग्रिम जमानत मिलेगी,क्या अदालत जांच की प्रकृति को देखते हुए राहत से इनकार करेगी,
क्या SIT की जांच में और नाम सामने आएंगे,
क्या बैंक लेनदेन और कथित जमीन सौदे के बीच की पूरी कड़ी सामने आएगी और सबसे अहम क्या जांच यह स्पष्ट कर पाएगी कि इस पूरे सौदे के पीछे वास्तविक रूप से कौन-कौन लोग थे। इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।
फिलहाल कटनी का यह प्रकरण एक ऐसी जांच में बदल चुका है, जिसमें जमीन की कीमत से कहीं बड़ा सवाल पुलिस की साख का है। और यही वजह है कि 29 अगस्त की सुनवाई पर सिर्फ कटनी ही नहीं, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश की नजरें टिकी हैं।

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