अमीरगंज गौशाला में मौतों का सच: सवाल सिर्फ मवेशियों की मौत का नहीं, जवाबदेही का भी वायरल वीडियो के बाद निगम की सफाई, बीमार और रेस्क्यू किए गए थे पशु; लेकिन सवाल बरकरार:- यदि व्यवस्था दुरुस्त थी तो समय रहते जवाब क्यों नहीं आया

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अमीरगंज गौशाला में मौतों का सच: सवाल सिर्फ मवेशियों की मौत का नहीं, जवाबदेही का भी
वायरल वीडियो के बाद निगम की सफाई, बीमार और रेस्क्यू किए गए थे पशु; लेकिन सवाल बरकरार:- यदि व्यवस्था दुरुस्त थी तो समय रहते जवाब क्यों नहीं आया
अमीरगंज गौशाला की तस्वीरों ने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए तो नगर निगम की ओर से सफाई सामने आ गई। मृत मवेशी गंभीर रूप से बीमार थे, रेस्क्यू करके लाए गए थे, चारा-पानी पर्याप्त है और कर्मचारी तीन शिफ्ट में तैनात हैं। लेकिन इस सफाई के साथ ही सबसे बड़ा सवाल और गहरा हो गया—अगर व्यवस्था इतनी दुरुस्त थी तो इसकी तस्वीरें सामने आने से पहले जिम्मेदार व्यवस्था को इसकी खबर क्यों नहीं हुई और सवाल उठने के बाद ही विस्तृत सफाई क्यों सामने आई। गौशाला परिसर में मृत मवेशियों और बछड़ों के शव मिलने की सूचना, जीवित पशुओं की हालत, कीचड़, सफाई, उपचार और निगरानी को लेकर उठे सवाल अब किसी बयान से नहीं, बल्कि रेस्क्यू रिकॉर्ड, मेडिकल रिपोर्ट, मृत्यु रजिस्टर, कर्मचारियों की हाजिरी, चारा-पानी के हिसाब और शव निस्तारण की टाइमलाइन से जवाब मांग रहे हैं। मामला सिर्फ कुछ पशुओं की मौत का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की परीक्षा का है जो बेजुबानों की जिंदगी की जिम्मेदार है।
विशेष पड़ताल ((गोलू शुक्ला ))।। कटनी।। अमीरगंज स्थित नगर निगम की गौशाला में मवेशियों की मौत और कथित अव्यवस्थाओं को लेकर सामने आए वीडियो ने एक बार फिर यह सवाल शहर के सामने खड़ा कर दिया है कि निराश्रित और बीमार गोवंश के लिए बनाई गई व्यवस्था वास्तव में जमीन पर कितनी प्रभावी है। गौशाला परिसर तथा उसके पीछे मृत मवेशियों और बछड़ों के शव दिखाई देने की जानकारी सामने आने के बाद चारा-पानी, उपचार, साफ-सफाई, कर्मचारियों की निगरानी और मृत पशुओं के समय पर निस्तारण को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। स्थानीय रिपोर्ट में इन मुद्दों पर सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा चिंता जताए जाने का उल्लेख है।
नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी की ओर से सामने आई सफाई में कहा गया है कि वीडियो में दिखाई दे रहे मृत पशु नियमित रूप से गौशाला में रहने वाले पशु नहीं, बल्कि शहर से रेस्क्यू किए गए गंभीर रूप से बीमार और निराश्रित मवेशी थे। निगम के अनुसार पशु चिकित्सक द्वारा उपचार के प्रयास किए गए, लेकिन कुछ पशुओं को बचाया नहीं जा सका और बाद में उनका नियमानुसार निस्तारण किया गया। निगम की ओर से गौशाला में पर्याप्त चारा-पानी तथा कर्मचारियों की तीन शिफ्टों में तैनाती का भी दावा किया गया है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसका दावा सही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस दावे की पुष्टि करने वाला प्रशासनिक रिकॉर्ड क्या कहता है और वह जनता के सामने कब आएगा।
सबसे अहम सवाल:-सफाई बाद में क्यों
मामला सार्वजनिक होने, वीडियो सामने आने और गौशाला की व्यवस्थाओं पर सवाल उठने के बाद स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से विस्तृत सफाई सामने आई। यह प्रशासनिक पक्ष रखने का अधिकार है और किसी भी अधिकारी को अपना पक्ष स्पष्ट करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। लेकिन इसी के साथ एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल भी उठता है।
यदि गौशाला में चारा-पानी पर्याप्त था, कर्मचारी तीन शिफ्ट में तैनात थे, पशु चिकित्सक उपचार कर रहे थे और मृत पशु पहले से गंभीर बीमारी की हालत में रेस्क्यू किए गए थे, तो इन तथ्यों की जानकारी तत्काल सार्वजनिक क्यों नहीं की गई।
क्या संबंधित विभाग के पास पहले से ही
रेस्क्यू रजिस्टर,पशुओं की संख्या का रिकॉर्ड,पशु चिकित्सा परीक्षण रिपोर्ट,दवाओं का रिकॉर्ड,मृत्यु रजिस्टर,कर्मचारियों की शिफ्टवार उपस्थिति, चारा एवं भूसा वितरण का हिसाब, शव निस्तारण का रिकॉर्ड मौजूद था यदि था, तो घटना सामने आते ही यही रिकॉर्ड प्रशासन के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए सामने क्यों नहीं आए। और यदि रिकॉर्ड तत्काल उपलब्ध नहीं था, तो इससे गौशाला की दैनिक निगरानी और रिकॉर्ड-प्रबंधन पर भी सवाल उठता है। देर से आई सफाई अपने आप में दोष सिद्ध नहीं करती, लेकिन सफाई तक पहुंचने में लगा समय और उसके पीछे उपलब्ध रिकॉर्ड अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर होना चाहिए।

