बप्पा को विदा करते हुए नम हुई आंखें, कृत्रिम कुंडों ने सिखाया आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा भी जरूरी बारिश की फुहारों के बीच श्रद्धालुओं ने कृत्रिम चलित कुंडों में किया गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन, घर के करीब सुविधा मिलने से चेहरे पर संतोष और मन में पर्यावरण संरक्षण की भावना
बप्पा को विदा करते हुए नम हुई आंखें, कृत्रिम कुंडों ने सिखाया आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा भी जरूरी
बारिश की फुहारों के बीच श्रद्धालुओं ने कृत्रिम चलित कुंडों में किया गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन, घर के करीब सुविधा मिलने से चेहरे पर संतोष और मन में पर्यावरण संरक्षण की भावना
कटनी। बारिश की हल्की-हल्की फुहारें, वातावरण में गूंजता ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ का जयघोष और आंखों में विदाई की नमी….गणेश अनंत चतुर्दशी के अवसर पर शहर में आस्था और भावनाओं का ऐसा ही अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।
विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश की प्रतिमाओं का विसर्जन प्रारंभ हो गया है। श्रद्धालु पूरे भक्तिभाव के साथ अपने आराध्य को विदाई दे रहे हैं। किसी के हाथों में फूल हैं तो कोई गणपति की प्रतिमा को अंतिम बार निहार रहा है। चेहरे पर उत्सव की चमक है, तो मन में अगले वर्ष फिर गणेश जी के आगमन की प्रतीक्षा।
इस बार गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर नगर निगम प्रशासन द्वारा की गई विशेष व्यवस्था श्रद्धालुओं के लिए सुविधा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का एक महत्वपूर्ण संदेश भी दे रही है।
घर के समीप मिला विसर्जन का विकल्प
छोटी गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए नगर निगम प्रशासन ने शहर के 8 प्रमुख स्थलों पर द्वारा ट्रेक्टर- ट्रॉली में कृत्रिम विसर्जन कुंड की सुविधा उपलब्ध है
1. मानसरोवर कॉलोनी तिराहा(अमीरगंज तालाब के पास)
2. कटायेघाट
3. हीरागंज/नई बस्ती
4. सुभाष चौक
5. सिविल लाइन
6. Pwd कॉलोनी
7. दुर्गा चौक
8. पन्ना मोड़
पर सुसज्जित वाहनों में कृत्रिम चलित विसर्जन कुंड उपलब्ध कराए हैं। इन चलित कुंडों में श्रद्धालु विधि-विधान और श्रद्धा के साथ गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन कर रहे हैं।
घर के समीप ही विसर्जन की सुविधा मिलने से बुजुर्गों, महिलाओं और परिवारों को काफी सहूलियत मिल रही है। साथ ही मुख्य विसर्जन घाटों पर भीड़ का दबाव कम करने में भी यह व्यवस्था सहायक साबित हो रही है। यह पहल मानो यह संदेश दे रही है कि भक्ति केवल पूजा करने का नाम नहीं, बल्कि अपनी आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आठ स्थानों पर तैनात किए गए अधिकारी-कर्मचारी
उपायुक्त श्रीमती झरिया द्वारा जारी आदेश के अनुसार नगर के आठ प्रमुख स्थलों पर अधिकारियों-कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है।
मानसरोवर कॉलोनी तिराहा (अमीरगंज तालाब के पास) पर रितिक उपाध्याय, कटायेघाट राम मंदिर के पास आनंद दुबे, हीरागंज नई बस्ती में मांशु पटवा, सुभाष चौक पर राकेश रजक, सिविल लाइन में अनमोल शुक्ला, पीडब्ल्यूडी कॉलोनी (दुगाड़ी नाला के पास) में अभिषेक बघेल, दुर्गा चौक में मयूर झा तथा पन्ना मोड़ के पास राहुल मिश्रा की ड्यूटी लगाई गई है।
निर्धारित स्थलों पर सायं 6 बजे तक कर्मचारियों की तैनाती की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को विसर्जन के दौरान किसी प्रकार की असुविधा न हो और पूरी प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से संपन्न हो सके।
प्रतिमा की विदाई के साथ एक संकल्प भी जरूरी
गणेश उत्सव हमें हर वर्ष केवल उत्सव मनाना नहीं सिखाता, बल्कि जीवन के अनेक गहरे संदेश भी देकर जाता है। भगवान श्रीगणेश बुद्धि, विवेक और शुभारंभ के प्रतीक हैं। ऐसे में उनकी प्रतिमा को विदा करते समय यदि हम स्वच्छता, पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी का संकल्प भी लें, तो यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जिस तरह हम अपने घर में भगवान गणेश का स्वागत पूरे प्रेम से करते हैं, उसी तरह विसर्जन के बाद उनके कारण प्रकृति और जलस्रोतों को किसी प्रकार का नुकसान न हो, इसका ध्यान रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।कृत्रिम विसर्जन कुंडों की व्यवस्था इसी सोच को आगे बढ़ाती है—आस्था भी रहे और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।
‘बप्पा को विदा कर रहे हैं, अपनी जिम्मेदारी को नहीं’
विसर्जन का क्षण भावुक करने वाला होता है। भक्त गणपति को विदा करते हुए कहते हैं—‘बप्पा अगले बरस फिर आना।’ लेकिन इस बार इस विदाई में एक और संकल्प जुड़ सकता है—“बप्पा, आप अगले वर्ष फिर आइए, तब तक हम अपनी धरती, अपने जल और अपने शहर को और स्वच्छ बनाए रखेंगे।”
नगर निगम प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि छोटी गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन निकटतम चलित कृत्रिम विसर्जन कुंड में ही करें तथा स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण में सहयोग दें। क्योंकि गणपति उत्सव की सबसे सुंदर सीख यही है कि भगवान को फूल चढ़ाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उस धरती को बचाना भी है, जिस पर हम सबका जीवन टिका है।
बारिश की इन फुहारों के बीच जब गणपति बप्पा को विदाई दी जा रही है, तब शहर में गूंजता जयघोष केवल एक पर्व के समापन की आवाज नहीं है। यह उस विश्वास की आवाज है कि बप्पा हर वर्ष लौटेंगे और हमें हर बार थोड़ा बेहतर इंसान बनकर उनका स्वागत करना है।
गणपति बप्पा मोरया…
अगले बरस तू जल्दी आ…
और जाते-जाते हमें इतना विवेक दे जाना कि हमारी आस्था से किसी नदी, तालाब, पेड़ या प्रकृति को कोई पीड़ा न पहुंचे।