भाजपा के डीपीसी: प्रशासन ने मूंदी आंखे
शहडोल में कुर्सी पर कब्जा, कोतमा के नेताओं को दी खुली चुनौती
बीते एक पखवाड़े से सुर्खियों में रहने वाले लोकसेवक बनाम नेता डॉ. मदन त्रिपाठी ने सोशल मीडिया पर अपने
एकाउण्ट से भारतीय जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह के साथ मुख्यमंत्री के जन्म दिन की पोस्ट डालकर अब लगभग
स्पष्ट कर दिया कि उन्हें डीपीसी की कुर्सी से कोई मोह नहीं है। इधर डीपीसी की कुर्सी और साथ-साथ विधायकी का
प्रचार शहडोल कलेक्टर की निष्पक्ष कार्यशैली पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है।
शहडोल। 24 फरवरी को माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर के द्वारा डीपीसी मदन त्रिपाठी के मामले में उनके द्वारा
लिये गये स्थगन को खारिज कर दिया गया था, इस मामले के मीडिया में आने के अगले दिन ही श्री त्रिपाठी ने प्रेस
नोट जारी कर स्पष्ट कर दिया कि उन्हें डीपीसी की कुर्सी से कोई मोह नहीं है, बल्कि उन्होंने ही गुणा-गणित कर
याचिका खारिज करवाई और बीआरएस लेकर संभाग की एक मात्र कोतमा सामान्य सीट से चुनाव लडऩे की तैयारी
कर रहे हैं। डीपीसी के इस प्रेस नोट ने शहडोल के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ कोतमा के तमाम मतदाताओं और
भाजपा के टिकट से चुनाव लडऩे की इच्छा रखने वाले उन तमाम लोगों का खुलकर मजाक उड़ाया गया, कि होगा वहीं
जो मुन्ना भईया चाहेंगे और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जन्म दिन पर लोकसेवक और शहडोल डीपीसी रहते
एक पद से कार्यमुक्त हुए बिना मदन त्रिपाठी ने सोशल मीडिया के फेसबुक प्लेटफार्म पर कमल के चुनाव चिन्ह
वाली पोस्ट डालकर अपनी स्थिति तो स्पष्ट कर दी, लेकिन इस मामले में शहडोल कलेक्टर और शिक्षा विभाग के
अन्य आलाधिकारी अपनी स्थिति स्पष्ट करने में अभी भी नाकाम ही नजर आ रहे हैं।
…तो डीपीसी को दी है पूरी छूट
इस पूरे मामले में शहडोल कलेक्टर श्रीमती वंदना वैद्य सहित जिले के प्रभारी मंत्री, स्थानीय विधायक और शिक्षा
विभाग के भोपाल में बैठे तमाम बड़े अधिकारियों ने इस मामले से खुद को पूरी तरह अलग करके रखा हुआ है,
नियमत: माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा याचिका खारिज करने और डीपीसी के द्वारा खुद याचिका खारिज
कराने का प्रेस नोट जारी होने के साथ ही डीपीसी की कुर्सी किसी अन्य जिम्मेदार व वरिष्ठ को सौंप देनी चाहिए,
लेकिन एक सप्ताह से अधिक का समय बीतने को है, इस मामले में कलेक्टर शहडोल सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी
कोई रूचि नहीं दिखा रहे। सवाल तो यह भी है कि उच्च न्यायालय के द्वारा डीपीसी को पद से हटाने के आदेश के बाद
उनके द्वारा जो भी वित्तीय आहरण के आदेश जारी किये जा रहे हैं, यदि उनमें कोई अनियमितता आती है तो, इसकी
जिम्मेदारी क्या शहडोल कलेक्टर लेंगी। यहीं नहीं खबर तो यह भी है कि श्री त्रिपाठी ने भले ही प्रेस नोट जारी कर उच्च