‘बीमार थे’—तो बीमारी का पूरा रिकॉर्ड सामने आए
नगर निगम का पक्ष है कि मृत पशु गंभीर रूप से बीमार और निराश्रित थे तथा उन्हें शहर से रेस्क्यू करके गौशाला लाया गया था। यदि ऐसा है तो अब इस दावे को रिकॉर्ड से स्पष्ट किया जाना चाहिए। प्रत्येक मृत पशु के संबंध में प्रशासन के पास यह जानकारी होनी चाहिए कि कहां से मिला,कब रेस्क्यू किया गया, उस समय उसकी हालत क्या थी,किस पशु चिकित्सक ने जांच की,कौन-सा उपचार दिया गया, कितने समय तक निगरानी की गई, मृत्यु का चिकित्सकीय कारण क्या दर्ज किया गया, मृत्यु के बाद शव का निस्तारण कब किया गया। यही वह जानकारी है जो आरोप और तथ्य के बीच अंतर स्पष्ट कर सकती है। किसी पशु का पहले से बीमार होना और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी समाप्त हो जाना दो अलग बातें हैं।

रेस्क्यू के बाद जिम्मेदारी और बढ़ जाती है
शहर की सड़कों से निराश्रित पशुओं को पकड़कर सुरक्षित आश्रय में लाना प्रशासन की जिम्मेदारी का एक हिस्सा है। लेकिन रेस्क्यू के बाद उस पशु की देखभाल, उपचार, भोजन, पानी और निगरानी की जिम्मेदारी भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। कटनी नगर निगम द्वारा आवारा मवेशियों को पकड़कर अमीरगंज स्थित कांजी हाउस भेजे जाने की कार्रवाई पहले भी रिपोर्ट की गई है। इसलिए अमीरगंज गौशाला की जांच केवल मृत पशुओं से शुरू होकर वहीं समाप्त नहीं होनी चाहिए। जांच का पूरा चक्र होना चाहिए
सड़क से रेस्क्यू → गौशाला में प्रवेश → स्वास्थ्य परीक्षण → उपचार → भोजन-पानी → निगरानी → मृत्यु/स्वस्थ होने की स्थिति → अंतिम निस्तारण या स्थानांतरण। इस पूरी प्रक्रिया में जहां भी कमी हो, वहीं जिम्मेदारी निर्धारित होनी चाहिए।

