सुमित धोबी की धुलाई वाली गवाही
बात तो बड़ी राज़ की थी, मगर चौराहे पर बातों-बातों में बाहर आ ही गई। सुमित धोबी ने कपड़ों की गठरी रखते हुए लगभग 10 साल पुराना किस्सा छेड़ दिया। बोला—“उस समय हम जवान थे, और साहब हमसे भी ज्यादा काले कारनामों में चमकते थे।”
अन्नू बाबू भी उन दिनों इलाके में खूब दिखते थे। कलम के धनी तो पहले से माने जाते थे, ऊपर से एरिया में दबदबा ऐसा कि हवा भी परमिशन लेकर गुजरती थी। स्टोर कॉलोनी का मकान नंबर अब याद नहीं, लेकिन सुमित बताता है कि जब धुले कपड़े लेकर वहां पहुंचा तो आंखें ऐसी फटीं कि फिर देर तक बंद ही नहीं हुईं।
उसी दौर में कुछ पत्रकार साहब से नाराज़ चल रहे थे, सो उन्होंने प्यार से नाम रख दिया—ब्लैक डॉग। मार्च का महीना था संभवत मैडम बच्चे आमतौर पर बाहर ही रहते थे कहते हैं कि यह तन्हाई वाले मौसम बड़े बेदर्द होते हैं, अब अंदर का नज़ारा क्या था, यह सुमित खुलकर नहीं बताता। बस इतना कहता है—“किसी से दगा हो रही थी, किसी से कुछ दिनों की वफ़ा निभाई जा रही थी, और माहौल ऐसा था जैसे रिश्तों की सेल लगी हो।”
इतना कहकर सुमित रुक गया, फिर बोला—“अंदर क्या-क्या था, मैं नहीं बता पाऊंगा… मेरी भी रोज़ी-रोटी है।”
बाद में जब साहब ने यहां से रुखसती ली, तो अचार के डब्बे, मसाले के डब्बे, सब पैक होने लगे। छुट्टियों में कभी-कभार आते भी थे, तो पुरानी यादों की धूल झाड़ जाते थे।
अब साहब का अलग ही जलवा है। विजिलेंस जांच चल रही है, मगर असर उतना ही है जितना गर्मी में बादल का। विरोधी लोग फाइलें पत्रकारों तक पहुंचा रहे हैं, लेकिन साहब की चमक ऐसी कि जैसे चमचमाती टाइल्स—थोड़ा पानी डालो, फिर से नई जैसी नजर आने लगती हैं।