कैमोर की सांसों पर दशकों पुराना जहरीला पहरा, 10 लाख टन एस्बेस्टस कचरे का खतरा, हजारों जिंदगियों पर मंडराता संकट ब्रिटिश कंपनी की औद्योगिक विरासत पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस, सवाल–कैमोर की जनता को जहरीले प्रदूषण से मुक्ति कब मिलेगी
कैमोर की सांसों पर दशकों पुराना जहरीला पहरा, 10 लाख टन एस्बेस्टस कचरे का खतरा, हजारों जिंदगियों पर मंडराता संकट
ब्रिटिश कंपनी की औद्योगिक विरासत पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस, सवाल–कैमोर की जनता को जहरीले प्रदूषण से मुक्ति कब मिलेगी
कटनी/जबलपुर। कैमोर की धरती पर दशकों पहले शुरू हुई औद्योगिक गतिविधियों की एक ऐसी जहरीली विरासत सामने आई है, जिसका खामियाजा आज भी हजारों स्थानीय नागरिकों को भुगतने की आशंका है। सवाल सिर्फ एक फैक्ट्री या औद्योगिक कचरे का नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की जिंदगी का है, जिनकी सांसें, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संभावित एस्बेस्टस प्रदूषण के खतरे से जुड़ा हुआ है। करीब 10 लाख टन एस्बेस्टस से दूषित मिट्टी का अनुमान और गंभीर बीमारियों से प्रभावित लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड से जुड़े दावों ने इस मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है। अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस गंभीर जनस्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय मामले में हस्तक्षेप करते हुए 5 नवंबर 2026 को केंद्र और राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
यह कार्रवाई कैमोर के नागरिकों के लिए उम्मीद की एक महत्वपूर्ण किरण मानी जा रही है। वर्षों से उठ रहे प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी सवाल अब न्यायालय के सामने हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कैमोर की जमीन और वातावरण में वास्तव में इतनी बड़ी मात्रा में जहरीला एस्बेस्टस मौजूद है, तो अब तक इसकी व्यापक वैज्ञानिक जांच और सुरक्षित निस्तारण के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?
1934 से शुरू हुई औद्योगिक गतिविधियां, पीछे छोड़ गईं गंभीर सवाल
याचिका के अनुसार, वर्ष 1934 में ब्रिटिश कंपनी टर्नर एंड न्यूऑल पीएलसी ने कैमोर में एस्बेस्टस फैक्ट्री स्थापित की थी। आरोप है कि फैक्ट्री से निकलने वाले खतरनाक औद्योगिक अपशिष्ट का वर्षों तक आसपास के क्षेत्रों में निस्तारण किया जाता रहा। इसके चलते आवासीय इलाकों, सार्वजनिक स्थानों और अन्य क्षेत्रों में एस्बेस्टस युक्त कचरा मौजूद होने की आशंका जताई गई है।
यह कोई सामान्य औद्योगिक अपशिष्ट नहीं है। एस्बेस्टस के सूक्ष्म रेशे हवा में फैलकर सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से एस्बेस्टोसिस, फेफड़ों का कैंसर और मेसोथेलियोमा जैसी गंभीर एवं जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं। इसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्रदूषण का प्रभाव तत्काल दिखाई नहीं देता, बल्कि कई वर्षों बाद भी बीमारी के रूप में सामने आ सकता है।
10 लाख टन दूषित मिट्टी का अनुमान, आखिर कितने बड़े खतरे के बीच रह रहे लोग
जनहित याचिका में प्रस्तुत पर्यावरणीय अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का हवाला देते हुए कैमोर के आसपास लगभग 10 लाख टन एस्बेस्टस से दूषित सतही मिट्टी होने का अनुमान बताया गया है। कनाडाई पर्यावरणीय संस्था ECOH की रिपोर्ट में भी इतनी बड़ी मात्रा में दूषित मिट्टी का उल्लेख किए जाने का दावा किया गया है। इसके अलावा करीब 5.65 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र में एस्बेस्टस प्रदूषण और हजारों लोगों के इसके संपर्क में आने की आशंका का भी उल्लेख है।
यदि ये अनुमान वैज्ञानिक जांच में प्रमाणित होते हैं तो यह केवल कैमोर नगर का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य का अत्यंत गंभीर संकट होगा। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि दूषित मिट्टी किन-किन स्थानों पर मौजूद है, हवा में एस्बेस्टस के रेशों की स्थिति क्या है और कितने आवासीय एवं सार्वजनिक क्षेत्र इसकी चपेट में हैं।
मेडिकल कैंपों में सामने आए मरीज, सैकड़ों रिकॉर्ड जांच के घेरे में
