गौरेला का ‘दबंग’ कर्मचारी: कोर्ट से केस हारा, दावे हुए खारिज, फिर भी उसी जमीन पर बेखौफ चल रहा अवैध निर्माण!
(मोहम्मद शाकिब खान, मुख्य संवाददाता गौरेला)
दिनांक 28/03/2026
गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही (GPM): गौरेला नगर पालिका में पदस्थ एक कर्मचारी के रसूख और दबंगई के आगे क्या पूरा प्रशासन नतमस्तक हो चुका है? यह सवाल अब गौरेला की सड़कों पर गूंज रहा है।

वार्ड क्रमांक 5 (मंगली बाजार) में चल रहे अवैध निर्माण के मामले में एक ऐसा सनसनीखेज न्यायालयीन दस्तावेज सामने आया है, जिसने प्रशासन की ‘चुप्पी’ पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खुलासा हुआ है कि अवैध निर्माण करने वाला नगर पालिका का कर्मचारी ‘देवेन्द्र दुबे’, जिस 800 वर्गफीट जमीन (खसरा नंबर 460) पर अपना हक जताते हुए निर्माण कर रहा है, उस जमीन पर उसका कोई कानूनी अधिकार ही नहीं है। 
वर्ष 2019 में ही न्यायालय ने उसके दावों को झूठा पाते हुए उसका केस पूरी तरह खारिज कर दिया था। इसके बावजूद, प्रशासन के नाक के नीचे उसी जमीन पर धड़ल्ले से काम जारी है।
कोर्ट का फैसला: “दावा प्रमाणित करने में पूर्णतः असफल रहा वादी”
प्राप्त न्यायालयीन दस्तावेज (व्यवहार वाद क्रमांक-41 ए/2010) के अनुसार, देवेन्द्र कुमार दुबे ने हरिगोपाल (पवन दुबे के पिता) व अन्य के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। वर्ष 2019 में व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2, पेण्ड्रारोड (श्री आनंद कुमार सिंह) की अदालत ने अपने 15 पन्नों के विस्तृत फैसले में स्पष्ट लिखा है कि:
“वादी देवेन्द्र कुमार दुबे यह प्रमाणित करने में पूर्णतः असफल रहा है कि ग्राम गौरेला… में स्थित खसरा नंबर-460 रकबा 0.70 एकड़ में 800 वर्गफीट भूमि पर बना मकान उसके वैध आधिपत्य में रहा है।”
अदालत ने निष्कर्ष में स्पष्ट तौर पर “वादी (देवेन्द्र दुबे) का दावा निरस्त किया जाता है” का आदेश पारित किया था।
हार के बाद शुरू हुआ दबंगई और पद के दुरुपयोग का खेल
कोर्ट से 2019 में मुंह की खाने और दावा खारिज होने के बाद, देवेन्द्र दुबे ने कानून को अपने हाथ में ले लिया।
अपने सरकारी पद (नगर पालिका कर्मचारी) का दुरुपयोग करते हुए उसने बिना किसी वैध अधिकार और बिना भवन अनुज्ञा के उसी विवादित जमीन पर निर्माण शुरू कर दिया।
प्रशासनिक मिलीभगत और नाकामी की क्रोनोलॉजी:
2010: देवेन्द्र दुबे ने कोर्ट में केस किया।
2011: नगर पंचायत ने पुलिस को अवैध निर्माण पर कार्रवाई के लिए पत्र लिखा (लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई)।
2019: देवेन्द्र दुबे कोर्ट से केस हार गया। दावा निरस्त।
2023: शिकायतकर्ता पवन दुबे ने कलेक्टर, एसपी और नगर पालिका को शिकायत की। 18 अगस्त 2023 को नगर पालिका ने स्टे (Stay) लगाया, लेकिन देवेन्द्र ने अपने ही विभाग के आदेश को रौंदते हुए काम जारी रखा।
फरवरी-मार्च 2026: नगर पालिका ने फिर लगातार नोटिस जारी किए। 27 फरवरी को पार्षद की मौजूदगी में ‘काम चालू होने का पंचनामा’ बना। 20 मार्च को अंतिम चेतावनी दी गई।
आज की स्थिति: सब कुछ ‘कागजों’ पर, मौके पर काम चालू!
कोर्ट का फैसला खिलाफ होने, कलेक्टर-एसपी से शिकायत होने, नगर पालिका के 15 सालों के अनगिनत नोटिस और पंचनामा बनने के बावजूद, आज की तारीख में भी निर्माण कार्य पूरी गति से चल रहा है।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सुलगते 5 बड़े सवाल:
1. क्या कोर्ट के आदेश की कोई अहमियत नहीं? जब न्यायालय 2019 में ही देवेन्द्र दुबे के आधिपत्य के दावे को ‘अप्रमाणित’ बताकर खारिज कर चुका है, तो प्रशासन उसे उसी जमीन पर अवैध निर्माण करने की छूट कैसे दे रहा है?
2. कर्मचारी को ‘वीवीआईपी’ ट्रीटमेंट क्यों? एक आम आदमी अगर बिना अनुमति एक ईंट भी रख दे तो नगर पालिका का बुलडोजर पहुँच जाता है। फिर अपने ही विभाग के एक कर्मचारी के अवैध और गैर-कानूनी कब्जे पर अधिकारी आंखें क्यों मूंदे बैठे हैं?
3. ‘एकतरफा कार्रवाई’ की चेतावनी सिर्फ दिखावा? 20 मार्च 2026 के नोटिस में ‘एकतरफा कानूनी कार्रवाई’ की धमकी दी गई थी। कोर्ट के दस्तावेज सामने आने के बाद भी अब तक एफआईआर (FIR) या बुलडोजर की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
4. एसडीएम और पुलिस मौन क्यों? मामला जब एसडीएम, तहसीलदार और थानेदार के संज्ञान में बार-बार लाया गया है, तो राजस्व और पुलिस विभाग मूकदर्शक क्यों बना हुआ है?
5. क्या यह न्यायालय की खुली अवमानना नहीं है? जिस जमीन पर कोर्ट ने आपका अधिकार ही नहीं माना, उस पर जबरन कब्जा कर निर्माण करना सीधा-सीधा कोर्ट की अवमानना और भू-माफिया जैसी हरकत है। इस पर प्रशासन मौन क्यों है?
गौरेला की जनता अब यह देख रही है कि क्या जिला कलेक्टर और एसपी इस मामले में हस्तक्षेप कर कानून का राज स्थापित करेंगे, या फिर एक रसूखदार कर्मचारी के आगे पूरा सरकारी तंत्र यूं ही बौना साबित होता रहेगा?