हिरासत में मौत या संरक्षित अत्याचार ? उठते सवाल जंगली सूअर शिकार मामले में हिरासत में बुजुर्ग आदिवासी की मौत, वन विभाग पर गंभीर आरोप परिजनों का दावा– कार्यालय में की गई मारपीट से बिगड़ी हालत; जांच को मौके पर पहुंचे तहसीलदार
हिरासत में मौत या संरक्षित अत्याचार ? उठते सवाल
जंगली सूअर शिकार मामले में हिरासत में बुजुर्ग आदिवासी की मौत, वन विभाग पर गंभीर आरोप
परिजनों का दावा– कार्यालय में की गई मारपीट से बिगड़ी हालत; जांच को मौके पर पहुंचे तहसीलदार
कटनी में वन विभाग की हिरासत में 70 वर्षीय आदिवासी बुजुर्ग की मौत कोई सामान्य घटना नहीं है। यह मामला सिर्फ जंगली सूअर के शिकार तक सीमित नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता, जवाबदेही की कमी और शक्ति के दुरुपयोग की आशंका को उजागर करता है। यदि वन विभाग का दावा सही है कि बुजुर्ग की मौत अचानक स्वास्थ्य बिगड़ने से हुई, तो यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या उम्रदराज व्यक्ति को हिरासत में लेने से पहले स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया था? क्या पूछताछ के दौरान मानवीय व्यवहार और कानूनी दिशा-निर्देशों का पालन हुआ? वहीं, परिजनों द्वारा लगाए गए मारपीट के आरोप और मुंह से खून निकलने जैसे गंभीर दावे इस मामले को और संवेदनशील बना देते हैं। ऐसे में सिर्फ विभागीय बयान पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।
कटनी।। जिले में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर देने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। जंगली सूअर के शिकार के आरोप में पकड़े गए 70 वर्षीय आदिवासी बुजुर्ग फूलचंद कोल की वन विभाग की कस्टडी में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। घटना के बाद क्षेत्र में आक्रोश फैल गया है और वन विभाग की कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। मामला कटनी वन परिक्षेत्र अंतर्गत सिमरा ग्राम का है। वन विभाग के अनुसार कौड़ियां बीट क्षेत्र में जंगली सूअर के शिकार की सूचना पर कार्रवाई करते हुए फूलचंद कोल, मुन्ना और लक्ष्मण को साढ़े तीन किलो मांस एवं लगभग 100 मीटर जाल के साथ हिरासत में लिया गया था। पूछताछ के दौरान बुजुर्ग फूलचंद कोल की अचानक तबीयत बिगड़ने की बात कही जा रही है।
वन मंडल अधिकारी गर्वित गंगवार के मुताबिक, फूलचंद कोल को ब्लड प्रेशर की शिकायत के चलते जिला अस्पताल कटनी ले जाया गया, जहां से हालत गंभीर होने पर जबलपुर रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर मृतक के परिजन वन विभाग की कहानी को सिरे से खारिज कर रहे हैं। मृतक के पुत्र कोदू कोल ने आरोप लगाया कि उनके पिता खेत की रखवाली कर रहे थे, तभी वन विभाग के कर्मचारी पहुंचे और बिना किसी ठोस कारण के उन्हें जबरन कार्यालय ले गए। परिजनों का आरोप है कि कार्यालय में फूलचंद कोल के साथ मारपीट की गई, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ी। परिजनों का दावा है कि बुजुर्ग के मुंह से खून निकल रहा था और कुछ ही देर में उनकी मौत हो गई।
घटना के बाद आक्रोशित ग्रामीणों और परिजनों ने चेतावनी दी है कि यदि निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई नहीं की गई तो वे वन विभाग कार्यालय के सामने शव रखकर बड़ा आंदोलन करेंगे।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मौके पर पहुंचे तहसीलदार हर्ष वर्धन ने बताया कि फिलहाल शरीर पर बाहरी चोट के स्पष्ट निशान नहीं मिले हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।वन विभाग की कस्टडी में हुई मौत ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है। इस मामले में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को नहीं, बल्कि पूरी कार्रवाई की शृंखला की जांच होनी चाहिए,गिरफ्तारी से लेकर हिरासत, पूछताछ और इलाज तक। यदि कोई 70 वर्षीय व्यक्ति हिरासत में है, तो उसकी स्वास्थ्य सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी राज्य की होती है। हिरासत में ली गई हर सांस की जवाबदेही शासन-प्रशासन की होती है। भारतीय न्यायशास्त्र इस विषय पर बिल्कुल स्पष्ट है। सर्वोच्च न्यायालय बार-बार कह चुका है कि हिरासत में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु—चाहे वह पुलिस हिरासत हो या किसी अन्य विभाग की—राज्य की जिम्मेदारी मानी जाएगी, जब तक कि विपरीत सिद्ध न हो जाए। संविधान का अनुच्छेद 21 केवल कागजों तक सीमित नहीं है; जीवन और गरिमा का अधिकार हिरासत के दरवाजे पर समाप्त नहीं हो जाता, चाहे वह पुलिस थाना हो या वन विभाग का कार्यालय।