108 का इंतजार करती रही मां, अस्पताल की दहलीज पर थम गई सांस एंबुलेंस नहीं मिली तो निजी वाहन से पहुंची प्रसूता, इलाज की जगह कागजी प्रक्रिया में उलझे परिजन; कटनी में 5 माह में 8वीं प्रसूता की मौत का दावा कागजों में 17 जननी वाहन, सड़कों पर सिर्फ 7! आखिर बाकी 10 एंबुलेंस कहां हैं? कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश
108 का इंतजार करती रही मां, अस्पताल की दहलीज पर थम गई सांस
एंबुलेंस नहीं मिली तो निजी वाहन से पहुंची प्रसूता, इलाज की जगह कागजी प्रक्रिया में उलझे परिजन; कटनी में 5 माह में 8वीं प्रसूता की मौत का दावा
कागजों में 17 जननी वाहन, सड़कों पर सिर्फ 7! आखिर बाकी 10 एंबुलेंस कहां हैं? कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश
कटनी। नौ माह तक एक मां अपने गर्भ में जिंदगी पालती है। परिवार उस नन्हे मेहमान के स्वागत की तैयारियों में जुटा रहता है, लेकिन जब प्रसव का समय आता है और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था ही साथ छोड़ दे, तो खुशियों का इंतजार मातम में बदल जाता है। कटनी जिले में प्रसूता महिलाओं की जान बचाने वाली 108 जननी एंबुलेंस सेवा और स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
ढीमरखेड़ा तहसील के खमरिया गांव की 24 वर्षीय गर्भवती गुलाब बाई कोल की मौत ने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों का आरोप है कि प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद उन्होंने तत्काल 108 जननी एंबुलेंस के लिए संपर्क किया, लेकिन करीब दो घंटे तक वाहन नहीं पहुंचा। कॉल सेंटर से लगातार कुछ देर में एंबुलेंस पहुंचने का भरोसा मिलता रहा, लेकिन इंतजार खत्म नहीं हुआ।
आखिरकार परिजनों को निजी वाहन का सहारा लेना पड़ा। प्रसूता को खमतरा स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। दोपहर करीब एक बजे परिजन जिला अस्पताल पहुंचे, लेकिन पति के अनुसार यहां भी तत्काल चिकित्सा सुविधा मिलने के बजाय उन्हें अस्पताल की प्रक्रियाओं और अलग-अलग कमरों के चक्कर लगाने पड़े। इसी दौरान प्रसूता की हालत बिगड़ती गई और आखिरकार उसने अस्पताल की दहलीज पर ही दम तोड़ दिया।
दो घंटे का इंतजार… क्या यही है आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा?
मृतका के पति मोजन कोल का आरोप है कि यदि समय पर एंबुलेंस मिल जाती और जिला अस्पताल पहुंचने के बाद तत्काल उपचार शुरू हो जाता, तो उनकी पत्नी की जान बच सकती थी।
यह आरोप अब केवल एक परिवार का दर्द नहीं रह गया है। सवाल यह है कि जब प्रसव पीड़ा जैसी आपात स्थिति में 108 वाहन दो घंटे तक नहीं पहुंचता, तो ग्रामीण क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था का उद्देश्य ही यही है कि प्रसव जैसी स्थिति में गर्भवती महिला को समय पर सुरक्षित स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया जाए। लेकिन यदि वाहन उपलब्ध नहीं है, तो पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ही निष्प्रभावी हो जाता है।
कागजों में 17, सड़क पर सिर्फ 7 जननी वाहन!
जिले में जननी एवं इमरजेंसी परिवहन व्यवस्था को लेकर सामने आए आंकड़े और भी चिंताजनक हैं। जानकारी के अनुसार जिले के लिए 17 जननी इमरजेंसी वाहन आवंटित हैं, लेकिन धरातल पर केवल 7 वाहन ही सेवा में बताए जा रहे हैं।
यानी आवंटित वाहनों और वास्तविक संचालन के बीच बड़ा अंतर है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है—
बाकी 10 वाहन कहां हैं?
