खाली लेटर पैड पर हस्ताक्षर से लेकर रिकवरी की धमकी तक… वेयरहाउसिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल वेयरहाउस संचालकों का आरोप—दबाव बनाया जा रहा, अधिक नमी वाली धान भेजकर बाद की घटती का जिम्मा भी हम पर….कलेक्टर-एसपी की जनसुनवाई में पहुंचा मामला
खाली लेटर पैड पर हस्ताक्षर से लेकर रिकवरी की धमकी तक… वेयरहाउसिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल
वेयरहाउस संचालकों का आरोप—दबाव बनाया जा रहा, अधिक नमी वाली धान भेजकर बाद की घटती का जिम्मा भी हम पर….कलेक्टर-एसपी की जनसुनवाई में पहुंचा मामला
कटनी।। धान का एक-एक दाना सरकारी व्यवस्था की निगरानी में खरीदा, तौला और भंडारित किया जाता है, लेकिन यदि इसी प्रक्रिया में गुणवत्ता, नमी, तौल और दस्तावेजों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होने लगें तो मामला केवल एक गोदाम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी वेयरहाउसिंग व्यवस्था की कार्यप्रणाली कठघरे में आ जाती है। कटनी में मंगलवार को कुछ ऐसा ही मामला सामने आया, जब कटनी वेयरहाउसिंग एसोसिएशन ने मध्यप्रदेश वेयरहाउसिंग एवं लॉजिस्टिक्स कॉर्पोरेशन (MPWLC) की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर शिकायतें कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के समक्ष रखीं। एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने जनसुनवाई में आवेदन देकर MPWLC में कार्यरत नीरज दुबे एवं जिला प्रबंधक जोगेन्द्र सिंह सेंगर की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। संघ का कहना है कि कुछ वेयरहाउस संचालकों पर अनावश्यक दबाव बनाया जा रहा है और कथित तौर पर खाली लेटर पैड पर हस्ताक्षर कराने का प्रयास किया जा रहा है। आरोप है कि ऐसा करने से इनकार करने वाले संचालकों को ब्लैकलिस्ट करने, रिकवरी निकालने अथवा नोटिस जारी करने जैसी कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल हस्ताक्षर आखिर किस दस्तावेज पर और किस जिम्मेदारी के साथ
वेयरहाउस एसोसिएशन की शिकायत में सबसे गंभीर बिंदुओं में से एक खाली लेटर पैड पर हस्ताक्षर कराने का कथित दबाव है। यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो यह महज विभागीय प्रक्रिया का मामला नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और दस्तावेजी जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगा। क्योंकि किसी भी वेयरहाउस संचालक से हस्ताक्षर लेने का उद्देश्य, दस्तावेज की प्रकृति, उसमें दर्ज तथ्य और उसके बाद बनने वाली जिम्मेदारी स्पष्ट होना आवश्यक है। ऐसे में संघ की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह पता लगाया जाए कि किन परिस्थितियों में ऐसे हस्ताक्षर लिए गए या लेने का प्रयास किया गया।
गीली धान गोदाम में पहुंचे तो घटती का जिम्मेदार कौन
इस पूरे विवाद का दूसरा और उससे भी बड़ा पहलू धान की नमी और गुणवत्ता है। वेयरहाउस संचालकों का कहना है कि खरीद समितियों से अत्यधिक नमी वाली धान प्राप्त होने के बाद उसे भंडारण के लिए गोदामों में भेजा जाता है। संचालकों के अनुसार, जब वे निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप धान उपलब्ध कराने अथवा अत्यधिक गीली धान के भंडारण में आने वाली – कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं, तो कथित रूप से उनके विरुद्ध शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न करने संबंधी कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है। यहीं से वह सवाल पैदा होता है, जिसका जवाब पूरी व्यवस्था को देना होगा। धान जब वेयरहाउस पहुंची, उस समय उसकी नमी कितनी थी, तौल क्या थी, गुणवत्ता क्या थी, रिकॉर्ड में क्या दर्ज हुआ और यदि बाद में वजन में कमी आती है तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी।
आज नमी का सवाल, कल रिकवरी का बोझ
धान के भंडारण में नमी केवल गुणवत्ता का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध वजन, भंडारण क्षमता, खराबे, घटती और भविष्य में निकलने वाली रिकवरी से जुड़ सकता है। ऐसे में यदि प्राप्ति के समय नमी और गुणवत्ता का स्पष्ट एवं प्रमाणित रिकॉर्ड नहीं है, तो बाद में पैदा होने वाले विवाद में वास्तविक जिम्मेदारी तय करना मुश्किल यही कारण है कि वेयरहाउस एसोसिएशन ने धान की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है—खरीद समिति से लेकर कांटा, तौल, परिवहन, वेयरहाउस में प्रवेश, गुणवत्ता एवं नमी परीक्षण, भंडारण और बाद के रिकॉर्ड तक।

