विवादित और बेतुका पत्र: ‘श्री राम सेना भारत’ के नेता ने की यूपी के मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर गिरफ्तार करने की मांग

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मोहम्मद शाकिब खान मुख्य संवाददाता गौरेला

 

पेण्ड्रा (3 मई 2026): छत्तीसगढ़ के पेण्ड्रा निवासी और खुद को ‘श्री राम सेना भारत’ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताने वाले महर्षि गौतम का एक बेहद विवादित, भड़काऊ और हास्यास्पद पत्र सामने आया है। उत्तर प्रदेश के माननीय राज्यपाल को संबोधित इस पत्र में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर गिरफ्तार करने जैसी असंवैधानिक मांगें की गई हैं।

 

पत्र की भाषा न केवल समाज में द्वेष फैलाने वाली है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारतीय संविधान और देश की न्यायपालिका की खुली अवमानना करती नजर आती है।

 

पत्र की मुख्य विवादित बातें और उनकी असलियत:

न्यायपालिका का अपमान और संवैधानिक अज्ञानता: पत्र में बेहद बेतुका दावा किया गया है कि “माननीय न्यायालय के पास धार्मिक मामलों पर सुनवाई की शक्ति ही नहीं है क्योंकि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है।” यह तर्क पूरी तरह से हास्यास्पद है।

 

भारत का संविधान ही सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को हर प्रकार के विवादों (जिसमें धार्मिक स्थलों से जुड़े संपत्ति और अधिकारों के मामले भी शामिल हैं) पर सुनवाई करने का अधिकार देता है।

 

भड़काऊ और सांप्रदायिक टिप्पणी: प्रेषक ने पत्र में एक पूरे समुदाय (मुस्लिम समाज) को “शरणार्थी” करार दिया है। भारत के नागरिक किसी भी धर्म के हों, वे देश के समान अधिकार प्राप्त नागरिक हैं, न कि शरणार्थी। इस तरह की भाषा स्पष्ट रूप से समाज में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और नफरत फैलाने का एक निंदनीय प्रयास है।

 

लोकतांत्रिक ढांचे की समझ का अभाव: पत्र में दावा किया गया है कि धार्मिक मामलों के निराकरण की शक्ति मुख्यमंत्री के पास होती है। यह देश की न्याय प्रणाली को नकारने जैसा है। मुख्यमंत्री किसी भी अदालत में चल रहे मामलों को अपनी मर्जी से ‘वापस लेकर’ संपत्तियां किसी को सौंप नहीं सकते। भारत में कानून का राज है, किसी व्यक्ति विशेष का नहीं।

 

10 हज़ार करोड़ के जुर्माने की बेतुकी मांग: पत्र के अंत में एक और हास्यास्पद मांग की गई है, जिसमें शिकायतकर्ता से “दस हजार करोड़” (10,000 Crore) का जुर्माना वसूलने का आदेश देने की बात कही गई है। यह आंकड़ा इस पत्र को एक गंभीर पत्राचार के बजाय किसी सस्ती फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा बनाता है।

सस्ती लोकप्रियता का हथकंडा

 

कानूनी जानकारों की मानें तो यह पत्र केवल मीडिया और जनता का ध्यान खींचने के लिए लिखा गया एक ‘पब्लिसिटी स्टंट’ है। काशी विश्वनाथ और मथुरा जन्मभूमि से जुड़े मामले पहले ही देश की अदालतों में कानूनी प्रक्रिया के तहत विचाराधीन हैं। ऐसे में न्यायपालिका को दरकिनार कर सीधे राज्यपाल से ऐसी तानाशाही और असंवैधानिक मांगें करना न सिर्फ बचकाना है, बल्कि कानूनी रूप से दंडनीय भी हो सकता है।

 

इस पत्र की प्रतिलिपि भारत के राष्ट्रपति को भी ‘सूचनार्थ’ भेजी गई है, जो इस बात का परिचायक है कि प्रेषक इस भड़काऊ सामग्री के जरिए अपनी व्यक्तिगत या राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहता है। जानकारों का मानना है कि पुलिस और प्रशासन को ऐसे भड़काऊ पत्रों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए, समाज में नफरत फैलाने के आरोप में प्रेषक के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।

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