याचिका में वर्ष 2013 से आयोजित चिकित्सा शिविरों, जांच रिपोर्टों और उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड का हवाला दिया गया है। दावा किया गया है कि कैमोर में एस्बेस्टस जनित बीमारियों से प्रभावित लोगों की पहचान हुई है तथा सैकड़ों लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड और बीमारी से संबंधित मुआवजे के दस्तावेज भी उपलब्ध हैं।
यह पहलू इस मामले को और अधिक गंभीर बनाता है। यदि लोगों की बीमारियों का संबंध औद्योगिक प्रदूषण से है, तो उनकी पहचान, उपचार और मुआवजे की जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। वहीं जिन नागरिकों पर भविष्य में बीमारी का खतरा मंडरा रहा है, उनकी नियमित स्वास्थ्य जांच और चिकित्सकीय निगरानी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कंपनी बदली, लेकिन जनता के सामने आज भी वही सवाल
याचिका में ब्रिटिश कंपनी टर्नर एंड न्यूऑल पीएलसी, बेल्जियम की कंपनी ईटेक्स (ETEX) और बाद में फैक्ट्री के स्वामित्व में हुए बदलावों का उल्लेख किया गया है। वर्तमान में फैक्ट्री एवरेस्ट इंडस्ट्रीज लिमिटेड के स्वामित्व में संचालित होने की जानकारी देते हुए ऐतिहासिक औद्योगिक कचरे की जिम्मेदारी का प्रश्न उठाया गया है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि स्वामित्व बदलने के बाद भी दशकों से जमा संभावित जहरीले कचरे की जवाबदेही किसकी होगी? क्या केवल कंपनियों के नाम और स्वामित्व बदल जाने से उस औद्योगिक विरासत की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है, जिसका प्रभाव स्थानीय आबादी पर पड़ने की आशंका है? जनता को इन सवालों का स्पष्ट और कानूनी जवाब मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट से क्या-क्या मांगा गया
जनहित याचिका में न्यायालय से प्रमुख रूप से मांग की गई है कि कैमोर और आसपास के क्षेत्रों में मिट्टी, हवा तथा अन्य प्रभावित स्थानों की स्वतंत्र एवं व्यापक वैज्ञानिक जांच कराई जाए।
एस्बेस्टस प्रदूषण की वास्तविक मात्रा और प्रभावित क्षेत्र की पहचान की जाए।
स्थानीय निवासियों और पूर्व कर्मचारियों की व्यापक स्वास्थ्य जांच कराई जाए।
प्रभावित मरीजों को उचित उपचार, चिकित्सा सुविधा और कानून के अनुसार मुआवजा दिया जाए।
दूषित औद्योगिक कचरे के सुरक्षित निष्कासन, परिवहन और वैज्ञानिक निस्तारण की समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए।
प्रदूषण के लिए जिम्मेदार संस्थाओं की पहचान कर कानूनी जवाबदेही तय की जाए।
प्रभावित क्षेत्रों का पर्यावरणीय पुनर्स्थापन और नागरिकों की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
जनता का सबसे बड़ा सवाल: क्या कैमोर को सुरक्षित वातावरण में जीने का अधिकार मिलेगा
कैमोर की यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति, संस्था या कंपनी के विरुद्ध आरोप लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह उन परिवारों की सुरक्षा का सवाल है, जो वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं। यह उन बच्चों के भविष्य का सवाल है, जिन्होंने उस औद्योगिक गतिविधि को देखा भी नहीं, लेकिन उसकी कथित जहरीली विरासत के बीच जीवन बिताने की आशंका झेल रहे हैं।
सरकार और संबंधित विभागों की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि इस मामले को केवल कागजी जवाबों और विभागीय पत्राचार तक सीमित न रखा जाए। स्वतंत्र विशेषज्ञों की टीम गठित हो, वैज्ञानिक परीक्षण सार्वजनिक किए जाएं, प्रभावित लोगों का स्वास्थ्य सर्वे कराया जाए और निस्तारण की समयबद्ध कार्ययोजना जनता के सामने रखी जाए। क्योंकि किसी भी विकास की कीमत नागरिकों की सेहत और उनकी जिंदगी नहीं हो सकती। उद्योगों से रोजगार और आर्थिक प्रगति जरूर मिलनी चाहिए, लेकिन इसके साथ पर्यावरण और मानव जीवन की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
अब निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और सरकार के जवाब पर टिकी हैं। कैमोर की जनता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि प्रदूषण की वास्तविक स्थिति, जिम्मेदारों की जवाबदेही और सुरक्षित भविष्य की ठोस गारंटी चाहिए।,याचिका समाजसेवी आशुतोष दीक्षित ‘मनु’ एवं कैमोर निवासी गणेश राव द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आर्यन उर्मलिया ने पैरवी की।