रेतपुराण: घाटों पर रेत, सड़कों पर ट्रक और फाइलों में ‘नींद’

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(शुभम तिवारी)
शहडोल। जिले में रेत का मौसम पूरे शबाब पर है। न बारिश चाहिए, न धूप बस घाट चाहिए और थोड़ी-सी खामोशी। बाकी काम अपने आप हो जाता है। बिजौरी घाट से लेकर नरवर घाट तक, और हड़हा से शहडोल की सड़कों तक, रेत ऐसे बह रही है जैसे किसी ने नियमों का बांध खोल दिया हो।
कहा जाता है कि बिजौरी घाट पर राकेश का रेत-दर्शन नियमित है। नरवर घाट में पंकू जी हां, सिर्फ पंकू और सोनी का नाम रेत की लहरों में तैरता रहता है। कौन कब, कितनी रेत, किस ट्रक में ये सब सवाल घाट की हवा जानती है, सड़कें जानती हैं, मोहल्ले जानते हैं। बस जिन्हें जानना चाहिए, वे शायद किसी गहरी फाइल-समाधि में ध्यानमग्न हैं।
बुढार का हड़हा घाट इन दिनों “रेत विश्वविद्यालय” बना हुआ है यहां उत्खनन से लेकर परिवहन तक की पढ़ाई बिना प्रवेश परीक्षा हो जाती है। सुना जाता है कि प्रबंधन इतना सधा हुआ है कि ट्रॉलियां खुद रास्ता पहचान लेती हैं। मुरार इलाके से लेकर धनपुरी तक रेत की गाड़ियां ऐसे दौड़ती हैं, मानो ओवरलोडिंग कोई लोक-नृत्य हो और नियम सिर्फ मंच-सजावट।
शहडोल मुख्यालय में दिनभर सड़कों पर रेत से लदी गाड़ियों का परेड चलता है। हॉर्न बजते हैं, धूल उड़ती है, और सवाल हवा में घुल जाते हैं। खनिज विभाग की कलम शायद स्याही बचा रही है, और पुलिस की टोपी मौसम के हिसाब से आंखों पर सरक आई है। इशारों में सब कुछ दिखता है बस बयान सीधे नहीं आते।
किसी ने कहा था, “आवेदन दीजिए।” आवेदन दिए गए। फिर कहा गया, “प्रक्रिया में है।” प्रक्रिया लंबी निकली इतनी लंबी कि ट्रक कई चक्कर लगा आए। नीचे-ऊपर का संतुलन इतना सटीक है कि रेत नदी से निकलकर सड़क तक पहुंचती है और फाइल वहीं टिक जाती है।
पर्यावरण, सुरक्षा और राजस्व तीनों दर्शक दीर्घा में बैठे हैं। मंच पर रेत का खेल चल रहा है, तालियां ट्रकों के टायर बजा रहे हैं, और जवाबों की जगह मौन का संगीत बज रहा है। सवाल बस इतना है क्या ये रेत यूं ही बहती रहेगी, या कभी नियमों का पुल भी बनेगा?

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