किसी की मौत के बाद ही जागेगा प्रशासन बालाजी नगर की झूलती बिजली की तारें सरकारी दावों को दे रही खुली चुनौती

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किसी की मौत के बाद ही जागेगा प्रशासन बालाजी नगर की झूलती बिजली की तारें सरकारी दावों को दे रही खुली चुनौती
शहर में विकास के दावे, स्मार्ट सुविधाओं के पोस्टर, बैठकों की तस्वीरें और उपलब्धियों की लंबी-लंबी सूची… लेकिन जब हकीकत देखने के लिए वार्ड क्रमांक 3 के बालाजी नगर पहुंचिए, तो विकास की चमक नहीं, बल्कि मौत का साया दिखाई देता है। सड़क के ऊपर झूलती हाई वोल्टेज बिजली की तारें हर दिन यह सवाल पूछ रही हैं कि क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद ही सरकारी तंत्र जागेगा

कटनी।। एक ओर शहर में विकास, स्मार्ट सुविधाओं और बुनियादी व्यवस्थाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, तो दूसरी ओर नगर निगम के वार्ड क्रमांक 3 स्थित बालाजी नगर की तस्वीर इन दावों की हकीकत बयां कर रही है। यहां सड़क के ऊपर झूलती हाई वोल्टेज बिजली की तारें हर पल किसी बड़े हादसे को न्योता दे रही हैं। बरसात के मौसम में यह खतरा कई गुना बढ़ चुका है और क्षेत्र के लोग रोज़ाना अपनी जान हथेली पर रखकर आवागमन करने को मजबूर हैं।
रहवासियों का कहना है कि कई मवेशी इन तारों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं। कई बार मासूम बच्चे भी बड़ी दुर्घटना का शिकार होने से बाल-बाल बचे हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की नींद नहीं टूटी है। लोगों ने कई बार शिकायतें कीं, आवेदन दिए, अधिकारियों के चक्कर लगाए, लेकिन समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है।


क्षेत्रवासियों के बुलावे पर कांग्रेस नेता दिव्यांशु मिश्रा (अंशु) मौके पर पहुंचे और हालात का निरीक्षण किया। उन्होंने विद्युत मंडल के अधिकारियों से तत्काल पोल लगाकर व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की। साथ ही नगर निगम और विद्युत विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से भी शिकायत दर्ज कराई। जानकारी के अनुसार विद्युत मंडल का कहना है कि विद्युतीकरण की फाइल नगर निगम में लंबित है, जिसके कारण कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है। यानी जनता की सुरक्षा सरकारी फाइलों के बीच उलझकर रह गई है। सवाल यह है कि यदि कोई बड़ा हादसा हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा

अंशु मिश्रा ने क्षेत्रवासियों को भरोसा दिलाया है कि यदि एक सप्ताह के भीतर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता के साथ मिलकर विद्युत मंडल के खिलाफ प्रभावी आंदोलन किया जाएगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
यह विडंबना ही है कि वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास की योजनाओं की समीक्षा होती है, प्रेस नोट जारी किए जाते हैं, अखबारों और सोशल मीडिया पर उपलब्धियों के दावे किए जाते हैं और सरकार तक यह संदेश भेजा जाता है कि शहर में सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन जब कोई अधिकारी इन बस्तियों की वास्तविक स्थिति देखने निकलता है, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि सरकारी तंत्र के लिए विकास का मतलब केवल फाइलों पर हस्ताक्षर, बैठकों की खानापूर्ति और कागजों में योजनाएं पूरी करना रह गया है। आम नागरिक की सुरक्षा, उसकी परेशानी और उसकी जिंदगी शायद अब प्राथमिकता नहीं रही।
बालाजी नगर का मामला केवल एक मोहल्ले की समस्या नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो फाइलों में विकास पूरा दिखाती है, जबकि धरातल पर लोग मौत के साये में जीवन जीने को मजबूर हैं।
प्रशासन को समझना होगा कि विकास केवल बैठकों, योजनाओं और प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं होता, बल्कि तब होता है जब आम नागरिक बिना डर के अपने घर से बाहर निकल सके। यदि समय रहते इन झूलती तारों को व्यवस्थित नहीं किया गया, तो कोई भी अप्रिय घटना पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगी। यदि आज किसी बच्चे, बुजुर्ग या राहगीर की करंट लगने से मौत हो जाती है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी कोई अधिकारी स्वीकार करेगा या फिर वही पुराना जवाब मिलेगा जांच के आदेश दे दिए गए हैं।
क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है, या फिर जनता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए तत्काल कार्रवाई करेगा। अब प्रशासन को तय करना है कि वह समय रहते अपनी जिम्मेदारी निभाएगा या फिर किसी बड़े हादसे के बाद केवल मुआवजे और जांच समितियों तक सीमित रह जाएगा। क्योंकि इतिहास गवाह है जब व्यवस्था सोती है, तब हादसे नहीं, व्यवस्थागत लापरवाही लोगों की जान लेती है।

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