परत-दर-परत खुल रहे करोड़ों की जमीन घोटाले के राज
पवित्र नगरी में बेशकीमती नजूल की भूमि का पर्दाफाश
तहसीलदार की जगह एसडीएम ने किया नामांतरण
पद्म ने उड़ाई म.प्र. भू राजस्व संहिता की धज्जियां
(अजय जायसवाल)
(9425448183)
शहडोल। मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता में नामांतरण का अधिकार अनुविभागीय अधिकारी को प्रदत्त नहीं किए गए हैं। पद्म सिंघानिया के नाम वसीयत 04 नवम्बर 1999 के आधार पर कोई नामांतरण नहीं किया गया है, ऐसी स्थिति में श्री सिंघानिया को वसीयत के आधार पर नामांतरण कराने का आवेदन तहसीलदार को देना चाहिए न कि अनुविभागीय अधिकारी को जिन्हें नामांतरण का अधिकार नहीं है।
21 वर्षाे तक नामांतरण क्यों नही कराया
बुढ़ार निवासी पद्म सिंघानिया के पास यदि सन् 1999 से रामेश्वर प्रसाद सिंघानिया के नाम का कोई वसीयत थ, तो 21 वर्षाे तक उस वसीयत को चुपचाप अपने पास क्यों रखा गया और नामांतरण कराने की कार्यवाही क्यों नहीं की गई, इसका भी कोई संतोषप्रद कारण अपने आवेदन पत्र में पद्म सिंघानिया द्वारा नहीं दिया गया, इसका मूल कारण यह था कि आवेदक पद्म सिंघानिया काफी चतुर व धन संपन्न व्यापारी हैं, वह इस योजना में रहे कि कब ऐसा मौका मिले कि वह अमरकंटक की भूमि को अपने नाम करा पाने में सफल हो जाए और इन 21 वर्षाे के दौरान उसे ऐसा कोई अधिकारी नहीं मिला जो, भूमि का नामांतरण कर देने के लिए सहमत रहा हो, लेकिन तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी पुष्पराजगढ़ को अपने साजिश में ले लिया तथा उन पर आर्थिक नाजायज दबाव बनाया गया और कोविड-19 महामारी के लॉक डाउन मे जब सभी न्यायालय व कार्यालय बंद थे, 10 जून 2020 को आवेदन देकर बड़ी तत्परता पूर्वक दो माह के अंदर 14 अगस्त 2020 को अपने नाम भूमि नामांतरण कराने में सफल हो गये। अनुविभागीय अधिकारी द्वारा गेस्ट हाउस एवं हर्बल गार्डन के बीचो-बीच की 100&200=20 हजार वर्गफुट भूमि को हर्बल गार्डन से मुक्त कराकर पद्म सिंघानिया के नाम नामांतरण किए जाने का आदेश देने की गलती कर दी।
राजस्व न्यायालय को अधिकार नहीं
म.प्र. शासन नवईयत जंगल किस्म की भूमि को किसी भी प्रायवेट व्यक्ति या संस्था के नाम आवंटित किए जाने या नामांतरण किए जाने का कोई अधिकार राजस्व न्यायालय को नहीं है। यही नहीं किस्म जमीन, जंगल की भूमियों का यदि कोई आवंटन हो भी जाता है तो, उसे राजस्व अधिकारियों या कलेक्टर द्वारा ऐसे प्रकरणों को स्वयमेव निगरानी में लेकर भूमि के आवंटन को निरस्त किए जाने का आदेश दिया जाता है, लेकिन अनुविभागीय अधिकारी न्यायालय द्वारा जिन्हें म.प्र. भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के अनुसार किस्म जमीन, जंगल की भूमियों का नामांतरण करने का अधिकार नहीं था तथा आवेदक पद्म सिंघानिया द्वारा भी अपने आवेदन पत्र को किसी भी दृष्टि से प्रमाणित नहीं किया गया है। श्री सिंघानिया द्वारा अभिलेख से म.प्र. शासन जंगल किस्म की भूमि पर उसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं, क्योंकि वह न तो रामनरेश सिंह के स्वत्व को प्रमाणित किया, न ही उनके द्वारा विक्रय किए जाने के बाद 15 साल बाद हुए नामांतरण को भी प्रमाणित किया। यही नहीं सन् 1999 में जब उसके नाम वसीयत हुई, वह भी 21 साल तक चुपचाप रहे आये।
खसरे का अवलोकन भी नहीं किया
अनुविभागीय अधिकारी पुष्पराजगढ़ के न्यायालय द्वारा 1953-54 से 1958-59 के खसरा का अवलोकन भी नहीं किया गया और अपनी पूरी कार्यवाही अवैध रूप से 2 माह के अंदर करते हुए शासकीय जंगल किस्म की भूमि जो अमरकंटक जैसे स्थान पर है, पर्यावरण पर भी ध्यान न देकर पवित्र नगरी की भूमि को पद्म सिंघानिया के पक्ष में अभिलेख सुधार का आश्रम लेकर नाजायज लाभ देते हुए नामांतरण आदेश पारित कर दिया गया।