सिर्फ वेयरहाउस ही जिम्मेदार क्यों
संघ का मूल सवाल यही दिखाई देता है कि यदि धान की पूरी सप्लाई चेन में कई स्तर शामिल हैं तो किसी कमी या घटती की स्थिति में केवल वेयरहाउस संचालक को जिम्मेदार मानने से पहले बाकी स्तरों की भूमिका की भी जांच क्यों न हो
धान की खरीद समिति से निकलने के बाद परिवहन, तौल, नमी, गुणवत्ता और भंडारण तक कई प्रक्रियाएं होती हैं। प्रत्येक चरण का रिकॉर्ड और जिम्मेदारी यदि स्पष्ट हो तो विवाद की स्थिति में यह आसानी से निर्धारित किया जा सकता है कि कमी आखिर कहां हुई।
यानी सवाल वेयरहाउस संचालक बनाम विभाग का नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही तय करने का है।
यहां प्रशासन के सामने दो समान रूप से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। पहली यदि किसी वेयरहाउस संचालक ने नियमों का उल्लंघन किया है तो कार्रवाई होनी चाहिए। दूसरी यदि संचालक किसी ऐसी परिस्थिति की शिकायत कर रहे हैं, जिसका बाद में वित्तीय या कानूनी भार उन्हीं पर आ सकता है, तो उनकी शिकायत की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही जरूरी है। किसी भी उच्च पद पर बैठे अधिकारी के संबंध में लगाए गए आरोपों को केवल शिकायत के आधार पर सत्य मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन गंभीर आरोपों को इसलिए नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा कि वे किसी अधिकारी के विरुद्ध हैं। निष्पक्ष जांच ही वह रास्ता है जो आरोप को आरोप से अलग करके तथ्य तक पहुंच सकती है।
खाली लेटर पैड पर हस्ताक्षर कराने के आरोप हों या अत्यधिक नमी वाली धान भेजे जाने का मुद्दा—दोनों मामलों में दस्तावेज, रिकॉर्ड, मौके की स्थिति और संबंधित पक्षों के बयान सामने रखकर जांच की जा सकती है।

एसोसिएशन की प्रमुख मांगें
वेयरहाउस संचालकों ने प्रशासन के सामने मांग रखी है कि,धान प्राप्ति के समय नमी एवं गुणवत्ता की विधिवत जांच कर उसका रिकॉर्ड तैयार किया जाए। तौल और गुणवत्ता परीक्षण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।
धान के उठाव, परिवहन, तौल, भंडारण और दस्तावेजों की पूरी प्रक्रिया की तथ्यात्मक जांच हो। घटती अथवा रिकवरी की स्थिति में केवल वेयरहाउस संचालक को जिम्मेदार मानने के बजाय प्रत्येक स्तर की भूमिका निर्धारित की जाए। यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी, समिति या संचालक की लापरवाही सामने आती है तो जांच के आधार पर संबंधित की जिम्मेदारी तय की जाए। संचालकों पर कथित अनावश्यक दबाव और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने के आरोपों की भी जांच की जाए।
धान से ज्यादा महत्वपूर्ण है जिम्मेदारी का हिसाब
कटनी में उठा यह विवाद मूलतः धान के दाने से ज्यादा उस दाने की जिम्मेदारी का सवाल है। यदि धान की नमी जांच से लेकर अंतिम भंडारण तक हर स्तर पर रिकॉर्ड पारदर्शी है तो किसी भी घटती अथवा गुणवत्ता विवाद में जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था तक पहुंचना कठिन नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि रिकॉर्ड अस्पष्ट हैं, नमी की जांच पर सवाल हैं और बाद में रिकवरी का पूरा भार वेयरहाउस संचालक पर आता है, तो विवाद स्वाभाविक है।
अब गेंद प्रशासन के पाले में है। आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला शिकायत नहीं बल्कि निष्पक्ष जांच के दस्तावेज करेंगे। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के समक्ष पहुंची शिकायत के बाद आवश्यकता इस बात की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, संबंधित अधिकारियों और वेयरहाउस संचालकों दोनों का पक्ष सुना जाए और यदि कहीं अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जाए। क्योंकि सरकारी धान की व्यवस्था में जवाबदेही किसी एक की नहीं, हर उस स्तर की होनी चाहिए जहां दाना तौला, जांचा, उठाया, पहुंचाया और सुरक्षित रखा जाता है।