न्याय की आस में 5 साल से भटक रहे आदिवासी किसान, विभागों की ‘नूराकुश्ती’ में उलझा अपनी ही जमीन का मालिक

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ब्यौहारी (शहडोल)। प्रदेश सरकार जहाँ एक ओर आदिवासियों के उत्थान और उन्हें जमीन का हक देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं शहडोल जिले की ब्यौहारी तहसील से एक ऐसा मामला सामने आया है जो इन दावों की पोल खोलता है। यहाँ के दो किसान, जगदेव कोल और परदेशी लाल कोल, अपनी ही निजी भूमि को वन विभाग के चंगुल से छुड़ाने के लिए साल 2021 से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन न्याय आज भी उनसे कोसों दूर है।

स्वामित्व की जमीन पर विभाग का ‘सियासी’ वृक्षारोपण

ग्राम इंदवार, पटवारी हल्का ओदारी के खसरा नंबर **154/2 और 154/4** की कुल **1.416 हेक्टेयर** भूमि राजस्व रिकॉर्ड में जगदेव और परदेशी लाल के नाम दर्ज है। पीड़ितों का आरोप है कि वन विभाग ने राजस्व विभाग की बिना अनुमति और उनकी गैर-मौजूदगी में इस निजी आराजी पर जबरन कब्जा कर वृक्षारोपण कर दिया है।

### **शिकायतों का अंतहीन सफर: 2021 से 2026 तक की लड़ाई**

दस्तावेजों के मुताबिक, न्याय के लिए संघर्ष का यह सिलसिला बेहद लंबा है:

* **दिसंबर 2021:** तहसीलदार के आदेश के बाद RI ने मौका मुआयना किया, लेकिन वन विभाग की अड़ंगेबाजी के कारण सीमांकन अधूरा रहा।

* **10 जुलाई 2023:** पीड़ितों ने **जिला कलेक्टर** और **वनमंडलाधिकारी (DFO) उत्तर शहडोल** को लिखित शिकायत कर सुरक्षा और हक की गुहार लगाई।

* **23 फरवरी 2026:** मामला न सुलझने पर **SDM ब्यौहारी** को पुनः आवेदन दिया गया।

* **09 अप्रैल 2026:** नायब तहसीलदार पपौंध ने सख्त लहजे में **10 अप्रैल** को संयुक्त सीमांकन का आदेश दिया, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण किसानों के हाथ फिर खाली रहे।

### **पीड़ित का दर्द: “हमें अपनी ही जमीन पर चोर बताया जा रहा है”**

मामले में मुख्य पीड़ित **जगदेव कोल** ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा:

> *”हम पुश्तैनी रूप से इस जमीन पर खेती कर अपना पेट पालते आए हैं। साहेब, हमारे पास कागज (ऋण पुस्तिका) भी है और हम लगान भी भरते हैं, लेकिन वन विभाग के लोग हमें अपनी ही जमीन पर कदम नहीं रखने देते। जब हम सीमांकन की मांग करते हैं, तो वे हमें जेल भेजने और फर्जी केस में फंसाने की धमकी देते हैं। 5 साल से हम कचहरी के चक्कर काटते-काटते कर्जदार हो गए हैं, पर कोई सुनने वाला नहीं है। क्या गरीब होना ही हमारा गुनाह है?”*

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### **प्रशासनिक उपेक्षा के बीच किसान बेबस**

हैरानी की बात यह है कि राजस्व विभाग के पास किसानों के स्वामित्व के पुख्ता सबूत हैं, फिर भी वन विभाग के मैदानी अमले की दबंगई के सामने प्रशासन नतमस्तक नजर आता है। हर बार सीमांकन की तारीख तय होती है और वन विभाग के अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण मामला टल जाता है।

पांच सालों से जारी यह प्रशासनिक ‘फुटबॉल’ का खेल अब किसानों के सब्र का बांध तोड़ रहा है। यदि समय रहते इन गरीब आदिवासियों को उनकी जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं मिला, तो यह मामला किसी बड़े जनांदोलन का रूप ले सकता है।

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