शहडोल फर्जी बिल प्रकरण : पत्रकारिता, प्रशासन और पर्देदारी पर सवाल

 

 

नई दुनिया की खबरें, खंडन और अब जनजागरण की जरूरत

शहडोल | विशेष आलेख

शहडोल जिले में जल गंगा चौपाल और शिक्षा विभाग से जुड़ी फर्जी बिलों की घटनाएं बीते सप्ताह मीडिया और सोशल मीडिया में जबरदस्त चर्चा में रहीं। 11 और 12 जुलाई 2025 को नई दुनिया समाचार पत्र में प्रमुखता से प्रकाशित खबरों ने ग्राम पंचायत स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार की कलई खोल दी। लेकिन दो दिन बाद, 14 जुलाई को उसी अखबार में प्रशासन के हवाले से इन खबरों का खंडन प्रकाशित कर दिया गया।

📌 यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस लेख का उद्देश्य ‘नई दुनिया’ जैसे किसी समाचार माध्यम की खबरों का खंडन करना नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप का विश्लेषण करना है — जहां मीडिया, प्रशासन और जनविश्वास के बीच की रेखाएं धुंधली होती जा रही हैं।

📌 शहडोल में शिक्षा विभाग के फर्जी बिल—जैसे 4 लीटर पेंट पर 168 मजदूरों की तैनाती और भदवाही में ड्रायफ्रूट घोटाले—के मामलों ने प्रशासन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जाहिर हैं इस मामले में कलेक्टर नहीं बल्कि निचले स्तर पर स्कूलवार जिले में जिला कार्यालय की स्पष्ट भूमिका है,, बावजूद इसके भले ही इन मामलों में कलेक्टर डॉ. केदार सिंह की सीधी संलिप्तता स्पष्ट न हो, लेकिन जब जिले की उपलब्धियों का श्रेय प्रशासन लेता है, तो विफलताओं की जवाबदेही भी उसी की बनती है। ऐसे में जरूरी था कि कलेक्टर या उनके प्रतिनिधि जनसंपर्क माध्यम से समय रहते स्थिति स्पष्ट करते। जवाबदेही से बचना, नेतृत्व के दायित्व से बचना नहीं होता।

पहले क्या छपा….?

 

 

11 जुलाई को प्रकाशित खबर में

 

बताया गया कि गोहपारू ब्लॉक के भदवाही ग्राम पंचायत में जल गंगा संवर्धन चौपाल के आयोजन में 14 किलो ड्रायफ्रूट का बिल लगाया गया। कार्यक्रम में कलेक्टर डॉ. केदार सिंह, एसडीएम और जिला पंचायत की प्रभारी सीईओ मुद्रिका सिंह मौजूद थे। लेकिन जब बिल पर सवाल उठे, तो अधिकारी इससे अनभिज्ञता जताते दिखे।

12 जुलाई की रिपोर्ट ने एक

और परत खोली

 

जिसमें यह बताया गया कि फल, तेल और अनाज की खरीदी एक ऐसे कांट्रेक्टर से दिखाई गई जो सामान्यतः भवन निर्माण सामग्री बेचता है। इस खरीदी का बिल 25 मई 2025 को पंचायत सचिव द्वारा काटा गया और भुगतान भी हो गया। साथ ही एक साल पुराना ₹1.3 लाख का ड्रायफ्रूट बिल भी वायरल हुआ, जो कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय टेटका से संबंधित था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बालिकाओं को दाल-सब्ज़ी तक नहीं मिलती, लेकिन बिल में डेढ़ क्विंटल सूखे मेवे दिखाए गए।

फिर आया खंडन – 14 जुलाई की खबर

14 जुलाई को नई दुनिया ने प्रशासनिक पक्ष प्रकाशित किया जिसमें इन सभी खबरों को “भ्रामक”, “असत्य” और “बदनाम करने की साजिश” बताया गया। कलेक्टर डॉ. केदार सिंह के हवाले से बताया गया कि:

