बागी कलम:सोशल मीडिया वाले “स्वघोषित भईया”

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आज के डिजिटल युग में अगर कोई सबसे तेज़ी से उभरा हुआ रिश्ता है तो वह है “भैया” जो न आपके सगे हैं, न रिश्तेदार, न मोहल्ले वाले। हाँ.! ठीक समझे आप ये हैं “स्वघोषित भैया” सोशल मीडिया वाले। किसी ने इन्हें नियुक्त नहीं किया, किसी ने जिम्मेदारी नहीं दी लेकिन इन्होंने खुद ही ठान लिया है कि “हम ही कलम समाज के कंगूरा हैं” चूंकि सोशल मीडिया एक विशाल लोकतंत्र है जहाँ हर व्यक्ति को बोलने की आज़ादी है और इसी आज़ादी की छाया में जन्म लेते हैं स्वघोषित भैया। इन भईया जी की सबसे बड़ी पूँजी है उनके नाबालिग सूत्र। सूत्र इसलिए कि ये खुद को चाणक्य समझते हैं और नाबालिग इसलिए कि तर्क अभी घुटनों के बल रेंग रहा होता है।
▪️इनका ज्ञान यूनिवर्सल पैकेज होता है, उदाहरण के लिए…राजनीति.? भैया एक्सपर्ट, धर्म.? भैया ठेकेदार, शिक्षा.? भैया कुलगुरु, महिलाओं के अधिकार.? भैया सबसे बड़े संरक्षक। भईया जी हर विवादित मुद्दे पर तुरंत प्रकट हो जाते हैं। जैसे ही कोई ट्रेंड चला नहीं कि तत्काल एक पोस्ट ठोक दी पूरी गंभीरता से, चार इमोजी और दो वर्तनी की गलतियों के साथ। अगर कोई इनसे असहमत हो जाए तो भईया का वॉइस कमांड इतना तेज कि बिना टांग की मुर्गी दौड़ में सबसे आगे। कारण कि भईया हमेशा सही होते हैं, गलत सिर्फ सामने वाला होता है। तर्क अगर इनके खिलाफ हो जाए तो भैया आख़िरी शब्दभेदी हथियार चलाते हैं कि “तुम्हारी सोच ही गलत है।”
▪️असल में सोशल मीडिया के ये स्वघोषित भईया ज्ञान से ज्यादा ध्यान के भूखे होते हैं। लाइक, कमेंट और रिप्लाई यही इनका ऑक्सीजन सिलेंडर है। लेकिन मानना पड़ेगा कि भईया के बिना सोशल मीडिया कुछ अधूरा-सा लगता है। भईया जैसे ही मोबाइल ऑन करते हैं, बुद्धि एयरप्लेन मोड में चली जाती है और सूत्र चालू हो जाते हैं। इनकी टाइमलाइन एक चलता-फिरता ज्ञानकोष होती है और इनके सूत्र बहुत मासूम होते हैं जैसे कोई बच्चा गणित का सवाल गलत तरीके से हल करके खुद को टॉपर समझ बैठे। भईया हर पोस्ट के नीचे ऐसे प्रकट होते हैं जैसे परीक्षा में बिना पढ़े सप्लीमेंट्री कॉपी मिल गई हो।
▪️इन भईया जी की एक और खास पहचान है कि दूसरों को ज्ञान देने में कोई कमी नहीं। सबसे दिलचस्प बात है कि ये भैया वास्तविक जीवन में इतने शांत हैं कि चाय वाले से भी बहस नहीं कर पाते, लेकिन ऑनलाइन आते ही भईया क्रांतिकारी बन जाते हैं। इनके नाबालिग सूत्रों में सबसे खतरनाक सूत्र यह है कि “हम जो कह रहे हैं, वही अंतिम सत्य है।” बस.! यहीं से संवाद मर जाता है और शोर ज़िंदा हो जाता है। फिर भी इन स्वघोषित भईया और उनके सूत्रों का एक सामाजिक योगदान यह भी है जो हमें सिखाता हैं कि मोबाइल हाथ में आते ही बड़ा होना ज़रूरी नहीं होता। कई लोग उम्र से बालिग होते हैं लेकिन सोच अब भी नाबालिग ही रहती है।

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