तीन शिफ्ट में कर्मचारी थे तो निगरानी कहां थी
नगर निगम की ओर से गौशाला में कर्मचारियों, सुपरवाइजर और हांका गैंग प्रभारी की व्यवस्था का दावा किया गया है। यह दावा सही है तो फिर एक और सवाल सामने आता है, क्या कर्मचारियों की केवल तैनाती होती है या उनके काम की वास्तविक निगरानी भी होती है। उपस्थिति रजिस्टर में कर्मचारी मौजूद होना और जमीन पर उनकी जिम्मेदारी निभाना दो अलग बातें हैं। इसलिए जांच में केवल यह न देखा जाए कि कितने कर्मचारी तैनात थे। यह भी देखा जाए कि
किस कर्मचारी की किस दिन ड्यूटी थी,उसने कितने पशुओं का निरीक्षण किया,बीमार पशुओं की सूचना किसे दी,सफाई कब हुई,मृत पशु मिलने पर किस अधिकारी को सूचना दी गई,पशु चिकित्सक कब-कब पहुंचे,निरीक्षण पंजिका में क्या दर्ज है,यदि दस्तावेज और जमीनी स्थिति में अंतर मिलता है, तो वही इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होगी।

बारिश को कारण बताना पर्याप्त नहीं
निगम की ओर से बारिश के कारण कीचड़ होने की बात कही गई है। बारिश निश्चित रूप से परिस्थितियों को कठिन बना सकती है। लेकिन गौशाला प्रबंधन की परीक्षा भी खराब मौसम में ही होती है। एक जिम्मेदार पशु आश्रय में यह देखना जरूरी है कि बीमार पशु सूखी जगह पर हैं या नहीं, चारा गीला और दूषित तो नहीं हो रहा, पानी निकासी की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं, पशुओं के बैठने के लिए सुरक्षित स्थान है या नहीं,
कीचड़ में घायल अथवा कमजोर पशुओं के गिरने का खतरा तो नहीं,
केंद्र सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग की पशु चिकित्सा अवसंरचना संबंधी न्यूनतम मानक गाइडलाइन में परीक्षण क्षेत्र, आपात उपचार, दवाओं की उपलब्धता, पानी, ड्रेनेज और पशुओं के लिए शेल्टर जैसी सुविधाओं को महत्व दिया गया है।
इसलिए बारिश का हवाला स्थायी जलनिकासी और सुरक्षित आश्रय की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता।

विशेषज्ञ दृष्टिकोण: गौशाला केवल पशुओं को बंद रखने की जगह नहीं
पशु-कल्याण के दृष्टिकोण से गौशाला का उद्देश्य केवल सड़कों से पशुओं को हटाकर एक परिसर में रखना नहीं है। वहां पशुओं के स्वास्थ्य की निगरानी, भोजन, पानी, उपचार, आश्रय और स्वच्छता की समुचित व्यवस्था आवश्यक है।
केंद्र सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग की जानकारी के अनुसार स्थानीय निकायों की भूमिका cattle pounds और pinjrapoles/गौशाला जैसी व्यवस्थाओं से जुड़ी है, जबकि पशु स्वास्थ्य और पशु चिकित्सा व्यवस्था राज्य स्तर के दायित्वों से भी संबंधित है।
पशु कल्याण से संबंधित सरकारी योजनाओं में भी चारा, पानी की सुविधा, दवाएं, पशु चिकित्सक, चिकित्सा उपकरण, शेल्टर और ड्रेनेज जैसी आवश्यकताओं को सहायता योग्य मदों में शामिल किया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि पशु आश्रय की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितने पशु वहां रखे गए; यह भी देखना होगा कि उनकी स्थिति क्या है।