क्या वे खराब हैं
क्या उनका संचालन बंद है
क्या उनमें चालक उपलब्ध नहीं हैं
क्या वाहनों के संचालन के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं
या फिर सरकारी रिकॉर्ड और धरातल की व्यवस्था में कोई बड़ा अंतर है। इन सवालों का स्पष्ट जवाब जिले के जिम्मेदार स्वास्थ्य अधिकारियों को देना चाहिए।
पांच महीने में आठवीं प्रसूता की मौत का दावा
सबसे गंभीर बात यह है कि परिजनों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार पिछले पांच महीनों में एंबुलेंस की अनुपलब्धता अथवा समय पर इलाज न मिलने से आठ प्रसूताओं की मौत का दावा सामने आया है।
यदि यह आंकड़ा जांच में सही पाया जाता है तो यह सामान्य प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं होगा, बल्कि जिले की मातृ स्वास्थ्य एवं आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की गंभीर विफलता माना जाएगा।
हर प्रसूता की मौत के बाद यदि केवल जांच बैठती रही और व्यवस्था में स्थायी सुधार नहीं हुआ, तो जांच का औचित्य भी सवालों के घेरे में आएगा।
अस्पताल में कागज जरूरी हैं, लेकिन जिंदगी से पहले नहीं
अस्पतालों में दस्तावेज और पंजीयन प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन आपात स्थिति में उपचार से पहले कागजी प्रक्रिया को प्राथमिकता दिए जाने का आरोप बेहद गंभीर है।
यदि प्रसूता की हालत गंभीर थी तो प्राथमिकता जान बचाने की होनी चाहिए थी, कागजी औपचारिकताओं की नहीं।
यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु होना चाहिए कि जिला अस्पताल पहुंचने के बाद गुलाब बाई को कितने समय में चिकित्सकीय परीक्षण मिला, किस डॉक्टर ने उसे देखा, क्या तत्काल उपचार शुरू हुआ और डिलीवरी वार्ड तक पहुंचाने में कितना समय लगा।
कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश
मामले की जानकारी मिलने के बाद कटनी कलेक्टर आशीष तिवारी ने प्रसूता की मौत की परिस्थितियों की जांच कराने की बात कही है। कलेक्टर के अनुसार मौत किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जांच कराई जाएगी और जांच के आधार पर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
अब निगाहें इस जांच पर हैं। सवाल यह है कि जांच केवल संबंधित स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका तक सीमित रहेगी या फिर 108 सेवा, एंबुलेंस संचालन, कॉल रिस्पॉन्स, वाहन की लोकेशन, अस्पताल में पहुंचने का समय और उपचार शुरू होने तक की पूरी टाइमलाइन की भी जांच होगी।
शासन को जगाने वाला सवाल—आखिर कब सुधरेगी व्यवस्था?
गुलाब बाई की मौत के बाद अब सरकार और स्वास्थ्य विभाग के सामने कई सीधे सवाल खड़े हैं—
1. 17 स्वीकृत जननी/इमरजेंसी वाहनों में से केवल 7 के संचालन की वास्तविक वजह क्या है?
2. शेष 10 वाहनों की वर्तमान स्थिति क्या है?
3. 108 कॉल करने के बाद गुलाब बाई को एंबुलेंस मिलने में कितना समय लगा और देरी क्यों हुई?
4. कॉल सेंटर और एंबुलेंस की वास्तविक लोकेशन का रिकॉर्ड क्या कहता है?
5. जिला अस्पताल पहुंचने के बाद प्रसूता को तत्काल चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिली—यदि परिजनों के आरोप सही हैं?
6. पिछले पांच महीनों में मृत हुई आठ प्रसूताओं के मामलों की समीक्षा क्यों नहीं हुई?
7. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए पर्याप्त एंबुलेंस और वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था क्यों नहीं है?
8. क्या दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर जवाबदेही तय होगी?
यह सिर्फ गुलाब बाई की मौत नहीं, व्यवस्था की परीक्षा है
एक गरीब ग्रामीण परिवार के लिए निजी वाहन का खर्च उठाना भी आसान नहीं होता। प्रसव पीड़ा में महिला को समय पर अस्पताल पहुंचाना परिवार की नहीं, सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
यदि एक गर्भवती महिला को दो घंटे तक सरकारी एंबुलेंस का इंतजार करना पड़े, फिर निजी वाहन से अस्पताल पहुंचना पड़े और अस्पताल की दहलीज पर उसकी मौत हो जाए, तो यह पूछना जरूरी है कि आखिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था किसके लिए है?
कटनी को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी गर्भवती महिला की जिंदगी 108 की उपलब्धता, ड्राइवर की तलाश, वाहन की खराबी या कागजी औपचारिकताओं पर निर्भर न हो।
गुलाब बाई अब वापस नहीं आएगी। लेकिन यदि इस मौत के बाद भी व्यवस्था नहीं जागी, तो अगली मौत को केवल एक और आंकड़ा मान लेना होगा।
सरकार को अब फाइल नहीं, फील्ड में उतरकर जवाब देना होगा—कितनी और माताओं की जान जाने के बाद कटनी की स्वास्थ्य व्यवस्था को गंभीरता से लिया जाएगा?