SECL बंगवार खदान में मौत का खेल! ठेकेदार ‘बल्ली’ और प्रबंधन पर गंभीर आरोप, सबूतों से छेड़छाड़ के बीच पुलिस की भूमिका भी सवालों में
शहडोल जिले के सोहागपुर क्षेत्र अंतर्गत बंगवार भूमिगत कोयला खदान में ठेका मजदूर मोहे लाल सिंह की मौत अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि कई गंभीर सवालों और कथित लापरवाही का बड़ा मामला बनती जा रही है। डोंगरा टोला निवासी 43 वर्षीय मोहे लाल सिंह की मौत बिजली पोल से गिरने के कारण हुई, लेकिन घटना के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, वे पूरे मामले को संदिग्ध बना रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, यह पूरा कार्य सब एरिया बंगवार क्षेत्र में संजय सिंह के निर्देशन में कराया जा रहा था। काम धनपुरी निवासी ठेकेदार ‘बल्ली’ को मिला था, जिसने कथित तौर पर यह काम आगे जाकिर नामक व्यक्ति को दे दिया। यानी काम का सब-कॉन्ट्रैक्ट देकर जिम्मेदारी को परोक्ष रूप से टाल दिया गया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि मजदूरों से बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के काम कराया जा रहा था।
घटना के दिन मोहे लाल सिंह बिजली पोल पर मेंटेनेंस कार्य कर रहे थे, तभी संतुलन बिगड़ने से वे नीचे गिर पड़े और गंभीर रूप से घायल हो गए। अस्पताल ले जाने के बाद उनकी मौत हो गई। लेकिन इसके बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
स्थानीय सूत्र बताते हैं कि जिस सीढ़ी के सहारे मजदूर पोल पर चढ़ा था, उसे घटना के बाद तुरंत हटा दिया गया। सवाल यह उठता है कि आखिर सीढ़ी किसने हटाई और क्यों? क्या यह सबूत मिटाने की कोशिश थी? इतना ही नहीं, यह भी आरोप है कि SECL अधिकारियों ने पुलिस को घटना की सूचना 8 से 9 घंटे की देरी से दी। इतनी बड़ी घटना के बाद सूचना में देरी अपने आप में संदेह पैदा करती है।
मामले को और उलझाने वाली बात यह है कि कथित तौर पर “सबेरिया” नामक व्यक्ति द्वारा कार्यस्थल पर व्यक्ति बदलने की बात भी सामने आई है। यानी जिस मजदूर के साथ हादसा हुआ, उसकी जगह किसी और को दिखाने या रिकॉर्ड में हेरफेर करने की कोशिश की गई। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि सबूतों से छेड़छाड़ की गई हो सकती है।
परिजनों और स्थानीय मजदूरों का आरोप है कि जब उन्होंने विरोध किया तो उन्हें “मैनेज” करने का प्रयास किया गया। यानी मुआवजा या दबाव के जरिए मामले को शांत कराने की कोशिश हुई। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या प्रबंधन और ठेकेदार मिलकर पूरे मामले को दबाने में लगे हैं?
इस पूरे घटनाक्रम में ठेकेदार बल्ली, सबेरिया और संबंधित प्रबंधन अधिकारियों, विशेष रूप से संजय सिंह की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर बिना सुरक्षा उपकरणों के काम क्यों कराया गया? हादसे के बाद सबूतों से छेड़छाड़ क्यों हुई? और सबसे बड़ा सवाल—पुलिस को सूचना देने में इतनी देरी क्यों की गई?
पुलिस की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। इतनी गंभीर घटना में देरी से सूचना मिलने के बावजूद क्या पुलिस ने तत्काल सख्त कार्रवाई की? या फिर मामला दबाने का प्रयास हुआ?
यह हादसा एक बार फिर यह साबित करता है कि खदानों में मजदूरों की सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित है। अब जरूरत है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए और मृतक के परिवार को न्याय मिले। वरना ऐसे “हादसे” यूं ही मजदूरों की जान लेते रहेंगे और जिम्मेदार लोग बचते रहेंगे।