कितने पशु, कितनी मौतें, यही आंकड़ा सबसे जरूरी
अमीरगंज मामले में अब तक सार्वजनिक चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि वास्तव में गौशाला में कुल कितने पशु हैं और संबंधित अवधि में कितनी मौतें हुईं। प्रशासन को पारदर्शिता के लिए यह आंकड़ा सामने रखना चाहिए।
जनता को बताया जाए कुल क्षमता कितनी, वर्तमान पशु संख्या कितनी, पिछले 30 दिन में कितने पशु आए,कितने रेस्क्यू किए गए,कितने उपचार के बाद स्वस्थ हुए,कितने पशुओं की मृत्यु हुई,मौत का चिकित्सकीय कारण क्या था, कितने पशुओं का उपचार किया गया,कितने पशु गंभीर बीमारी में थे। जब तक ये आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक सोशल मीडिया के वीडियो और प्रशासनिक सफाई के बीच सच का पूरा चित्र सामने नहीं आएगा।

शवों का निस्तारण: समय और प्रक्रिया दोनों जांचें
गौशाला में मृत पशु मिलने की सूचना के साथ एक और संवेदनशील प्रश्न जुड़ा है। मृत पशुओं के शवों को कितनी जल्दी और किस प्रक्रिया के तहत हटाया गया।
यदि निगम का कहना है कि जिस समय वीडियो सामने आया, उस समय टीम मृत पशुओं को उठाने पहुंच रही थी, तो अब प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि-मृत्यु का समय क्या था,सूचना कब मिली, सूचना किसने दी, टीम कब पहुंची, शव कब हटाए गए, निस्तारण कब और कैसे किया गया। यह टाइमलाइन सार्वजनिक होने पर यह भी पता चलेगा कि वायरल वीडियो में दिखाई गई स्थिति कितने समय तक बनी रही।

देर से आई सफाई खुद जांच का विषय नहीं, लेकिन जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है
किसी अधिकारी द्वारा अपना पक्ष रखना स्वाभाविक प्रशासनिक प्रक्रिया है। लेकिन जब सफाई घटना और सार्वजनिक विवाद के बाद सामने आती है, तो उसकी पुष्टि स्वतंत्र रिकॉर्ड से होना भी उतना ही जरूरी हो जाता है। इसलिए अब सबसे उपयोगी कदम यही होगा कि निगम केवल बयान जारी करने के बजाय संबंधित दस्तावेज सामने रखे।

सिर्फ निरीक्षण नहीं, स्वतंत्र जांच जरूरी
महापौर प्रीति सूरी की ओर से पशुओं की मृत्यु के कारणों की जांच कराने तथा गौशाला का निरीक्षण करने की बात सामने आई है। स्थानीय रिपोर्ट में उनके हवाले से गौशाला के लिए बड़ी जमीन की आवश्यकता और फिलहाल अमीरगंज में अस्थायी व्यवस्था होने की बात भी दर्ज है। अब इस निरीक्षण को महज औपचारिकता न बनाकर दस्तावेज और स्थल दोनों पर आधारित जांच में बदला जाना चाहिए। जांच में संभव हो तो,नगर निगम,पशु चिकित्सा विभाग, स्वतंत्र पशु-कल्याण विशेषज्ञ,प्रशासनिक अधिकारी को शामिल किया जाए और सबसे महत्वपूर्ण बात जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। क्योंकि जनता को केवल यह जानने का अधिकार नहीं है कि “जांच होगी”; जनता को यह भी जानना चाहिए कि जांच में क्या मिला और सुधार के लिए क्या किया गया।

