नगर निगम में वेतनवृद्धि और ब्लैकलिस्टिंग का हंटर, बजा जबाबदेही का अलार्म पाँच घंटे की समीक्षा में खुली कार्यप्रणाली की परतें, तीन लिपिकों की वेतनवृद्धि पर रोक;अब लापरवाह ठेकेदारों की बारी भूमिपूजन के बाद भी काम शुरू नहीं, फाइलों में अधूरी जानकारी और विकास कार्यों पर सवाल आखिर जनता को समय पर जवाब कौन देगा
नगर निगम में वेतनवृद्धि और ब्लैकलिस्टिंग का हंटर, बजा जबाबदेही का अलार्म
पाँच घंटे की समीक्षा में खुली कार्यप्रणाली की परतें, तीन लिपिकों की वेतनवृद्धि पर रोक;अब लापरवाह ठेकेदारों की बारी
भूमिपूजन के बाद भी काम शुरू नहीं, फाइलों में अधूरी जानकारी और विकास कार्यों पर सवाल आखिर जनता को समय पर जवाब कौन देगा
कटनी।। नगर निगम में लोक निर्माण शाखा के विकास कार्यों की समीक्षा के दौरान निगमायुक्त सुश्री तपस्या परिहार द्वारा दिए गए सख्त निर्देशों ने नगर निगम की कार्यप्रणाली, अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही और निर्माण कार्यों की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब पाँच घंटे तक चली समीक्षा बैठक में तीन लिपिकों की एक-एक वेतनवृद्धि रोकने के निर्देश, विकास कार्यों में देरी करने वाले ठेकेदारों के विरुद्ध नोटिस से लेकर ब्लैकलिस्टिंग तक की कार्रवाई प्रस्तावित करने की हिदायत और विभागीय कामकाज की नियमित समीक्षा के आदेश—ये महज प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि सरकारी कामकाज में जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत का स्पष्ट संकेत हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल समीक्षा बैठकों, नोटिसों और वेतनवृद्धि रोकने से कटनी के विकास कार्यों की तस्वीर बदलेगी, या अब जमीनी स्तर पर भी जवाबदेही का वास्तविक हिसाब होगा
पाँच घंटे की बैठक, लेकिन जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?
नगर निगम में विकास कार्यों का उद्देश्य केवल स्वीकृति जारी करना, भूमिपूजन करना या फाइलों में प्रगति दर्ज करना नहीं है। असली कसौटी यह है कि सड़क कब बनेगी, नाली कब तैयार होगी, निर्माण की गुणवत्ता कैसी होगी और नागरिकों को सुविधा कब मिलेगी।
निगमायुक्त की समीक्षा में वार्डवार स्वीकृत, प्रगतिरत और लंबित कार्यों की जानकारी मांगी गई। सही एवं अद्यतन जानकारी का पत्रक प्रस्तुत नहीं करने पर तीन लिपिकों के विरुद्ध वेतनवृद्धि रोकने के निर्देश दिए गए। इससे एक बुनियादी प्रश्न सामने आता है,यदि विभाग के पास विकास कार्यों का सटीक और अद्यतन रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है, तो उनकी प्रगति, समय-सीमा और गुणवत्ता की प्रभावी निगरानी किस आधार पर हो रही थी।
यह प्रश्न किसी एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है। यह उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें जानकारी संधारित करने वाले कर्मचारी से लेकर निगरानी करने वाले अधिकारियों तक हर स्तर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
भूमिपूजन के बाद भी काम शुरू नहीं तो जिम्मेदारी किसकी
सरकारी निर्माण कार्यों में भूमिपूजन के बाद नागरिकों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। लोग उम्मीद करते हैं कि अब उनके वार्ड की सड़क बनेगी, जलनिकासी की समस्या दूर होगी और लंबे समय से लंबित सुविधा का लाभ मिलेगा। लेकिन समीक्षा बैठक में ऐसे प्रकरणों पर नाराजगी जताई गई, जिनमें अनुबंध और भूमिपूजन की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद कार्य प्रारंभ नहीं हुए थे या अनावश्यक देरी सामने आई थी। यह स्थिति प्रशासनिक निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है। यदि किसी निर्माण कार्य के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, तो उसके प्रारंभ में देरी के कारणों का दस्तावेजी परीक्षण होना चाहिए। क्या ठेकेदार ने निर्धारित समय पर काम शुरू नहीं किया। क्या कार्यस्थल, तकनीकी स्वीकृति या अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं में बाधा थी।क्या संबंधित अधिकारी ने समय रहते समस्या की सूचना दी और क्या अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई की गई। इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। देरी के लिए जिम्मेदारी तय किए बिना विकास की समय-सीमा तय करना केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह सकता है।
