एक समय, एक पात्र और नंगे पांव यात्रा: ऐसा होता है दिगंबर जैन मुनियों का जीवन

0
शहडोल। भौतिकवाद और उपभोग की दौड़ में भागती दुनिया के बीच दिगंबर जैन मुनियों का जीवन त्याग, संयम और आत्मसाधना का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आता है। इन दिनों बुढार में चल रहे धार्मिक आयोजन में दिगंबर परंपरा के मुनियों की साधना और दिनचर्या को देखने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
दिगंबर जैन मुनि वे होते हैं जिनका अंबर ही वस्त्र होता है। वे सांसारिक मोह, विषय-वासनाओं और भौतिक सुख-सुविधाओं का पूर्ण त्याग कर मुनि मुद्रा धारण करते हैं। उनका जीवन आत्मकल्याण और समस्त प्राणी मात्र के प्रति करुणा की साधना को समर्पित रहता है।
सिर्फ एक बार लेते हैं आहार, वह भी खड़े होकर
दिगंबर मुनि दिन में केवल एक बार आहार ग्रहण करते हैं। वह भी तब, जब श्रावकों द्वारा विधिपूर्वक नवधा भक्ति के साथ आहार अर्पित किया जाता है। निश्चित धार्मिक विधि पूरी होने के बाद ही वे कर-पात्र में खड़े होकर आहार ग्रहण करते हैं। पानी भी वे निर्धारित नियमों के अंतर्गत सीमित मात्रा में लेते हैं। यह पूरी प्रक्रिया संयम, मर्यादा और शास्त्रीय परंपरा के अनुसार संपन्न होती है।
नंगे पांव पैदल यात्रा, कोई वाहन नहीं
दिगंबर जैन मुनि किसी भी प्रकार के वाहन का उपयोग नहीं करते। वे देशभर में पैदल, नंगे पांव भ्रमण करते हैं। सर्दी, गर्मी या बरसात-हर मौसम में उनका जीवन एक समान तप और त्याग से भरा रहता है।
विश्राम के लिए वे केवल लकड़ी के पाटे का उपयोग करते हैं। भौतिक सुविधाओं से दूर रहकर वे आत्म-साधना और ध्यान में लीन रहते हैं।
त्याग और संयम का साक्षात उदाहरण
बुढार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालु दिगंबर मुनियों के इस कठोर और अनुशासित जीवन को करीब से देख रहे हैं। आयोजन स्थल पर सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ रही है।
दिगंबर परंपरा का यह संदेश स्पष्ट है सच्चा सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आंतरिक शांति में है। भोग-विलास के युग में त्याग और तपस्या का यह स्वरूप लोगों को आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित कर रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed