जुलाई में सौंपी साइकिल, अगस्त में वापस ‘साइकिल वापस हुई है, सवाल नहीं’ बच्चों ने पूछा—अगर अपात्र थे तो पहले पात्र किसने बनाया ढीमरखेड़ा के महगवां से जनसुनवाई तक पहुंची विद्यार्थियों की फरियाद योजना के क्रियान्वयन पर उठे गंभीर सवाल, जांच में तय होगी जिम्मेदारी
जुलाई में सौंपी साइकिल, अगस्त में वापस ‘साइकिल वापस हुई है, सवाल नहीं’
बच्चों ने पूछा—अगर अपात्र थे तो पहले पात्र किसने बनाया
ढीमरखेड़ा के महगवां से जनसुनवाई तक पहुंची विद्यार्थियों की फरियाद योजना के क्रियान्वयन पर उठे गंभीर सवाल, जांच में तय होगी जिम्मेदारी

कटनी। सरकारी योजना का उद्देश्य यदि बच्चों को स्कूल तक पहुंचने का साधन उपलब्ध कराना है, तो उस योजना का लाभ देने के बाद महज एक महीने में वही सुविधा वापस ले लेना केवल विद्यार्थियों की परेशानी का विषय नहीं, बल्कि योजना के क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करने वाला मामला है।
ढीमरखेड़ा जनपद पंचायत के ग्राम महगवां के शासकीय हाई स्कूल पड़रभटा में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं का यही सवाल मंगलवार को जिला जनसुनवाई में प्रशासन के सामने पहुंचा। विद्यार्थियों का कहना है कि उन्हें जुलाई में शासन की निःशुल्क साइकिल योजना के तहत साइकिलें दी गई थीं। करीब एक माह बाद अगस्त में स्कूल प्रबंधन द्वारा यह कहते हुए साइकिलें वापस ले ली गईं कि वे योजना के लिए पात्र नहीं हैं।
अब बच्चों की शिकायत ने शिक्षा विभाग के सामने एक सीधा और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है। यदि विद्यार्थी अपात्र थे, तो उनके नाम पात्र हितग्राहियों की सूची में कैसे आए और उन्हें साइकिलें वितरित किस आधार पर की गईं।
मामले को केवल साइकिल वापस लेने की घटना मानकर समाप्त नहीं किया जा सकता। मध्यप्रदेश शासन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार निःशुल्क साइकिल वितरण योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन सुविधा के अभाव में विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए आवागमन की वैकल्पिक सुविधा उपलब्ध कराना है। योजना में निर्धारित परिस्थितियों में ग्रामीण क्षेत्र के कक्षा 6वीं और 9वीं के विद्यार्थियों को साइकिल का प्रावधान है। आधिकारिक विवरण में यह भी उल्लेख है कि गांव में संबंधित स्तर का शासकीय विद्यालय उपलब्ध न होने तथा अन्य गांव/शहर में शासकीय विद्यालय जाने वाले पात्र विद्यार्थियों को योजना का लाभ दिया जाता है।

यानी पात्रता कोई मौखिक या बाद में तय होने वाली व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। हितग्राही का चयन, दस्तावेजों का परीक्षण और वितरण से पहले पात्रता का सत्यापन इन सभी चरणों की अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी है। यहीं से इस पूरे मामले की असली जांच शुरू होती है।

पहले दी क्यों और फिर वापस क्यों
महगवां के इन विद्यार्थियों के अनुसार उनका घर स्कूल से लगभग दो किलोमीटर दूर है। ऐसे में साइकिल उनके लिए सुविधा से अधिक स्कूल तक नियमित पहुंच का साधन है। जनसुनवाई में पहुंचे विद्यार्थियों में रितिक/सीरालाल हल्दकार, सत्येंद्र/नोनेलाल नाई, वेद/मुकेश कुमार राजपाल, दिव्यांशु/दीपक राजपाल, योगिता/कामता प्रसाद राजपाल, रोहणी/प्रेमलाल बसोर, रिया/सुदामा राजपाल, मानवी/अमित और सानिया/ईश्वरी प्रसाद राजपाल शामिल बताए गए हैं।
बच्चों की शिकायत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि उन्हें पहले योजना का लाभ दिया गया और फिर उसी लाभ को वापस ले लिया गया।
यदि जांच में यह साबित होता है कि विद्यार्थी वास्तव में अपात्र थे, तब भी यह सवाल बना रहेगा कि वितरण से पहले पात्रता की जांच किस स्तर पर हुई थी। और यदि विद्यार्थी पात्र पाए जाते हैं, तो साइकिल वापस लेने का निर्णय किस आधार पर हुआ यह भी स्पष्ट करना होगा।


बच्चों की पढ़ाई के बीच प्रशासनिक प्रक्रिया की ‘उलझन’ क्यों
सरकारी योजनाओं में पात्रता की जांच का उद्देश्य ही यही होता है कि लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे और सरकारी संसाधनों का गलत वितरण न हो। लेकिन इस प्रकरण में यदि विद्यार्थियों को पहले साइकिलें वितरित की गईं और बाद में वापस ले ली गईं, तो यह प्रक्रिया की समीक्षा का विषय अवश्य बनता है। यहां सवाल केवल प्राचार्य तक सीमित नहीं होना चाहिए। हितग्राही चयन से लेकर सूची तैयार करने, सत्यापन, अनुमोदन और वितरण तक जिस-जिस स्तर की भूमिका थी, उसकी जांच होनी चाहिए। क्योंकि किसी योजना की गलती का खामियाजा अंततः उस बच्चे को नहीं भुगतना चाहिए, जो केवल पढ़ने के लिए रोज स्कूल जा रहा है।
शासन की योजना, जिम्मेदारी भी शासन की
निःशुल्क साइकिल योजना का घोषित उद्देश्य ही ग्रामीण विद्यार्थियों के आवागमन की समस्या को कम करना है। ऐसे में यदि योजना के क्रियान्वयन में कहीं त्रुटि हुई है, तो प्रशासन के सामने दो समानांतर जिम्मेदारियां हैं—
पहली—वास्तविक पात्रता का निष्पक्ष निर्धारण।
दूसरी—गलत चयन या गलत वितरण हुआ तो उसकी जिम्मेदारी तय करना।
सिर्फ यह कह देना कि विद्यार्थी अपात्र हैं, मामले का समाधान नहीं है। प्रशासन को यह भी बताना होगा कि अपात्रता का पता वितरण के समय क्यों नहीं चला।
जांच में सामने आने चाहिए पांच जवाब
इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच के दौरान कम से कम इन बिंदुओं को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए
विद्यार्थियों के नाम साइकिल वितरण की सूची में किस आधार पर शामिल किए गए।
वितरण से पहले उनकी पात्रता का सत्यापन किस अधिकारी/कर्मचारी ने किया।
जुलाई में साइकिल वितरित करने के बाद अगस्त में अपात्रता किस जांच में सामने आई।
साइकिल वापस लेने का लिखित आदेश किस स्तर से जारी हुआ।
यदि विद्यार्थियों को गलत तरीके से साइकिल दी गई थी, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।
शिक्षा विभाग की परीक्षा भी
मामला सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी सच्चिदानंद पांडे ने जांच कराए जाने की बात कही है। अब इस जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता महत्वपूर्ण होगी। बच्चों की शिकायत का निराकरण केवल कागज पर नहीं, बल्कि पात्रता के स्पष्ट निर्धारण और जिम्मेदारी तय करने के साथ होना चाहिए। यदि विद्यार्थी पात्र हैं तो उन्हें उनका लाभ मिलना चाहिए और यदि अपात्र हैं तो उन्हें अपात्र घोषित करने का स्पष्ट नियम, दस्तावेज और कारण सामने रखा जाना चाहिए।
पहले सरकारी मुहर, फिर अपात्र का तमगा
ग्राम महगवां, ग्राम पंचायत महगवां (बड़खेरा), जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा के इन विद्यार्थियों का कहना है कि उनके घर स्कूल से करीब दो किलोमीटर दूर हैं। जुलाई में शासन की योजना के तहत उन्हें निःशुल्क साइकिल मिली। यानी उस समय विभागीय प्रक्रिया पूरी हुई, नाम सूची में आए और साइकिल उनके हाथों तक पहुंची।
लेकिन अगस्त आते-आते कहानी बदल गई। स्कूल प्रबंधन की ओर से कहा गया कि विद्यार्थी योजना के लिए पात्र नहीं हैं और उनसे साइकिलें वापस ले ली गईं।
अब सवाल यह है कि पात्रता की जांच साइकिल देने से पहले हुई थी या साइकिल वापस लेने के बाद अगर जांच पहले हुई थी तो गलती किसकी,अगर जांच बाद में हुई तो सरकारी योजना के लाभार्थियों की सूची तैयार करने में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। क्योंकि साइकिल वापस लेने से मामला खत्म नहीं हुआ है। बल्कि असली सवाल अब शुरू हुआ है।
“बच्चों को साइकिल देने का फैसला सही था या वापस लेने का? और अगर एक फैसला गलत था, तो उस गलत फैसले की जिम्मेदारी किसकी है?” बच्चों की साइकिल लौटे या न लौटे, लेकिन इस मामले में जवाबदेही जरूर लौटनी चाहिए।
यह प्रकरण एक सरकारी योजना की उस कमजोर कड़ी की ओर ध्यान खींचता है, जहां कागज पर सही दिखने वाली प्रक्रिया जमीन पर बच्चे की परेशानी बन सकती है। एक विद्यार्थी के हाथ में सरकारी योजना की साइकिल पहुंचना केवल वितरण का आंकड़ा नहीं है। उसके पीछे शासन का बजट, विभागीय प्रक्रिया, स्कूल स्तर का सत्यापन और बच्चे की उम्मीद जुड़ी होती है।
इसलिए यदि वही साइकिल एक महीने बाद वापस लेनी पड़ती है, तो प्रशासन को सिर्फ साइकिल वापस लेने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे यह भी तलाशना चाहिए कि गलती हुई कहां।
बच्चे ने साइकिल मांगी है, लेकिन इस शिकायत ने व्यवस्था से उससे कहीं बड़ा सवाल पूछ लिया है “अगर हम अपात्र थे, तो हमारी पात्रता तय किसने की थी ”
अब इस सवाल का जवाब बच्चों को नहीं, शिक्षा विभाग और प्रशासन को देना है।