ठेकेदारों के लिए स्पष्ट संदेश:-अनुबंध जिम्मेदारी है, विकल्प नहीं
निगमायुक्त ने निर्देश दिए हैं कि विकास कार्यों में अनावश्यक देरी या लापरवाही करने वाले ठेकेदारों के विरुद्ध नियमानुसार नोटिस जारी कर कार्रवाई प्रस्तावित की जाए। गंभीर लापरवाही की स्थिति में ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई भी की जाए। यह निर्देश महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकारी निर्माण कार्य किसी निजी सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन से जनता की जरूरतें पूरी करने के लिए किए जाते हैं।
हालांकि, किसी ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई का निर्णय केवल आरोप या देरी के उल्लेख के आधार पर नहीं, बल्कि अनुबंध की शर्तों, दर्ज तथ्यों, संबंधित पक्ष के स्पष्टीकरण और लागू नियमों के अनुरूप होना चाहिए। जहां उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां कार्रवाई समयबद्ध और प्रभावी होनी चाहिए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कितने लंबित कार्यों की पहचान होती है, कितने मामलों में नोटिस जारी किए जाते हैं, कितने प्रकरणों में देरी के कारण दर्ज किए जाते हैं और कितने मामलों में नियमों के अनुसार अंतिम कार्रवाई होती है।
नोटिस जारी होना कार्रवाई की शुरुआत है, जनता को वास्तविक परिणाम तब दिखेगा, जब लंबित निर्माण कार्य धरातल पर पूरे होंगे।
अधिकारियों की भी तय हो जवाबदेही, केवल कर्मचारियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं
समीक्षा बैठक में तीन लिपिकों की वेतनवृद्धि रोकने के निर्देश दिए जाने की खबर सामने आई है। यह कार्रवाई सही एवं अद्यतन जानकारी प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी को रेखांकित करती है। लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही का दायरा इससे कहीं बड़ा है।
यदि किसी वार्ड का निर्माण कार्य लंबे समय से लंबित है, तो उसकी निगरानी किस अधिकारी के जिम्मे थी। यदि ठेकेदार ने काम शुरू नहीं किया, तो संबंधित उपयंत्री ने कब निरीक्षण किया,यदि कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हुई, तो उसका परीक्षण किस स्तर पर हुआ। और यदि फाइलों में जानकारी अद्यतन नहीं थी, तो उसकी समीक्षा करने वाले अधिकारियों ने समय रहते सुधार क्यों नहीं कराया।
एक प्रभावी प्रशासन में लिपिकीय त्रुटि, तकनीकी निगरानी की कमी, ठेकेदार की लापरवाही और वरिष्ठ स्तर पर समीक्षा की विफलता इन सभी की जांच उनकी वास्तविक भूमिका के अनुसार होनी चाहिए। जहां गलती प्रमाणित हो, वहां पद या स्तर के बजाय साक्ष्य और नियमों के आधार पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
ई-ऑफिस, अलग-अलग रजिस्टर और दैनिक समीक्षा अब आदेशों का पालन कितना होगा
निगमायुक्त ने प्रत्येक फाइल ई-ऑफिस के माध्यम से ऑनलाइन चलाने, शासन, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों के पत्रों के लिए अलग-अलग रजिस्टर संधारित करने तथा विभागीय कार्यों की रोजाना समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। ये निर्देश प्रशासनिक पारदर्शिता और रिकॉर्ड प्रबंधन को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन इनकी उपयोगिता तभी सिद्ध होगी, जब इनका पालन नियमित रूप से हो और रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय भी लिए जाएं।
ई-ऑफिस में फाइल दर्ज होना अपने आप में समस्या का समाधान नहीं है। जरूरी है कि फाइल किस अधिकारी के पास लंबित है, किस स्तर पर निर्णय होना है, किस समय-सीमा में कार्रवाई अपेक्षित है और विलंब होने पर उसका कारण क्या है इन बिंदुओं की निगरानी भी सुनिश्चित की जाए। इसी तरह नागरिकों के आवेदनों और पत्रों का रजिस्टर तभी उपयोगी होगा, जब उनकी प्राप्ति, संबंधित शाखा को भेजे जाने, निराकरण और जवाब दिए जाने की स्थिति का नियमित परीक्षण हो।
कटनी की जनता को चाहिए वार्डवार विकास का वास्तविक हिसाब
अब नगर निगम प्रशासन के सामने सबसे महत्वपूर्ण अवसर यह है कि समीक्षा बैठक के निर्देशों को मापने योग्य परिणामों में बदला जाए। जनहित में नगर निगम को वार्डवार विकास कार्यों की ऐसी अद्यतन स्थिति उपलब्ध कराने पर विचार करना चाहिए, जिसमें निम्न जानकारियां स्पष्ट हों:-
स्वीकृत कार्य: किस वार्ड में कौन-सा कार्य स्वीकृत है और उसकी अनुमानित लागत कितनी है?
