साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ में श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग पर झूमे श्रद्धालु ,उपनगरीय क्षेत्र छपरवाह के श्री श्री 1008 श्री दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में चल रहे साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ में भाव विभोर हुए श्रोता

साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ में श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग पर झूमे श्रद्धालु ,उपनगरीय क्षेत्र छपरवाह के श्री श्री 1008 श्री दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में चल रहे साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ में भाव विभोर हुए श्रोता
कटनी।। चैत्र नवरात्र पर उपनगरीय क्षेत्र छपरवाह स्थित श्री श्री 1008 श्री दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में चल रहे साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ में श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाया गया। कथा में जैसे ही श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग आया पूरा पंडाल हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने बाल स्वरूप श्री कृष्ण के दर्शन किए और व्यास पीठ पर विराजित श्रीमति पूनम तिवारी ने नन्हें कान्हा को दुलारा। कथा में श्रीमती पूनम तिवारी ने श्रीकृष्ण जन्म के प्रसंग सुनाते हुए कृष्ण की बाल लीला का वर्णन किया। इस दौरान बाल कृष्ण को कंस के कारागार से नंद बाबा के घर ले जाने की झांकी भी प्रस्तुत की गई। कथा में श्रीमती तिवारी ने कहा कि ययाति के बड़े पुत्र यदु हुए। उन्हीं के वंश में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी को रात्रि 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ। भगवान कृष्ण ने संसार को अंधेरे से प्रकाश में लाने के लिए जन्म लिया और अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञानरूपी प्रकाश से दूर किया। भगवान कृष्ण को जब वासुदेव यशोदा मैया के घर लेकर जा रहे थे तो शेषनाग ने छाया की और मां यमुना ने चरण छुए। वासुदेव कृष्ण को नंदबाबा के घर छोड़कर यशोदा मैया की कन्या को लेकर वापस कंस के कारागृह में आए। कथा व्यास ने पूतना के उद्धार का प्रसंग सुनाया। कथा में श्रीमती तिवारी ने दानवीर कर्ण का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि दान ऐसा होना चाहिए। जो एक हाथ से दें तो दूसरे हाथ को पता न चले। उन्होंने कहा कि दान दो, पर उसका बखान मत करों। उन्होंने कहा कि जो अच्छे कर्म करते हैं। वे कभी मन में फल की इच्छा नहीं रखते है। क्योंकि फल देने वाले की नजरे तो सदैव आप पर बनी हुई है। उन्होंने कहा कि संकल्प में विकल्प मत खोजिए। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए संकल्प लें और अपना कर्म करते रहें। जीवन में भटकाने के लिए विकल्प बहुत मिलेंगे। लेकिन संकल्प लेकर चलें तो सफलता जरूर मिलेगी। उन्होंने अजामिल के प्रसंग पर कहा कि संसार में ब्राह्मणों को ब्राह्मणदेव कहा गया है। ब्राह्मण अगर आपके घर में आगर भोजन करते हैं तो उनके आशीर्वाद से घर के दोष दूर हो जाते हैं। ब्राह्मण के कहने पर अजामिल ने अपने 10वें पुत्र का नाम नारायण रखा था और नारायण को पुकारते-पुकारते उसे सद्गति मिल गई। कथा में उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन करते हुए कहा कि श्याम से मिलना है तो राधाजी को याद करों। श्याम प्रभु तो दौड़े चले आएंगे। उन्होंने कहा कि राधा-कृष्ण के मिलन का निमित मोर था। जिसके कारण प्रभु मोरपंख धारण करते हैं। राधा और कृष्ण अगल-अलग नहीं है। लेकिन जो राधाकृष्ण को अलग-अलग माने वह नरकीय जीव है। राधा और कृष्ण तो एक ही नाम है। उन्होंने कहा कि जो प्रभु की चरण-शरण हो जाता है। प्रभु उसे तार देते हैं और जो विपरित चलते हैं। कथा में श्रीमती तिवारी ने कर्ण, अजामिल, मोर, परिक्षित, वामन, समुद्र मंथन, कृष्ण जन्म आदि प्रसंगों की वर्तमान परिपेक्ष्य में व्याख्या की। इस दौरान लोग झूमने-नाचने लगे। भगवान श्रीकृष्ण की वेश में नन्हें बालक के दर्शन करने के लिए लोग लालायित नजर आ रहे थे। भगवान के जन्म की खुशी पर महिलाओं द्वारा अपने घरों से लगाए गए गुड़ के लड्डूओं से भगवान को भोग लगाया गया। इस अवसर पर बलराम प्यासी, विजय शंकर शुक्ला, भगवत प्रसाद मिश्रा, अमृत लाल शुक्ला, अनिल कुमार शुक्ला, सत्येन्द्र तिवारी, विनोद कुमार शुक्ला, बद्री प्रसाद तिवारी, रघुनाथ प्रसाद शुक्ला, लल्ला गौतम, विवेक शुक्ला, पुष्पेद्र द्विवेदी(पुजारी), शैलेष शुक्ला, सुशील कुमार शुक्ला, सुरेश प्रसाद शुक्ला, कृपा शंकर शुक्ला, रजनीश शुक्ला, सतीश द्विवेदी, विनय कुमार शुक्ला(बिन्नी), हरभजन शुक्ला, अरुण कुमार शुक्ला(कल्लू), आशीष प्यासी, रामनाथ यादव, कमलेश यादव, राजेश शुक्ला, पारसमणि शुक्ला सहित भारी संख्या में श्रृद्धालुओं की उपस्थिति रही।