7.31 करोड़ वसूली का 16 साल पुराना मामला फिर सुर्खियों में EOW जांच में 9 में से 7 रॉयल्टी क्लीयरेंस सर्टिफिकेट फर्जी मिलने का दावा, दूसरी ओर के.पी.अवस्थी बोले—हाईकोर्ट ने 2016 में वसूली आदेश निरस्त किया; विभाग ने कहा- मामला न्यायालय में विचाराधीन

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7.31 करोड़ वसूली का 16 साल पुराना मामला फिर सुर्खियों में
EOW जांच में 9 में से 7 रॉयल्टी क्लीयरेंस सर्टिफिकेट फर्जी मिलने का दावा, दूसरी ओर के.पी.अवस्थी बोले—हाईकोर्ट ने 2016 में वसूली आदेश निरस्त किया; विभाग ने कहा- मामला न्यायालय में विचाराधीन
कटनी।। जिले का बहुचर्चित मेसर्स के.पी. अवस्थी प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में है। लगभग 16 वर्ष पुराने इस मामले में संचालनालय, भोपाल से आए पत्र के बाद खनिज विभाग में हलचल तेज हो गई है। मामला एक ओर करोड़ों रुपये की कथित राजस्व हानि और फर्जी रॉयल्टी क्लीयरेंस सर्टिफिकेट (RCC) के आरोपों से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर फर्म संचालक का दावा है कि 7.31 करोड़ रुपये की वसूली संबंधी आदेश को वर्ष 2016 में उच्च न्यायालय पहले ही निरस्त कर चुका है। ऐसे में यह मामला अब कानूनी और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।

EOW जांच में सामने आया था कथित फर्जीवाड़ा
उपलब्ध जांच दस्तावेजों के अनुसार, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) के तत्कालीन निरीक्षक के.बी. सिंह द्वारा की गई प्रारंभिक जांच एवं भौतिक सत्यापन में यह आरोप सामने आया था कि मेसर्स के.पी. अवस्थी ने वर्ष 2004 से 2009 के बीच पश्चिम मध्य रेलवे के विभिन्न कार्यस्थलों पर गिट्टी (बैलास्ट) आपूर्ति का कार्य किया। रेलवे से भुगतान प्राप्त करने के लिए कुल 9 रॉयल्टी क्लीयरेंस सर्टिफिकेट प्रस्तुत किए गए थे।
जांच के दौरान जब इन प्रमाण-पत्रों का खनिज विभाग, कटनी से सत्यापन कराया गया, तो कथित रूप से 9 में से केवल 2 प्रमाण-पत्र ही वास्तविक पाए गए, जबकि शेष 7 सर्टिफिकेट फर्जी और कूटरचित बताए गए।

2.90 लाख घनमीटर गिट्टी की अवैध निकासी का आरोप
EOW और खनिज विभाग की जांच में यह भी आरोप सामने आया कि जिन सात कथित फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर भुगतान लिया गया, उनके संबंध में खनिज विभाग द्वारा कभी कोई वैध रॉयल्टी जारी ही नहीं की गई थी।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 2,90,011.168 घनमीटर गिट्टी बिना वैध अनुमति के निकाली गई। उस समय लागू 28 रुपये प्रति घनमीटर की दर से शासन को लगभग 81.20 लाख रुपये की राजस्व क्षति का आकलन किया गया। इसी आधार पर खनिज विभाग ने नियमानुसार दस गुना पेनाल्टी लगाते हुए लगभग 7 करोड़ 31 लाख रुपये की वसूली का आदेश जारी किया था, जो अब पुनः चर्चा का विषय बना हुआ है।

गंभीर धाराओं में दर्ज हुआ था अपराध
जांच के बाद EOW ने अपराध क्रमांक 17/09 दर्ज करते हुए फर्म के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान दस्तावेज की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से कूटरचना), 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) सहित खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 21 तथा संबंधित खनिज नियमों के अंतर्गत मामला दर्ज किया था।

के.पी. अवस्थी का पक्ष— “वसूली आदेश पहले ही निरस्त हो चुका”
मामले में फर्म संचालक केशव प्रसाद अवस्थी ने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि यह उनके व्यावसायिक विरोधियों द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम है।
अवस्थी का कहना है कि तत्कालीन कलेक्टर द्वारा वर्ष 2013 में जारी लगभग 7.31 करोड़ रुपये की वसूली संबंधी आदेश को 1 अगस्त 2016 को उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने निरस्त कर दिया था। उनके अनुसार, वर्ष 2016 में समाप्त हो चुके वसूली प्रकरण को अब EOW के अलग आपराधिक मामले से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 21 दिसंबर 2023 को उच्च न्यायालय द्वारा EOW मामले में पूर्व में मिली अंतरिम राहत (स्टे) समाप्त की गई थी, लेकिन उसका संबंध 7.31 करोड़ रुपये की वसूली आदेश से नहीं है। अवस्थी का कहना है कि यदि संबंधित आपराधिक प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है तो अंतिम निर्णय से पहले विभाग किसी प्रकार की दंडात्मक या वसूली कार्रवाई नहीं कर सकता।

खनिज अधिकारी बोले— जांच जारी, न्यायालय के आदेश के बाद होगी आगे की कार्रवाई
इस संबंध में जब जिला खनिज अधिकारी रत्नेश दीक्षित से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया कि विभाग द्वारा जारी नोटिस के संबंध में जांच की जा रही है। उनका कहना है कि पूरा मामला न्यायालय में विचाराधीन है और न्यायालय के अंतिम आदेश के बाद ही विभाग की ओर से आगे की कार्रवाई अथवा कोई आधिकारिक टिप्पणी की जा सकेगी।

अब सबसे बड़ा सवाल
करीब डेढ़ दशक पुराने इस प्रकरण ने एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि EOW की जांच में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों रुपये के भुगतान और राजस्व हानि के आरोप प्रमाणित हुए थे, तो फिर वसूली की कार्रवाई वर्षों तक क्यों अटकी रही वहीं यदि वसूली आदेश को उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया था, तो वर्तमान में भोपाल स्तर से फिर सक्रियता क्यों दिखाई जा रही है
स्पष्ट है कि इस पूरे मामले में दो अलग-अलग कानूनी पहलू एक वसूली आदेश और दूसरा आपराधिक प्रकरण समानांतर रूप से चर्चा में हैं। अंतिम स्थिति अब न्यायालय के निर्णय और विभागीय कार्रवाई पर निर्भर करेगी। तब तक यह मामला प्रशासन, न्यायपालिका और खनिज विभाग के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा बना रहेगा।

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