न्यायालय की कार्यवाही को खुद के द्वारा किया गया प्रयास बताया है, लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी भान नहीं था
कि पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष नरेन्द्र मरावी उच्च न्यायालय में उपस्थित होकर अपना बयान देंगे और उनकी
याचिका डिस्पोज कर दी जायेगी, अचानक आये इस फैसले के कारण श्री त्रिपाठी के दर्जनों आदेश और वित्तीय
आहरण की फाईलें अधर में फंस गई। संभवत: उन्हें पूरा करने के लिए ही पूर्व तिथियों पर आदेश बनाये जा रहे हैं और
बचाकुचा रायता और जुगाड़ समेटने के लिए अपने प्यादे को डीपीसी की कुर्सी पर बैठाने के जोड़-तोड़ में दिन पर दिन
गुजरते जा रहे हैं।
बिना डीपीसी के बोर्ड परीक्षाएं
बीते 10 से अधिक सालों से शहडोल में डीपीसी रहे मदन त्रिपाठी माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद से अपने
ही गुणा-गणित और विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगे नजर आ रहे हैं, इसी बीच बोर्ड की परीक्षाएं भी चालू हो गई
हैं। नये डीपीसी की नियुक्ति न होने से पूर्व के वर्षाे में डीपीसी के द्वारा बोर्ड परीक्षाओं की व्यवस्था हेतु किये जाने वाले
कार्य शून्य हो चुके हैं। डीपीसी मदन त्रिपाठी न तो, कुर्सी छोड़ रहे हैं और न ही कुर्सी पर बैठ रहे हैं, इसका खामियाजा
बोर्ड परीक्षाओं की व्यवस्थाओं और जिले के हजारों बोर्ड के छात्र-छात्राओं के भविष्य पर भी पड़ सकता है। मदन
त्रिपाठी ने खुद को कोतमा का बेटा और भाजपा का झण्डा थामकर विधायक घोषित कर लिया है, लेकिन उनके इस
रवैये और इस मामले में जिला प्रशासन के द्वारा आंखे मूंदे जाने के कारण जिले के हजारों छात्र-छात्राएं अव्यवस्थाओं
के बीच परीक्षा देने को मजबूर हैं।
…तो कोतमा की टिकट हो गई तय!
लोकतंत्र में हर नागरिक को न सिर्फ मतदान करने का बल्कि चुनाव लडऩे का भी मौलिक अधिकार है, मदन त्रिपाठी
भी उन्हीं मतदाताओं में से एक हैं, जिन्होंने अपनी इच्छा जाहिर कर कोतमा से अपनी दावेदारी ठोक दी है, सोशल
मीडिया के फेसबुक प्लेटफार्म पर लोकसेवक रहते हुए मदन त्रिपाठी के द्वारा किसी राजनैतिक दल के चुनाव चिन्ह
के साथ पोस्ट करना लोकसेवक के दायित्वों व कर्तव्यों का घोर उल्लंघन हैं, जिले या प्रदेश के अन्य लाखों लोकसेवक
भी कांग्रेस-भाजपा या अन्य किसी दल का चुनाव चिन्ह नौकरी में रहते हुए पोस्ट करते तो, उनके ऊपर क्या कार्यवाही
नहीं की जाती, यह मामला फिलहाल मौन धारण किये हुए प्रशासन के कार्यशैली पर टिका है, इधर कोतमा
विधानसभा से दूसरे जिले की विधानसभा में रहने और नौकरी करने वाले लोकसेवक की सक्रियता और संगठन से
उसकी नजदीकियों ने कोतमा के तमाम मतदाताओं और भाजपा के नेताओं को पहली कतार से हटाकर मदन त्रिपाठी
के पीछे लाकर खड़ा कर दिया है, बहरहाल लोकसेवक के ऊपर क्या कार्यवाही होगी या नहीं होगी, उन्हें टिकट मिलेगी
या निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे, हारेंगे या जीतेंगे, यह सब भविष्य के गर्भ छुपा हुआ है।