चारा-पानी के दावे की भी हो पड़ताल
यदि निगम का दावा है कि गौशाला में पर्याप्त चारा और भूसा उपलब्ध है, तो इस दावे की पुष्टि खरीद और वितरण के रिकॉर्ड से आसानी से की जा सकती है। जांच हो,कितना चारा खरीदा गया, किस दर पर खरीदा गया, किससे खरीदा गया,कितना स्टॉक था, प्रतिदिन कितनी मात्रा वितरित हुई, कितने पशुओं के हिसाब से वितरण हुआ यही बात दवाओं पर लागू होती है।
दवा खरीदी गई या नहीं,कितनी खरीदी गई, किस बीमारी में कौन-सी दवा दी गई, पशु चिकित्सक की सलाह क्या थी, अगर रिकॉर्ड मजबूत है तो प्रशासन की स्थिति मजबूत होगी। अगर रिकॉर्ड में कमी है तो सुधार की दिशा भी स्पष्ट होगी।

आउटसोर्स कर्मचारियों और खर्च की निगरानी भी सवालों में अमीरगंज गौशाला का मामला स्वास्थ्य विभाग की व्यापक कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल भी उठाता है।
यदि नगर निगम के पास सफाई, स्वास्थ्य और मैदानी व्यवस्थाओं के लिए पर्याप्त मानव संसाधन हैं, तो यह देखना जरूरी है कि उनका वास्तविक उपयोग pऔर पर्यवेक्षण किस प्रकार होता है। जांच का उद्देश्य किसी कर्मचारी को पहले से दोषी ठहराना नहीं होना चाहिए।
बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि कितने कर्मचारी स्वीकृत हैं, कितने वास्तव में कार्यरत हैं,किसे कहां तैनात किया गया, हाजिरी कैसे दर्ज होती है, काम की निगरानी कौन करता है,भुगतान किस आधार पर होता है। यदि कहीं वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता का आरोप है तो उसका निर्णय केवल आरोपों से नहीं, दस्तावेजी जांच और ऑडिट से होना चाहिए।

एक और गंभीर प्रश्न: क्या अमीरगंज व्यवस्था स्थायी समाधान है
महापौर के अनुसार गौशाला के लिए बड़ी भूमि की आवश्यकता है और वर्तमान व्यवस्था अस्थायी है। यही बात नगर प्रशासन को दीर्घकालिक योजना बनाने के लिए प्रेरित करनी चाहिए। यदि शहर से लगातार निराश्रित पशु रेस्क्यू किए जा रहे हैं, तो केवल एक अस्थायी परिसर में उनकी संख्या बढ़ाते जाना समाधान नहीं हो सकता। आवश्यक है क्षमता के अनुरूप पशु संख्या, पर्याप्त शेड, सूखी जमीन,
जलनिकासी, चारा भंडारण, पशु चिकित्सालय/उपचार सुविधा, बीमार पशुओं के लिए पृथक क्षेत्र, पानी की स्थायी व्यवस्था, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और
डिजिटल/दैनिक रिकॉर्ड।