जिन बिलों की बात हो रही है, उनका भुगतान शासकीय रिकॉर्ड में नहीं हुआ है।

जल चौपाल का आयोजन 24 मई को हुआ, जबकि वायरल बिल 25 मई का है, अतः तारीखें ही मेल नहीं खातीं।

जिन दुकानों के बिल लगाए गए, उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे बिल कभी काटे ही नहीं।

सकंदी और निपनिया स्कूलों के पोताई-मरम्मत के मामलों में भी “वायरल” बिल फर्जी बताए गए।

फिर भी कई सवाल कायम हैं

प्रशासन की सफाई के बावजूद कुछ बुनियादी और संवेदनशील सवाल अब भी अनुत्तरित हैं:

1. यदि वायरल बिल फर्जी हैं, तो प्रशासन ने अब तक FIR दर्ज क्यों नहीं करवाई?

2. यदि ये AI या अन्य तकनीक से जनरेटेड हैं, तो वे शासकीय प्रक्रिया में दस्तावेजों के रूप में दाखिल कैसे हो गए?

3. क्या जांच के नाम पर वास्तविक भुगतान के रिकॉर्ड से वायरल बिलों को प्रतिस्थापित किया जा रहा है?

सूत्र बताते हैं कि ऑफ रिकॉर्ड प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कहा जा रहा है कि ये खबरें पत्रकारों की “निजी मेहनत” हैं — यानी खबरें संस्थान की नहीं बल्कि रिपोर्टर की मानी जाएंगी। ये बातें प्रशासन और मीडिया की आपसी समीकरणों पर भी सवाल उठाती हैं। यदि प्रिंट हुए जवाब सरकारी है तो जनसंपर्क विभाग से यह रिपोर्ट रिलीज क्यों नहीं की गई…??

क्या यह सब सिर्फ बिलों की सफाई है या किसी बड़े खेल की?

सूत्र यह भी बताते हैं कि 1 जनवरी से 30 जून 2025 के बीच अकेले सुधाकर कंस्ट्रक्शन ब्यौहारी को शिक्षा विभाग द्वारा ₹65 लाख से अधिक की राशि ट्रांसफर की गई है। मार्च 2022 से अब तक करोड़ों रुपये की राशि इस फर्म को दी गई — बिना यह बताए कि कितने कार्य हुए और उनका भौतिक सत्यापन कहां है?

यदि प्रशासन पारदर्शी है, तो उसे सिर्फ वायरल बिलों तक सीमित न रहकर पिछले तीन वर्षों के सभी कार्यों का सार्वजनिक मूल्यांकन और ऑडिट कराना चाहिए। बिलों को लेकर सफाई देने के साथ-साथ यह भी दिखाना चाहिए कि कौन से कार्य जमीन पर वास्तव में हुए और किसने किए।

मीडिया मैनेजमेंट बनाम निष्पक्ष पत्रकारिता

नई दुनिया जैसी संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह प्रशासनिक खंडन छापने से पहले स्वतंत्र रूप से पुनः तथ्यों की पुष्टि करे। जब एक ही संस्था दो विपरीत रिपोर्टें तीन दिन में प्रकाशित करती है — पहले भ्रष्टाचार उजागर करती है, फिर प्रशासन की जांच को सत्य मानकर पहले की खबरों का अप्रत्यक्ष खंडन कर देती है — तो यह पाठकों के विश्वास पर सीधा आघात करता है।

निष्कर्ष

शहडोल में जो हुआ, वह सिर्फ ड्रायफ्रूट या पुताई तक सीमित मामला नहीं है — यह उस प्रणाली का उदाहरण है जिसमें पत्रकारिता, प्रशासन और जवाबदेही तीनों के मूल सिद्धांत संकट में हैं।

यदि प्रशासन सच में सच्चाई सामने लाना चाहता है तो उसे सिर्फ खंडन नहीं, FIR, पब्लिक ऑडिट और कार्यों के फिजिकल वेरिफिकेशन की राह अपनानी चाहिए ,
और यदि मीडिया संस्थान निष्पक्ष रहना चाहते हैं तो उन्हें सत्ता से नहीं, सच से समझौता करना चाहिए।

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