प्रशासनिक लापरवाही की हद: जनदर्शन और कलेक्टर की चौखट पर महीनों से भटक रही ग्राम पंचायत कोरजा की पूर्व सरपंच, शिकायतों पर अब तक नहीं हुआ कोई एक्शन
मोहम्मद शाकिब खान, मुख्य संवाददाता, गौरेला
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM): जिले में ‘कलेक्टर जनदर्शन’ और प्रशासनिक सुनवाई की जमीनी हकीकत क्या है, इसका जीता-जागता उदाहरण ग्राम पंचायत कोरजा के मामले में देखने को मिल रहा है। पंचायत की पूर्व सरपंच श्रीमती सोमवती कोल अपने कार्यकाल के लंबित भुगतानों और रुके हुए मानदेय को लेकर पिछले कई महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं, लेकिन अप्रैल 2026 का महीना खत्म होने को है और आज दिनांक तक उनकी किसी भी शिकायत का कोई निराकरण नहीं हुआ है।

महीनों से फाइलों में धूल खा रही हैं शिकायतें:
पूर्व सरपंच ने अपने अधिकारों और पंचायत के बकाया भुगतानों के लिए न्याय की हर संभव गुहार लगाई है। उनके द्वारा दिए गए दस्तावेजों और रिसीविंग के अनुसार:
09 दिसंबर 2025: जनदर्शन में कलेक्टर को लाखों रुपये के लंबित भुगतान की शिकायत दी गई।
16 दिसंबर 2025: जनदर्शन में ही 4 माह का मानदेय रोकने और वर्तमान सरपंच की दादागिरी की शिकायत की गई।
06 जनवरी 2026: एक बार फिर सीधे जिला कलेक्टर कार्यालय में पहुंचकर दस्तावेजों के साथ लंबित राशियों के भुगतान का आवेदन दिया गया।
इससे पहले मई और अक्टूबर 2025 में भी वे जनपद सीईओ को शिकायत कर चुकी थीं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जनदर्शन जैसे महत्वपूर्ण मंच पर शिकायत करने और महीनों बीत जाने (लगभग 4 महीने से अधिक) के बावजूद, प्रशासन ने इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया है।
क्या है पूरा विवाद?
पूर्व सरपंच सोमवती कोल (कार्यकाल 2020-2025) का आरोप है कि वर्तमान सरपंच और सचिव द्वारा दुर्भावनापूर्ण तरीके से उनके कार्यकाल के दौरान कराए गए वैध कार्यों का भुगतान रोका गया है।
इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं: नल-जल योजना: ₹2,99,000/-, चुनाव संबंधी व्यवस्थाएं (सामग्री व अन्य): ₹1,74,015/-, (₹73,450 + ₹1,00,565), लोकसभा चुनाव व्यवस्था: ₹36,850/-, अन्य कार्यक्रम व खर्च: ₹33,000/- (मितानिन, दिवस और चुनाव खाद्य सामग्री)
हक का मानदेय भी रोका, ऊपर से ‘दादागिरी’:
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शासन द्वारा पूर्व सरपंच और पंचों के 4 माह के मानदेय की राशि ग्राम पंचायत के खाते में भेजी जा चुकी है। जिले की अन्य पंचायतों में दीपावली के समय ही इसका वितरण हो गया था, लेकिन कोरजा पंचायत में इसे दबा दिया गया है। जब पूर्व सरपंच अपना मानदेय मांगती हैं, तो आरोप है कि वर्तमान सरपंच द्वारा उनके साथ ‘दादागिरी’ की जाती है और साफ कह दिया जाता है कि कोई पैसा नहीं मिलेगा।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल:
इस पूरे प्रकरण ने गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जब एक पूर्व जन-प्रतिनिधि को अपने ही जायज भुगतानों और शासन से आए मानदेय के लिए 6-6 महीने तक कलेक्टर और सीईओ कार्यालय के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, तो आम जनता की शिकायतों का जनदर्शन में क्या हश्र होता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
अब यह देखना बाकी है कि महीनों से सो रहा प्रशासन क्या अब इस मामले में कोई ठोस कदम उठाता है, या पूर्व सरपंच को आगे भी यूं ही दफ्तरों के धक्के खाने पड़ेंगे।