तीन महीने बाद अमलाई खदान से निकला अनिल कुशवाहा का शव, सिस्टम की संवेदनहीनता पर सवाल
परिजनों का आरोप: कोयला प्रबंधन और ठेकेदार की लापरवाही ने छीनी 27 साल के युवक की जान, हाईकोर्ट में मामला विचाराधीनशहडोल।11 अक्टूबर 2025 की शाम शहडोल जिले के धनपुरी थाना क्षेत्र अंतर्गत एसईसीएल के सोहागपुर एरिया स्थित अमलाई खुली खदान में ओवरबर्डन हटाने के दौरान हुई दर्दनाक घटना ने पूरे जिले ही नहीं, बल्कि प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। करीब तीन महीने तक काले पानी से भरी खदान में दबे 27 वर्षीय अनिल कुशवाहा का शव आखिरकार आज बाहर निकाला जा सका। लगातार पानी निकासी के बाद अनूपपुर से आई एसडीआरएफ की टीम ने भारी मशक्कत के बाद शव को बाहर निकाला। शव की हालत ऐसी थी कि काले पानी में लंबे समय तक रहने के कारण शरीर मांस के लोथड़ों की तरह लिपटा हुआ था। पंचनामा की कार्रवाई के बाद शव को मेडिकल कॉलेज भेजा गया, जहां अब पोस्टमार्टम किया जाएगा।
यह मामला इसलिए भी असाधारण और विचलित करने वाला है क्योंकि अनिल कुशवाहा का मृत्यु प्रमाण पत्र लगभग दो महीने पहले ही बन चुका था, जबकि आज जाकर उसका संभवतः पोस्टमार्टम होगा। प्रशासनिक प्रक्रिया की यह विडंबना अपने आप में कई सवाल खड़े करती है क्या किसी व्यक्ति को कागजों में मृत घोषित कर देना ही व्यवस्था के लिए पर्याप्त हो जाता है, भले ही उसका शव महीनों तक काले पानी में पड़ा रहे?

परिजनों का आरोप है कि छत्तीसगढ़ के रायपुर से संचालित ठेका कंपनी आरकेटीसी और कोयला प्रबंधन की लापरवाही के कारण यह हादसा हुआ। खदान में नियमों के विरुद्ध जाकर ओवरबर्डन डालने का काम कराया जा रहा था, वह भी ऐसे जलभराव वाले क्षेत्र में जहां पहले से खतरे के संकेत मौजूद थे। मृतक के रिश्तेदार मनोज कुशवाहा का कहना है कि हादसे के बाद कंपनी के अधिकारियों ने लगातार टालमटोल की। उन्होंने बताया कि आरकेटीसी कंपनी के कर्मचारी आशीष यादव ने परिजनों से कहा था कि शव निकालने की प्रक्रिया शुरू तो हो रही है, लेकिन इसमें दो-तीन दिन लगेंगे, इसलिए तत्काल आने की जरूरत नहीं है। इस दौरान परिवार असमंजस और पीड़ा में रहा।
पुलिस ने शुरुआत में आरकेटीसी कंपनी के दो कर्मचारियों के खिलाफ अपराध दर्ज किया था, लेकिन बाद में आशीष यादव और अजय यादव सहित कुछ कर्मचारियों को क्लीन चिट दे दी गई। यही वह बिंदु है जिस पर परिजन सबसे ज्यादा आहत और आक्रोशित हैं। उनका कहना है कि जिनकी लापरवाही से एक युवा की जान गई, वही लोग जांच से बाहर कर दिए गए। परिजनों ने इस पूरे प्रकरण को लेकर उच्च न्यायालय जबलपुर में याचिका भी दायर की है, जहां मामला अभी विचाराधीन है।
परिवार का यह भी आरोप है कि एसईसीएल के स्थानीय स्तर के कुछ अधिकारियों, जिनमें क्षेत्रीय प्रबंधक रमन्ना नामक अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं, की जानकारी और सहमति से नियमों के विरुद्ध खनन कराया जा रहा था। टाइम एंको और सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते हुए जलभराव वाले हिस्से में ओवरबर्डन डलवाया गया, जिससे यह दुर्घटना हुई। यदि समय रहते नियमों का पालन किया गया होता, तो शायद अनिल आज जीवित होता।
आज जब लगभग 100 दिनों के बाद शव बरामद हुआ है, तब जाकर यह मामला फिर से चर्चा में आया है। लेकिन सवाल यह भी है कि खदान में अभी भी लाखों लीटर पानी और गहरी खाइयों में दबा मलबा मौजूद है, जिसे निकालना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। क्या इस हादसे से सबक लेकर भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जाएगा, या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
अनिल कुशवाहा की मौत सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस सिस्टम की कहानी है जहां संवेदनाएं कागजी प्रक्रियाओं के नीचे दब जाती हैं। एक मां-बाप ने अपने बेटे को खोया, एक परिवार ने अपना सहारा, और व्यवस्था ने पहले उसे मृत्यु प्रमाण पत्र थमा दिया, फिर महीनों बाद पोस्टमार्टम की तैयारी की। यह खबर सिर्फ हादसे की नहीं, बल्कि उस संवेदनहीनता की है जो बार-बार गरीब मजदूरों और कर्मचारियों की जान लेती है। अब देखना यह है कि न्यायालय और जांच एजेंसियां इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाती हैं और क्या अनिल कुशवाहा की मौत वास्तव में किसी बदलाव की वजह बन पाएगी।