निर्माण की स्थिति: कौन-सा काम शुरू हुआ, कौन-सा लंबित है और कौन-सा पूरा हो चुका है?
समय-सीमा: कार्य पूरा करने की निर्धारित तारीख क्या है और देरी होने पर कारण क्या है?
गुणवत्ता परीक्षण: पूर्ण या प्रगतिरत कार्यों का निरीक्षण कब हुआ और निष्कर्ष क्या रहे?
ठेकेदारों पर कार्रवाई: किन मामलों में नोटिस जारी हुए और किनमें नियमानुसार अंतिम निर्णय लिया गया?
नागरिक शिकायतें: संबंधित वार्ड की शिकायतों का निराकरण कब तक किया जाना है?
इस प्रकार की जानकारी उपलब्ध होने से नागरिकों को अपने क्षेत्र के विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी और प्रशासनिक समीक्षा के परिणामों का आकलन भी किया जा सकेगा।
टीएल बैठक में रिपोर्ट:-केवल आंकड़े नहीं, कार्रवाई का हिसाब भी जरूरी
निगमायुक्त ने लोक निर्माण शाखा के अधिकारियों-कर्मचारियों को विकास कार्यों की अद्यतन जानकारी समय-सीमा की बैठक में प्रस्तुत करने तथा लंबित प्रकरणों पर कार्रवाई पूर्ण कर पोर्टल पर जानकारी दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।
अब अगली समीक्षा में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि कितने कार्य लंबित हैं। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वे लंबित क्यों हैं, उन्हें पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए गए, किस स्तर पर बाधा है और समाधान की समय-सीमा क्या निर्धारित की गई है।
प्रशासनिक बैठकों की सफलता का पैमाना बैठक की अवधि या निर्देशों की संख्या नहीं, बल्कि पिछली बैठक में दिए गए निर्देशों के अनुपालन और जनता को मिले वास्तविक लाभ से तय होना चाहिए। यदि हर बैठक में वही पुराने लंबित प्रकरण दोहराए जाते हैं, तो समीक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसके विपरीत, यदि हर प्रकरण के लिए जिम्मेदार अधिकारी, समय-सीमा और अनुपालन की स्थिति स्पष्ट हो, तो व्यवस्था में सुधार की संभावना मजबूत होती है।
अब फाइलों से आगे बढ़कर जमीन पर दिखनी चाहिए जवाबदेही
नगर निगम की यह समीक्षा बैठक प्रशासन के लिए आत्ममंथन का अवसर है। निगमायुक्त के सख्त निर्देशों से स्पष्ट है कि विकास कार्यों की जानकारी, समय-सीमा और निगरानी को लेकर अपेक्षाएं कठोर हैं। लेकिन वास्तविक परिवर्तन तभी आएगा, जब इन निर्देशों का नियमित अनुपालन हो, लंबित कार्यों की बाधाएं दूर हों और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया निष्पक्ष एवं पारदर्शी रहे। नगर निगम में काम करने वाले प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी को यह समझना होगा कि सरकारी रिकॉर्ड केवल कार्यालय की औपचारिकता नहीं है। उसके आधार पर विकास की योजना बनती है, धन के उपयोग की निगरानी होती है और जनता को मिलने वाली सुविधाओं की प्रगति का आकलन किया जाता है। इसी प्रकार ठेकेदारों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे अनुबंध के अनुसार समय-सीमा और गुणवत्ता का पालन करें। जहां उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए और जहां देरी के पीछे वास्तविक प्रशासनिक या तकनीकी बाधाएं हों, उनका भी समय पर समाधान किया जाना चाहिए।
कटनी की जनता को आश्वासन से अधिक परिणाम चाहिए। उसे यह जानने का अधिकार है कि उसके वार्ड का विकास कार्य कब पूरा होगा, देरी के लिए क्या कारण हैं और जिम्मेदार स्तर पर क्या कार्रवाई की गई है। अब निगाहें अगली समीक्षा पर रहेंगी—क्या लंबित कार्यों में तेजी आएगी, क्या ठेकेदारों के मामलों में नियमसम्मत कार्रवाई होगी, क्या विभागीय रिकॉर्ड अद्यतन होंगे और क्या वार्डों में विकास की रफ्तार वास्तव में बढ़ेगी क्योंकि अंततः नगर निगम की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन बैठकों में दिए गए निर्देशों से नहीं, बल्कि सड़कों, नालियों, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और नागरिकों की रोजमर्रा की सुविधाओं में आए बदलाव से होगा। यही जवाबदेही की असली कसौटी है और यही कटनी की जनता की अपेक्षा।