कोयला नहीं, सिस्टम जल रहा है: बाड़ ही खेत चर गई, कार्रवाई तमाशा बन गई
शहडोल। क्षेत्र में अवैध कोयले से भरे ट्रैक्टर की सूचना मिलते ही अमला पूरे जोश में निकल पड़ा। कागजों पर सब कुछ फिट—टीम तैयार, गाड़ियां तैयार और कार्रवाई का प्लान भी पक्का। लेकिन मौके पर पहुंचते ही पूरा खेल ऐसा पलटा कि “घर का भेदी लंका ढा गया” वाली कहावत फिर जिंदा हो उठी।
जैसे ही दबिश दी गई, ट्रैक्टर का चालक पहले ही गायब मिल गया। अब सवाल उठता है कि कार्रवाई से पहले ही खबर किसने पहुंचाई? साफ है कि “दाल में काला” नहीं, पूरी दाल ही काली है।
मामला यहीं नहीं थमा। जल्दबाजी में एक ड्राइवर का मोबाइल सरकारी गाड़ी में ही छूट गया। फिर जो हुआ, उसने पूरे घटनाक्रम की परतें खोल दीं। मोबाइल पर लगातार कॉल आने लगे—ऐसे कॉल, जिन्होंने इशारों-इशारों में बता दिया कि खेल कहीं गहरा है और “खेत को खाने वाली बाड़” यहीं आसपास मौजूद है।
मौके पर मौजूद अधिकारी भी एक पल को सन्न रह गए। हालात ऐसे बन गए कि कार्रवाई करने निकली टीम खुद ही सवालों के घेरे में आ गई। “सांप भी निकल गया और लाठी भी टूट गई”—ना ट्रैक्टर मिला, ना ही कोई ठोस कार्रवाई हो पाई।
अब बड़ा सवाल यही है कि जब अंदर से ही सेंध लग रही हो, तो माफिया पर नकेल कौन कसेगा? चार-पांच लोगों की टीम क्या इस जाल को तोड़ पाएगी या हर बार की तरह “ऊंट के मुंह में जीरा” ही साबित होगी?
यह पूरा घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि समस्या बाहर से ज्यादा अंदर है। जब तक “आस्तीन के सांप” पहचाने नहीं जाएंगे, तब तक हर छापेमारी सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएगी—और कोयले से ज्यादा सिस्टम ही जलता रहेगा।