11 घंटे का मैराथन ‘बिहान’ कार्यक्रम – ग्रामीण महिलाओं के लिए वरदान या अव्यावहारिक योजना?
मोहम्मद शाकिब खान मुख्य संवाददाता गौरेला
विशेष रिपोर्ट
गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही (जीपीएम) जिला पंचायत द्वारा ‘बिहान’ (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) के तहत एक महत्वाकांक्षी आदेश जारी किया गया है।

उद्देश्य नेक है: छूटे हुए परिवारों की महिलाओं को स्वसहायता समूहों से जोड़ना और उनकी पारिवारिक आय 1 लाख रुपये से अधिक करना। लखपति दीदी बनाने की इस मुहिम के तहत चयनित ग्रामों में ‘सहकर्मी समीक्षा’ होनी है। लेकिन इस आदेश में तय की गई 11 घंटे की समय-सीमा ने कई व्यावहारिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुबह 10 बजे से रात 9 बजे तक: क्या यह संभव है?
जारी आदेश के अनुसार, गौरेला, पेण्ड्रा और मरवाही विकासखण्डों के चयनित ग्रामों में समीक्षा का समय सुबह 10:00 बजे से रात 09:00 बजे तक तय किया गया है।
ग्रामीण दिनचर्या की अनदेखी: ग्रामीण परिवेश में महिलाओं के सिर पर घर-परिवार, खेती-किसानी और मवेशियों की पूरी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में क्या किसी भी ग्रामीण महिला के लिए लगातार 11 घंटे का समय निकाल पाना संभव है?
थकाऊ प्रक्रिया: क्या इतने लंबे समय तक बैठकों और चर्चाओं से ग्रामीण महिलाओं का उत्साहवर्धन होगा, या यह उनके लिए एक बोझिल औपचारिकता बनकर रह जाएगी?
7 सदस्यीय दल पर एक दिन में भारी काम का दबाव:
एक विकासखण्ड में 7 सदस्यीय सहकर्मी दल (जिसमें बी.पी.एम., लेखापाल, डी.ओ., एडीई.ओ., पीआरपी आदि शामिल हैं) का गठन किया जाना है।
इस दल को 11 घंटे के सीमित समय के भीतर निम्नलिखित भारी-भरकम काम पूरे करने हैं:
ग्राम संगठन की बैठक में भाग लेना, उनके तरीके और रिकॉर्ड संधारण की जाँच व सुधार करना।
छूटे हुए परिवारों को समूह से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित करना।
जेण्डर गतिविधियों के बारे में महिलाओं की समझ परखना।
ग्राम में समूह की बेस्ट प्रैक्टिस या सक्सेस स्टोरी खोजना और निकालना।
मिशन द्वारा दिए गए फंड और प्रशिक्षण के प्रभावात्मक प्रभाव का मूल्यांकन करना।
सवाल उठता है: क्या महज़ एक दिन के 11 घंटों में यह सारा गुणात्मक मूल्यांकन गहराई से किया जा सकता है? क्या जल्दबाजी में किए गए इस काम से लखपति ग्राम की वास्तविक स्थिति सामने आ पाएगी?
रात्रि चौपाल और अधिकारियों की मौजूदगी:
कार्यक्रम के तहत रात के समय चौपाल लगाकर महिलाओं और उनके परिवारों को समूह से जुड़ने के फायदे बताने का निर्देश दिया गया है। इस रात्रि चौपाल में जिला स्तरीय अधिकारी, जनपद स्तरीय अधिकारी, सरपंच और सचिव के शामिल होने की बात कही गई है ताकि महिलाओं का उत्साह बढ़े और वे ‘लखपति दीदी’ बनें।
जमीनी हकीकत: क्या सच में इतने लंबे और थकाऊ दिन के बाद रात 9 बजे तक जिला और जनपद स्तर के बड़े अधिकारी सुदूर ग्रामों में चौपाल में मौजूद रहेंगे?
क्या ग्रामीण जन रात के समय चौपाल में रुचि लेंगे?
ठहरने की व्यवस्था पर भी सवालिया निशान:
आदेश में यह भी जिक्र है कि सहकर्मी दल के रुकने की व्यवस्था ग्राम संगठन या ग्राम पंचायत में कराई जा सकती है।
सुविधाओं का अभाव: क्या ग्राम पंचायत भवनों में 7 सदस्यीय टीम (जिसमें अलग-अलग पदों के लोग शामिल हैं) के रात में रुकने, सुरक्षा और मूलभूत सुविधाओं का पर्याप्त और सुरक्षित इंतजाम मौजूद होता है?
स्वसहायता समूह की महिलाओं को आगे बढ़ाने और जनप्रतिनिधियों के सहयोग से ग्राम पंचायत/ग्राम सभा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास बेहद सराहनीय है। इस पूरी समीक्षा का प्रस्तुतीकरण जिला स्तर पर मा. कलेक्टर महोदया और मुख्य कार्यपालन अधिकारी के समक्ष भी किया जाना है।
लेकिन मैदानी हकीकत को ध्यान में रखे बिना, सुबह 10 बजे से रात 9 बजे तक का यह 11 घंटे का मैराथन शेड्यूल इस योजना की व्यावहारिक सफलता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
महिला कर्मचारी व ग्रामीण स्तर की महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टिकोण से रात्रि कालीन चौपाल किया जाना सुरक्षित हैं या नहीं यह भी बड़ा सवाल है?
योजनाओं को कागजों से निकालकर जमीन पर उतारने के लिए उनका लचीला और व्यावहारिक होना बहुत जरूरी है।