अधिकारी बोले—निर्माण पूरी तरह अवैध, फिर किसके इशारे पर चल रहा काम? नगर पालिका ने अतिक्रमणकारियों को शेड-टाइल्स बांटे, SECL ने कहा—न अनुमति दी, न जानकारी है

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धनपुरी । कोल इंडिया की स्वामित्व भूमि पर चल रहे 83 लाख रुपये के निर्माण कार्य को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (SECL) के अधिकारियों ने साफ कहा है कि निर्माण कार्य पूरी तरह अवैध है और कंपनी की ओर से कोई अनुमति नहीं दी गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर नगर पालिका किसके संरक्षण में सरकारी धन की होली खेल रही है?

धनपुरी । नगर पालिका क्षेत्र में स्टेट बैंक शाखा के सामने स्थित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स परिसर में 83 लाख रुपये की लागत से चल रहे निर्माण कार्य पर अब आधिकारिक मुहर लग गई है कि यह काम पूरी तरह अवैध है। साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (SECL) सोहागपुर एरिया के संपदा अधिकारी एवं बुढार ग्रुप के क्षेत्रीय प्रबंधक जितेंद्र सिंह ने मीडिया से चर्चा में स्पष्ट कहा है कि जहां निर्माण कार्य कराया जा रहा है, वह पूरा क्षेत्र कोल इंडिया की स्वामित्व भूमि है और वहां किसी प्रकार की अनुमति कंपनी की ओर से नहीं दी गई है।

अधिकारी के इस बयान के बाद अब नगर पालिका धनपुरी, ठेकेदारों और कथित संरक्षण देने वाले जिम्मेदारों की भूमिका कटघरे में आ गई है। सवाल यह है कि जब भूमि कोल इंडिया की है, अनुमति नहीं दी गई, पहले काम रुकवाया जा चुका था, तो आखिर दोबारा मशीनें कैसे पहुंचीं? किसके आदेश पर निर्माण फिर शुरू हुआ? किस ताकत के दम पर सरकारी जमीन पर सरकारी धन बहाया जा रहा है?

जितेंद्र सिंह ने बताया कि बिना जानकारी के जब निर्माण कार्य शुरू किया गया था, तब पत्राचार किया गया और कोल इंडिया के अधिकारी मौके पर पहुंचे थे। उस समय निर्माण कार्य बंद भी कराया गया था। लेकिन अब दोबारा काम कैसे चालू हो गया, इसकी जानकारी स्थानीय कार्यालय को भी नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि यह निर्माण पूरी तरह अवैध है और शीघ्र ही टीम भेजकर काम बंद कराया जाएगा तथा कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

यह बयान उन तमाम आरोपों को मजबूती देता है जिनमें कहा जा रहा था कि कुछ प्रभावशाली लोग कोल इंडिया के स्थानीय अधिकारियों को “मैनेज” कर इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। चर्चा का केंद्र पूर्व कर्मचारी बताए जा रहे पीके श्रीवास्तव हैं, जिन पर आरोप है कि पुराने संपर्कों और प्रभाव का इस्तेमाल कर उन्होंने यह बड़ा ठेका हासिल किया। यदि अधिकारी स्वयं कह रहे हैं कि अनुमति नहीं दी गई, तो फिर ठेका किस आधार पर दिया गया?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह सिर्फ निर्माण कार्य नहीं, बल्कि 83 लाख रुपये की खुली बंदरबांट है। जिस स्थान पर वर्षों से अतिक्रमण फैला हुआ है, जहां दर्जनों लोगों ने दुकानें और मकान बनाकर कब्जा जमा रखा है, वहां अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होनी चाहिए थी। लेकिन इसके उलट नगर पालिका उन्हीं कब्जाधारियों को महंगे शेड, चमचमाती टाइल्स और सुविधाएं देकर नवाज रही है।

कोल इंडिया अधिकारी ने भी इस पर चिंता जताई कि जिस क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कराया जाना चाहिए, वहां नगर पालिका कब्जाधारियों को सुविधाएं दे रही है। यह बात आम जनता की समझ से भी परे है। आखिर क्या नगर पालिका का काम अवैध कब्जों को संरक्षण देना है? क्या जनता का पैसा इसलिए खर्च किया जा रहा है कि अतिक्रमणकारियों का कारोबार और मजबूत हो सके?

स्थानीय लोगों के अनुसार यह वही पुराना शॉपिंग कॉम्प्लेक्स क्षेत्र है जहां पहले से टाइल्स, संरचनाएं और अन्य सुविधाएं मौजूद थीं। बावजूद इसके पुरानी संरचनाएं तोड़ी जा रही हैं, नया शेड लगाया जा रहा है और सौंदर्यीकरण के नाम पर नया खर्च दिखाया जा रहा है। इससे आशंका गहराती है कि विकास की आड़ में भुगतान निकालने का खेल खेला जा रहा है।

नगर पालिका की तकनीकी शाखा और जिम्मेदार अधिकारियों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आखिर किस नक्शे, किस भू-अभिलेख और किस स्वामित्व दस्तावेज के आधार पर स्वीकृति दी गई? क्या निर्माण से पहले भूमि स्वामी की अनुमति जांची गई? यदि नहीं, तो यह लापरवाही है या सुनियोजित मिलीभगत?

अब जनता यह भी पूछ रही है कि जब कोल इंडिया पहले ही आपत्ति दर्ज करा चुका था, तब नगर पालिका ने भुगतान प्रक्रिया क्यों शुरू की? टेंडर किसने स्वीकृत किया? कार्यादेश किसने जारी किया? और यदि यह अवैध था तो संबंधित अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

धनपुरी में यह मामला अब सिर्फ निर्माण विवाद नहीं रहा, बल्कि सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्न बन चुका है। एक तरफ गरीब नागरिक मूलभूत सुविधाओं के लिए भटकते हैं, दूसरी ओर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जाधारियों के लिए लाखों रुपये के शेड और टाइल्स बिछाए जा रहे हैं।

जनता ने मांग की है कि 83 लाख रुपये के इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच हो, टेंडर प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए, जिम्मेदार अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज हो और कोल इंडिया की जमीन को तत्काल अतिक्रमण मुक्त कराया जाए।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—जब निर्माण कार्य खुद कोल इंडिया ने अवैध घोषित कर दिया, तो फिर नगर पालिका आखिर किसके इशारे पर 83 लाख रुपये की होली खेल रही है?

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