कौन है यह सतीश, जिसके सामने बौने नजर आ रहे प्रभारी और एसडीओपी?
मूल प्रभारी गायब, फिर भी थाने में
तीन-तीन प्रभारी! अब जो वर्दी बोले,
वही सही?
शहडोल। शहर में इन दिनों एक नाम की खूब चर्चा है—सतीश। बताया जा रहा है कि साहब पुलिस कप्तान के खास माने जाते हैं। चर्चा तो यहां तक है कि खास होने के बाद अब किसी काम के लिए उन्हें थाना प्रभारी, एसडीओपी या किसी अन्य अधिकारी के आदेश की भी आवश्यकता नहीं रह गई है। ऐसे में उन्हें रिकॉर्ड का प्रभारी कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति भी न हो!
किसी थाने में एक और वर्दीधारी की जय-जयकार सुनाई दे रही है। रेत से लेकर गिट्टी, पत्थर और कथित तौर पर सीधे डीलिंग तक—हर तरफ उनका ही जलवा बताया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि उनकी जय-जय का दायरा इतना बड़ा है कि पूर्व पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी किया गया तबादले का आदेश भी उनके सामने बेअसर साबित हो गया।
वैसे नियम-कायदे और शासन की गाइडलाइन के हिसाब से देखा जाए तो यहां मूल रूप से कोई भी प्रभारी नहीं है। लेकिन मजे की बात यह है कि मूल प्रभारी की गैरमौजूदगी में भी तीन-तीन प्रभारी दिखाई दे रहे हैं।
पहला प्रभारी—जिसे कथित तौर पर मौखिक आदेश के सहारे बैठाया गया है।
दूसरा प्रभारी—जो खुद को साहब का खास बताता है और समय-समय पर अपनी हैसियत का प्रमाण भी देता नजर आता है।
और तीसरा प्रभारी—रेत, बालू, मिट्टी और पत्थर का कथित प्रभारी!
अब कहानी का नया अध्याय भी कम दिलचस्प नहीं है।
बताया जा रहा है कि आदर्श नगर में कुछ गतिविधियों की सूचना मिली। जाहिर है, अगर कोई जोड़ा एकांत में बैठा हो तो वहां रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जा रहा है, ऐसा तो समझा नहीं जाएगा। सूचना मिलते ही कथित तौर पर वाहन रवाना हुए और कार्रवाई शुरू हुई।
लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब सामने वाला वर्दीधारी ही भारी पड़ने लगा। बात थाने तक पहुंची और फिर एसडीओपी तक भी खबर पहुंचने की चर्चा है। इसके बाद कथित तौर पर सौदेबाजी का दौर शुरू हुआ।
नतीजा यह हुआ कि कुछ लोगों को छोड़ दिया गया और कुछ को थाने लाया गया।
अब जिन्हें थाने लाया गया, वे भी सवाल-जवाब करने लगे। विवाद की स्थिति बनी तो आखिर कुछ तो करना ही था। ऐसे में चर्चा है कि पूरे मामले को नया रंग देने की कोशिश हुई—प्रेमी युगल नहीं, बल्कि एकत्र होकर जुआ खेल रहे थे!
यानी कहानी वही, किरदार वही, जगह वही… बस धारा और पटकथा बदल गई!
अब सवाल यह है कि अगर सब कुछ नियम-कायदे से हो रहा है तो फिर तीन-तीन प्रभारी की यह व्यवस्था आखिर किस नियम की किताब में लिखी है? मूल प्रभारी कौन है? मौखिक आदेश से बैठाए गए प्रभारी की वैधता क्या है? और यदि तबादला आदेश जारी हो चुका था तो वह किसके इशारे पर और कैसे प्रभावहीन हो गया?
शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है और सवाल लगातार उठ रहे हैं।
आखिर कौन है यह सतीश, जिसके सामने प्रभारी और एसडीओपी भी छोटे नजर आ रहे हैं?
या फिर मामला इतना सीधा है कि अब थाने में नियम-कायदे नहीं, जिसकी वर्दी उसकी कहानी चल रही है?
अब तो जो वर्दी बोले, वही सही!