कब तक मरते रहेंगी ज्योति लीलावती?गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही में स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर: D.D. अस्पताल की लूट और लापरवाही से एक और मौत, और कितनी लाशों का इंतजार कर रहा प्रशासन?
गौरेला पेण्ड्रा मरवाही (GPM): जिले में स्वास्थ्य सुविधाएं अब मरीजों की जान बचाने के बजाय, प्राइवेट अस्पतालों के लिए ‘मुनाफाखोरी का टूल’ बनकर रह गई हैं। गौरेला के सेमरा स्थित निजी D.D. अस्पताल पर एक बार फिर मौत का सौदागर होने का गंभीर आरोप लगा है। एक गरीब और बेबस परिवार से डेढ़ लाख रुपये ऐंठने के बाद, जब मरीज की हालत बिगड़ने लगी तो अस्पताल प्रबंधन ने जबरन बॉण्ड भरवाकर पल्ला झाड़ लिया। नतीजा— उचित इलाज के अभाव में तड़पते हुए महिला ने दम तोड़ दिया।
इस घटना ने न सिर्फ D.D. अस्पताल के अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है, बल्कि जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली और खामोश बैठे जिला प्रशासन पर भी कई गंभीर और कर्कश सवाल खड़े कर दिए हैं।
मजबूरी का फायदा उठाकर डेढ़ लाख की लूट और फिर मौत के मुंह में धकेला
जिल्दा निवासी आनंद सिंह अपनी गर्भवती पत्नी लीलावती आर्मो को प्रसव पीड़ा होने पर रात करीब 1 बजे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। लेकिन यहां से उन्हें बिलासपुर (SIMS) रेफर कर दिया गया। रात का वक्त, साथ में कोई रिश्तेदार नहीं और बिलासपुर जाने के लिए एम्बुलेंस तक नदारद। बेबस पति ने पत्नी को तड़पता देख पास के ही निजी D.D. अस्पताल में भर्ती करा दिया।
पैसों की अंधी हवस: 5 तारीख की रात को सिजेरियन ऑपरेशन हुआ। सुबह 10 बजे से जब लीलावती की तबीयत बिगड़ने लगी, तो डॉक्टर ‘सब ठीक हो जाएगा’ का रटा-रटाया झांसा देकर पैसों की मांग करते रहे।
कर्ज लेकर चुकाए 1.5 लाख: आनंद ने जैसे-तैसे कर्ज लेकर डेढ़ लाख रुपये अस्पताल में जमा किए।
जिम्मेदारी से भागने की चालाकी: जब मरीज की हालत बेहद नाजुक हो गई और आनंद के पास पैसे खत्म हो गए, तो D.D. अस्पताल ने अपनी कानूनी गर्दन बचाने के लिए आनंद से जबरन एक बॉण्ड पेपर पर लिखवा लिया कि वे “मरीज को अपनी मर्जी से ले जा रहे हैं” और उसे डिस्चार्ज कर दिया।
अंततः दुखद मौत: घर पहुंचते ही लीलावती की हालत और बिगड़ी। आज जब उसे दोबारा जिला अस्पताल लाया गया, तो इलाज के महज आधे घंटे के भीतर ही उसने दम तोड़ दिया।
जिला अस्पताल के डॉ. बिपिन का बयान: “35 वर्षीय लीलावती को जब इमरजेंसी में लाया गया, तब उसकी हालत बेहद नाजुक थी। उसे लगातार तेज झटके आ रहे थे और बहुत तेज बुखार था। हमने तुरंत इलाज शुरू किया, लेकिन स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि आधे घंटे के भीतर ही दोपहर 2:00 बजे उसकी मौत हो गई।”
महज ‘रेफर सेंटर’ बनकर रह गया है जिला अस्पताल!
इस पूरी त्रासदी की जड़ में है जिला अस्पताल, जो अब सिर्फ मरीजों को बाहर का रास्ता दिखाने वाला ‘रेफरल सेंटर’ बनकर रह गया है।
रात 1 बजे एक तड़पती गर्भवती महिला को रेफर तो कर दिया गया, लेकिन उसे गंतव्य तक पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या जिला अस्पताल की जिम्मेदारी सिर्फ पर्ची काटकर बिलासपुर (SIMS) का रास्ता दिखाने की है?
अगर सरकारी अस्पताल रात के वक्त इमरजेंसी नहीं संभाल सकते, तो फिर करोड़ों का बजट और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों का क्या अर्थ है?
यही वह सरकारी ‘रेफरल सिस्टम’ है, जो गरीब मरीजों को D.D. अस्पताल जैसे निजी बूचड़खानों के जबड़े में धकेल रहा है।
D.D. अस्पताल: मौतों का सिलसिला और प्रबंधन की बेशर्मी
यह कोई पहला मामला नहीं है। D.D. अस्पताल पर लगातार लापरवाही के गंभीर आरोप लगते रहे हैं:
ज्योति चौधरी की मौत का ताजा मामला: परसों रात ही अस्पताल के सामने परिजनों ने शव रखकर जमकर हंगामा किया था। आरोप था कि 4-5 दिनों तक इलाज में भारी लापरवाही बरती गई, जिससे ज्योति चौधरी की मौत बिलासपुर में हो गई।
संचालक की सफेद झूठ: इन मौतों और हंगामे के बीच D.D. अस्पताल के संचालक अखिलेश तिवारी का बयान उनकी संवेदनहीनता को दर्शाता है। उनका रटा-रटाया जवाब कि “इलाज तय नियमों के अनुसार हुआ और कोई लापरवाही नहीं की गई,” पीड़ित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
जिला प्रशासन से सीधे और चुभते सवाल
लीलावती की मौत सिर्फ एक मेडिकल ट्रेजेडी नहीं है, यह सिस्टम द्वारा की गई एक संस्थागत हत्या है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की इस रहस्यमयी चुप्पी पर अब ये सवाल उठने लाजमी हैं:
और कितनी मौतों का इंतजार?
D.D. अस्पताल में लगातार हो रही मौतों और हंगामे के बाद भी अस्पताल का लाइसेंस अब तक रद्द क्यों नहीं किया गया? प्रशासन और कितने परिवारों के उजड़ने का इंतजार कर रहा है?
प्रशासनिक संरक्षण का शक: क्या D.D. अस्पताल प्रबंधन की ऊंची पहुंच के कारण स्वास्थ्य विभाग आंखें मूंद कर बैठा है? एक के बाद एक मौतें होने पर भी अस्पताल को सील करने की कार्यवाही क्यों नहीं की गई?
जबरन बॉण्ड भरवाने पर FIR क्यों नहीं?
गंभीर हालत में मरीज को बिना रेफर किए, जबरन बॉण्ड भरवाकर निकाल देना सीधे तौर पर हत्या के प्रयास की श्रेणी में आता है। प्रशासन ने अब तक स्वतः संज्ञान लेकर अस्पताल प्रबंधन पर FIR दर्ज क्यों नहीं करवाई?
जिला अस्पताल की जवाबदेही कौन तय करेगा? बिना ट्रांसपोर्ट की सुविधा सुनिश्चित किए, रात 1 बजे सीरियस पेशेंट को ‘रेफर’ कर देने वाले सरकारी डॉक्टरों पर क्या कार्रवाई होगी?
मृतक महिला के परिवार और आक्रोशित ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है— मामले की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए। अब वक्त आ गया है कि जिला प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से जागे। अगर अब भी D.D. अस्पताल को सील करने जैसी सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि इस ‘मौत के व्यापार’ में प्रशासन की भी मूक सहमति है।