प्रशासन के सामने अब 12 सीधे सवाल

1. वायरल वीडियो में दिखाई दे रहे मृत पशु कितने थे।
2. पिछले तीन महीनों में अमीरगंज गौशाला में कितने पशुओं की मृत्यु हुई।
3. प्रत्येक मृत्यु का चिकित्सकीय कारण क्या दर्ज है।
4. मृत पशु कब रेस्क्यू किए गए और उनका प्रवेश रिकॉर्ड क्या है।
5. रेस्क्यू के समय उनकी मेडिकल जांच किसने की।
6. उपचार का रिकॉर्ड और दवा वितरण रजिस्टर कहां है।
7. गौशाला में तीन शिफ्ट में तैनात कर्मचारियों की वास्तविक उपस्थिति क्या थी।
8. मृत पशुओं की सूचना मिलने और उनके निस्तारण के बीच कितना समय लगा।
9. पर्याप्त चारे-पानी के दावे का दैनिक रिकॉर्ड क्या कहता है।
10. बारिश के दौरान जलनिकासी और सूखे शेड की व्यवस्था क्या है।
11. गौशाला का नियमित निरीक्षण कौन करता है और उसकी रिपोर्ट कहां है।
12. पूरी जांच रिपोर्ट जनता के सामने कब रखी जाएगी।
अब ‘किसकी गलती’ से पहले पूछा जाए-‘रिकॉर्ड क्या कहता है।’
अमीरगंज गौशाला मामले में यह कहना जल्दबाजी होगी कि हर मौत लापरवाही से हुई। इसी तरह केवल यह कहना भी पर्याप्त नहीं होगा कि मृत पशु बीमार थे और इसलिए प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।
सच इन दोनों दावों के बीच मौजूद रिकॉर्ड से निकलेगा।
यदि पशु गंभीर रूप से बीमार थे—तो उनकी चिकित्सा व्यवस्था कैसी थी,यदि वे रेस्क्यू किए गए थे—तो रेस्क्यू के बाद उनकी निगरानी कैसी थी,यदि पर्याप्त चारा-पानी था—तो उसका वितरण रिकॉर्ड क्या कहता है,यदि कर्मचारी तीन शिफ्ट में मौजूद थे तो उनकी ड्यूटी और निरीक्षण रिपोर्ट क्या कहती है,
यदि शवों का नियमानुसार निस्तारण हुआ तो सूचना से निस्तारण तक की टाइमलाइन क्या है,और यदि सब कुछ व्यवस्था के अनुसार चल रहा था तो वह व्यवस्था वायरल वीडियो में दिखाई दे रही स्थिति तक पहुंचने से पहले सक्रिय क्यों नहीं हुई।
यही वह सवाल है जिसका जवाब अब केवल बयान से नहीं, दस्तावेज और स्वतंत्र जांच से देना होगा।
बेजुबानों की मौत को आंकड़ा बनने से पहले व्यवस्था को जागना होगा। गौशाला में रहने वाले पशु अपनी पीड़ा प्रशासन के सामने लिखित शिकायत के रूप में नहीं रख सकते। वे न चारा मांगने कार्यालय पहुंच सकते हैं, न उपचार के लिए आवेदन दे सकते हैं और न ही किसी अधिकारी को बता सकते हैं कि वे किस दर्द से गुजर रहे हैं। इसलिए उनकी देखभाल की जिम्मेदारी रखने वाली व्यवस्था की जवाबदेही और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर व्यवस्था ठीक है तो उसे जांच से डरने की जरूरत नहीं। अगर कमी है तो उसे स्वीकार कर सुधारना ही प्रशासन की मजबूती है।
अमीरगंज की घटना को किसी व्यक्ति, अधिकारी या संस्था के खिलाफ अभियान बनाने के बजाय इसे व्यवस्था सुधारने का अवसर बनाया जाना चाहिए।
नगर निगम को चाहिए कि वह सफाई देने से आगे बढ़े और पूरी स्थिति का तथ्यात्मक ऑडिट कराए। क्योंकि जनता को आश्वासन नहीं, भरोसेमंद व्यवस्था चाहिए। और अमीरगंज के बेजुबान पशुओं को सबसे अधिक जरूरत है समय पर भोजन की,
स्वच्छ पानी की, बीमारी में उपचार की, बारिश में सुरक्षित आश्रय की, मृत्यु के बाद सम्मानजनक निस्तारण की और सबसे बढ़कर—जिम्मेदार निगरानी की।
अब सवाल यह नहीं कि वीडियो ने प्रशासन को कितना असहज किया। सवाल यह है कि उस वीडियो के बाद प्रशासन व्यवस्था को कितना बदलता है। अमीरगंज गौशाला की निष्पक्ष जांच हो, रिकॉर्ड सार्वजनिक हों, कमियां स्वीकार हों और जहां सुधार की जरूरत है वहां समयबद्ध कार्रवाई हो—यही इस पूरे विवाद का वास्तविक समाधान होगा।

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