स्वास्थ्य विभाग की अनुशासनहीनता भी बढ़ा रही क्रूर प्रथाएं

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रोगियों के कल्याण में नहीं चमक दमक में फूंक रहे धन

शहडोल। ग्रामीण अंचलों में हालत यह है कि यहां चिकित्सा अमले से भेेंट होनी ही कठिन है। कार्यस्थल पर आनन-फानन कोई नहीं मिलता। खैरहा में पदस्थ डाक्टर तो वेतन के अलावा दुर्गम क्षत्र का अलग से 30 हजार रूपए भत्ता लेने के बाद भी उपस्थित नहीं रहता। ग्रामीण अंचलों के उपस्वास्थ्य केन्द्रो में कितना स्टाफ काम करता है कभी मॉनीटरिंग नहंी होती और न ही किसी संस्था में कोई अनुशासन है। प्रशासन की नाक के नीचे यहां जिला अस्पताल में क्या हो रहा है, रोगियों की सुविधाओं का विस्तार किए जाने और चिकित्सकीय व्यवस्थाओं में सुधार लाने की बजाय जिला अस्पताल के सिविल सर्जन बिना अनुमति अनाप शनाप के कार्यों मेें लाखों रूपए व्यय कर रहे हैं। अस्पताल मेनगेट पर एयर क्वालिटी इंडेक्स का डिस्पले लगवाया जाना, सौ साल पुरानी दीवारों पर प्लेट लगवाना आदि इसी तरह के कार्य हैं। सिविल सर्जन अस्पताल की सज्जा में धन उड़ेल रहेे हैं जबकि अस्पताल में काफी दिनों से न पानी की पर्याप्त सुविधा है और न दवाओं का पर्याप्त भण्डार है। जिला स्वास्थ्य विभाग की सेवाएं हर विभाग से कहंी अधिक बड़ी और अधिक संसाधनयुक्त हैं। दूसरी ओर जिला महिला बाल विकास विभाग को तो प्रशासन ने जैसे छूट ही दे दी है। यहां के अधिकारी खुद कितनी व्यवस्थाएं सुधरवा रहे हैं और फील्ड पर कितना मुआयना कर रहे हैं, प्रशासन इनसे भी पूछे।

इलाज के लिए कहां जाएं गरीब

शासन ने ग्रामीण अंचलों तक उपचार सुविधा उपलब्ध कराने खण्ड स्तरों पर 30 बिस्तरा अस्पताल खोला है, इसके अलावा कई प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और लगभग 225 उपस्वास्थ्य केन्द्र खोले हैं। लेकिन इन अस्पतालों में न तो डाक्टर मिलते हैं और न पर्याप्त दवाएं दी जातीं हैं। सबसे नजदीकी केन्द्र उपस्वास्थ्य केन्द्र होते हैं जहां एक सीएचओ, देा एएनएम पदांकित की गईं हैं। इनकी उपलब्धता कितनी रहती है और कितने दिन उपस्वास्थ्य केन्द्र खुलता है। गोहपारू विकासखण्ड के तो अधिकांश उपस्वास्थ्य केन्द्रों में भर्रा मचा हुआ है। करूआ पंचायत में संचालित उपस्वास्थ्य केन्द्र को ही देख लें। किसी आदिवासी का कोई बच्चा अचानक बीमार हो जाए तो वह कहां लेकर जाएगा, उसे मजबूरन किसी झोला छाप डाक्टर की ही शरण लेनी पडेगी। इसके अलावा वह अपना पारम्परिक इलाज झाड़ फूंक अथवा देशी जड़ी बूटी का ही सेवन कराएगा। दगना जैसी कुप्र्रथा का भी पालन करना उसकी मजबूरी हो सकती है। सामतपुर की जो बच्ची दगना की शिकार हुई उसे भी अस्पताल ही ले जाने का प्रयास किया गया था।

भत्ता लेकर भी नहंी करते ड्यूटी

जिले की अस्पतालों की हालत और स्टाफ की हालत तो यह है कि डॉक्टर दुर्गम क्ष़ेत्रों का अलग से भत्ता उठा रहे हैं फिर भी ड्यूटी नहीं करते हैं। खैरहा अस्पताल इसका उदाहरण है, यहां पदस्थ डाक्टर को रहकर इलाज करने के लिए सरकार वेतन के अलावा 30 हजार रूपए सरकार दे रही है फिर भी वह ड्यूटी नहंी करता। सीएमएचओ व कलेक्टर ने कभी खैरहा अस्पताल का औचक निरीक्षण नहीं किया। अन्यथा उन्हे यह स्थिति अवश्य पता होती कि उनका डाक्टर कहां ड्यूटी कर रहा है। यह केवल एक खैरहा की स्थिति नहीं है अधिकांश डाक्टर शहडोल में रहकर अपना धंधा कर रहे हैं।

अस्पताल में रंगरोगन करने से क्या होगा

सीएमएचओ और कलेक्टर के बगल में चल रहे जिला अस्पताल में क्या हो रहा है, अस्पताल की व्यवस्थाएं दिनोदिन बिगड़ रहीं हैं और सिविल सर्जन कहीं टाइल्स कहीं प्लेट तो कहीं डिस्प्ले लगवाकर अस्पताल का पैसा फूंक रहे हैं। जबकि यह धन रोगियों के कल्याण में व्यय किया जाना चाहिए। बताते हैं कि जो व्यय किया जा रहा है उसका रोगी कल्याण समिति से विधिवत अनुमोदन भी नहीं कराया गया है। हालत यह है कि सीएमएचओ का अंकुश और अनुशासन जिला अस्पताल में ही निष्प्रभावी है। सिविल सर्जन केवल अस्पताल की बाहरी चमक दमक बढ़ाने में व्यस्त हैं। अस्पताल की पेयजल व्यवस्था चरमराई हुई है, दवाओ का स्टाक घटता जा रहा है लेकिन सिविल सर्जन को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

कला पथक दल कहां है

सामाजिक बुराइयों को रोकने और जनता में जागरूकता जगाने के लिए सामाजिक न्याय विभाग में शासन नेे कला पथक दल भी भर्ती किए थे। जिनका काम समय समय पर ग्रामीणों के बीच जाकर उनके बीच संगीत और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से लोगों को बुराइयों से अवगत करा उन्हे विकास की मुख्य धारा से जोडऩा था। एक अर्सेे से इस दल का पता नहीं है, बताते हैं कि इस दल से विभाग बाबूगिरी करा रहा है। सामाजिक संगठन भी चुप्पी साधे बैठे हैं, यह तो एक सामाजिक विकास की प्रक्रिया है जिसमें हर तरफ से हर किसी को भूमिका निभानी होगी तभी मासूमों की बलि रूकेगी।

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