शर्मसार हुई इंसानियत: हरिओम मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल ने मृत देह को बनाया बंधक, ‘ऑल इंडिया कांग्रेस सोशल ऑर्गेनाइजेशन’ के दखल के बाद मिली मुक्ति

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क्या स्वास्थ्य के नाम पर सिर्फ व्यापार हो रहा है? प्रशासन की खामोशी पर उठते गंभीर सवाल!

 

गौरेला पेंड्रा मरवाही/छत्तीसगढ़: स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर चल रही खुली लूट और अमानवीयता का एक ऐसा वीभत्स चेहरा सामने आया है, जो सीधे प्रशासन की संवेदनहीनता पर एक करारा तमाचा है। एक तरफ परिजन अपने स्वजन को खोने के गम में डूबे थे, वहीं दूसरी ओर अस्पताल प्रबंधन उनकी भावनाओं को कुचलते हुए मृत देह (शव) को ही बंधक बनाकर बैठा था। यह दर्दनाक वाकया सामने आया है, जहां ‘ऑल इंडिया कांग्रेस सोशल ऑर्गेनाइजेशन’ (All India Congress Social Organization) ने देवदूत बनकर त्वरित कार्रवाई की और मानवता को शर्मसार होने से बचाया।

 

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी और अस्पताल द्वारा जारी डेथ समरी के अनुसार, मरीज तिलबसिया बाई को 28/07/2026 को बिलासपुर स्थित हरिओम मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान दिनांक 29/07/2026 की सुबह करीब 8:00 बजे (डेथ समरी के अनुसार 8:15 AM) उन्होंने दम तोड़ दिया। लेकिन इसके बाद हरिओम मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल प्रबंधन का जो क्रूर चेहरा सामने आया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

 

प्रबंधन ने बिल या अन्य औपचारिकताओं की आड़ में मृत देह को परिजनों को सौंपने से साफ इनकार कर दिया और शव को बंधक बना लिया। एक गरीब और बेबस परिवार अपने मृत परिजन के अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार के लिए अस्पताल के चक्कर काटता रहा, लेकिन प्रशासन मूकदर्शक बना रहा।

 

संगठन ने लिया त्वरित एक्शन, छुड़ाया गया शव

जब इस अमानवीय कृत्य की भनक ‘ऑल इंडिया कांग्रेस सोशल ऑर्गेनाइजेशन’ छत्तीसगढ़ को लगी, तो बिना एक पल की देरी किए संगठन के सदस्य आज दिनांक 30/07/2026 को हरिओम मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल पहुंच गए।

 

संगठन के नेतृत्व में एक मजबूत विरोध दर्ज कराया गया, जिसके सामने अंततः हरिओम अस्पताल प्रबंधन को झुकना पड़ा। इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन और न्याय दिलाने की मुहिम में मुख्य रूप से सैयद मकसूद अली, विजय केसरवानी जी, जीतू यादव जी, अब्दुल इब्राहिम खान, पार्षद शादाब खान जी सहित कांग्रेस कमेटी के विशेष आमंत्रित सदस्य और सभी कर्मठ कार्यकर्ताओं ने अहम भूमिका निभाई। उनके इस त्वरित एक्शन की बदौलत ही तिलबसिया बाई के परिजनों को उनका शव मिल सका।

 

अपोलो का पुराना मामला: क्या ठंडे बस्ते में जाएगा यह भी?

निजी अस्पतालों की मनमानी का यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते दिनों अपोलो अस्पताल से भी ऐसा ही एक गंभीर मामला सामने आया था, जहां एक मरीज को ‘कैशलैस इलाज’ का झांसा देकर भर्ती किया गया था। लेकिन मात्र 4 दिन बाद ही उसे 1 लाख 84 हजार रुपये का भारी-भरकम बिल पकड़ा कर भुगतान करने का दबाव बनाया गया।

 

उस मामले में पीड़ित मरीज ने न्याय की आस में बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO) से गुहार लगाई थी, परंतु प्रशासन की सुस्ती देखिए कि आज तक उस मामले में कोई निदान नहीं हो सका है। अपोलो के उस मामले में प्रशासन की नाकामी के बाद, अब यह देखना होगा कि क्या जिला प्रशासन इस वर्तमान हरिओम मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के मामले (शव को बंधक बनाने) में कोई ठोस संज्ञान लेता है, या फिर निजी अस्पतालों के रसूख के आगे यह गंभीर मामला भी हमेशा की तरह ‘ठंडे बस्ते’ में दबकर रह जाएगा?

 

स्वास्थ्य मंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को लिखा जाएगा पत्र

इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘ALL INDIA Congress Social Organization’ जनता से जुड़े ऐसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दों पर मूकदर्शक नहीं रहेगा। संगठन की ओर से यह साफ कर दिया गया है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में चल रही ऐसी घोर लापरवाही, तानाशाही और मनमानी के खिलाफ एक बड़ा अभियान छेड़ा जाएगा।

 

इस अमानवीय कृत्य को लेकर संगठन जल्द ही छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय (Central Health Ministry) को एक विस्तृत पत्र लिखेगा। इस पत्र के माध्यम से यह मांग की जाएगी कि अस्पतालों में चल रही इस ‘शव-बंधक’ संस्कृति पर तत्काल रोक लगे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो।

 

इंसानियत के रूप में चलें अस्पताल, उठाए जाएंगे कड़े कदम

यह खबर प्रशासन के सीने में चुभनी चाहिए क्योंकि यह सिर्फ एक तिलबसिया बाई का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था का आइना है। ऑल इंडिया कांग्रेस सोशल ऑर्गेनाइजेशन ने संकल्प लिया है कि छत्तीसगढ़ के सभी स्वास्थ्य चिकित्सालयों (हॉस्पिटल्स) को महज ‘मुनाफाखोरी का अड्डा’ बनने से रोका जाएगा। अस्पतालों को ‘इंसानियत और सेवा’ के मूल उद्देश्य के साथ सही ढंग से चलवाने हेतु जो भी उचित और कड़े कदम उठाने होंगे, संगठन वह उठाएगा। जब तक अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों को इंसान नहीं समझा जाएगा, तब तक संगठन का यह संघर्ष सड़क से लेकर सदन तक जारी रहेगा। प्रशासन को अब नींद से जागना ही होगा!

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