विधानसभा निर्वाचन से पहले दिखने लगा जनता का मूड – चैतन्य मिश्रा

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गिरीश राठौर

अनूपपुर /कोतमा मध्यप्रदेश विधानसभा निर्वाचन २०२३ को कुछ ही महीने शेष हैं।चुनावी वर्ष में शक्ति प्रदर्शन करने वाले वर्तमान विधायकों और पूर्व प्रत्याशियों के लिए इस बार कांग्रेस और भाजपा से टिकट पाना आसान नहीं होगा। इस बार चुनाव में कई नेता और समाजसेवी कूदने के लिए तैयारी में हैं।

     

इन नेताओं ने पार्टी हाईकमान में अपनी सिफारिशें भी शुरू कर दी हैं। साथ ही अपने स्तर पर चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया है।२०२३ विधानसभा चुनाव में जीतने लायक प्रत्याशियों की तलाश भाजपा, कांग्रेस ,आप,भगवा सहित अन्य दलों के लोग अलग – अलग सर्वेक्षणों से कर रहे हैं।चुनाव के लिये कुछ चेहरे ऐसे हैं जो जमीनी स्वीकार्यता ना होने के बावजूद धन बल , बाहु बल के बूते टिकट खरीद लेने का दम भर रहे हैं। इसकी संभावना बहुत है कि करोड़ – दो करोड़ देकर कोई बंदा टिकट जुगाड़ लाए। लेकिन वो जीतेगा ?, पिछले तीन चुनावों में यहाँ की जनता ने कर के दिखला दिया है। श्रमिक नेता नाथू लाल पाण्डेय, तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष और व्यवसायी नागेन्द्र नाथ सिंह और बुढार के कोयला ट्रांसपोर्ट व्यवसायी किशोरी चतुर्वेदी की पराजय ये साबित करती है कि कोतमा की जनता को धन बल से नहीं खरीदा जा सकता। भाजपा में पूर्व विधायक दिलीप जायसवाल , पूर्व जिलाध्यक्ष अनिल गुप्ता भी टिकट के लिए प्रयासरत है । इसी दल के जिलाध्यक्ष ब्रजेश गौतम की खाद्य मंत्री बिसाहूलाल सिंह, पूर्व मंत्री संजय पाठक और शहडोल के पूर्व संभागीय संगठन मंत्री जितेन्द्र लटोरिया से नजदीकी जग जाहिर है। संगठन में उनकी पूरी जमावट कोतमा के इर्द गिर्द है। टिकट के सबसे प्रबल दावेदार वो भी हैं। टिकट मिल भी जाए तो वो जीत ही जाएगें, इसको लेकर संशय है। पूर्व विधायक दिलीप जायसवाल पिछला चुनाव हर तरह की अनुकूलता होने के बाद भी हार गये थे। इस पराजय का ठीकरा वो भाजपा के ही नेताओं पर फोडते रहे हैं। स्थानीय लोगो और समर्थकों की मने तो भाजपा इस बार  साफ-स्वच्छ छवि के उम्मीदवार पर दाव लगा सकती है ,इस बार टिकट की दौड़ में कई दावेदारों के बीच  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा में बराबर सक्रियता बनाए रखने वाले भारत विकास परिषद के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व जिला मीडिया प्रभारी ,जिले के वरिष्ठ पत्रकार मनोज द्विवेदी पर दाव लगा सकती  हैं। २०२३ निर्वाचन में उन्हे नकार पाना पार्टी और अन्य दलों के लिये बिल्कुल आसान नहीं होगा। उनका सरल ,सहज, सुलभ व्यवहार उन्हे कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता प्रदान करता है।  भाजपा उन्हे अपना प्रत्याशी बनाती है तो कोतमा के परिणाम भाजपा के पक्ष में जा सकते हैं। ऐसा ही एक अन्य चेहरा बनगंवा नगर पंचायत के निर्विरोध निर्वाचित अध्यक्ष सुनील चौरसिया का है। आर टी आई एक्टिविष्ट और साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक के रुप में आपकी सक्रियता रही है। यह संभव है कि भाजपा चुनाव जीतने  के लिये नये , ईमानदार, स्वच्छ चेहरों पर दांव लगाए ताकि चुनाव जीतने की संभावना अधिक हो। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा मनोज द्विवेदी और सुनील चौरसिया के नाम पर भी विचार कर विधानसभा का टिकट दे सकती है ।वही कांग्रेस में वर्तमान विधायक सुनील सराफ और पूर्व विधायक मनोज अग्रवाल  प्रबल दावेदार होंगे ,  वहीं  गुजरात चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा जिस तरीके से एंटी इंकबेसी को लेकर सतर्क है और एक एक कदम फूंक फूंक कर रख रही है। कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध मतदाताओं का स्पष्ट रुख है कि अधिकांश पुराने चेहरों को संगठन में सक्रिय करने और नये स्वच्छ चेहरों को अवसर देने का निर्णय पार्टी ले सकती है , परिणाम भी उसी के अनुकूल आएगें।  यदि ऐसा हुआ तो यह हो सकता है कि कोतमा का चुनाव मनोज और सुनील  के बीच हो ।हालांकि चुनाव को अभी लगभग आठ से दस माह का समय है। पूर्व विधायक दिलीप जायसवाल, जिलाध्यक्ष ब्रजेश गौतम, अनिल गुप्ता, लवकुश शुक्ला ,रामनरेश गर्ग, हनुमान गर्ग , अजय शुक्ला, नागेन्द्र नाथ सिंह , डा व्ही पी एस चौहान , मदन त्रिपाठी जैसे बड़े और कद्दावर चेहरों के अतिरिक्त २५ से अधिक छोटे बड़े दावेदार कोतमा विधानसभा मे जनता के बीच मे दिख सकते हैं।

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