बुढ़ार में मनरेगा बजट की ‘लूट’: एपीओ दिवाकर और एसडीओ राघवेंद्र की जुगलबंदी ने तोड़े भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड
शहडोल। “जरा धीरे-धीरे चलो साहबद्वय, जनता की गाढ़ी कमाई पर इस कदर भी डाका मत डालो कि कफ़न की सिलाई भी कम पड़ जाए!” बुढ़ार जनपद पंचायत में इन दिनों महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का बजट क्या आया, जिम्मेदार अधिकारियों ने जैसे अपने ईमान और घर-बार दोनों का मोह छोड़ दिया है। विकास के नाम पर आए करोड़ों रुपये के इस भारी-भरकम बजट को पलक झपकते ही “ठिकाने” लगाने के लिए जनपद के दो रसूखदार अधिकारी अपनी पूरी ऊर्जा, ताकत और शातिर दिमाग झोंक रहे हैं। क्षेत्र में चर्चा है कि करोड़ों के इस सरकारी खजाने को देखकर दोनों साहबों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा है कि इतनी बड़ी राशि को कागजों पर किस-किस तरह से खर्च दिखाया जाए और कितनी जल्दी अपनी तिजोरियों में ठूंस लिया जाए।बुढ़ार ब्लॉक में पदस्थ अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी दिवाकर सिंह और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के सहायक यंत्री राघवेंद्र सिंह की जुगलबंदी इन दिनों पूरे प्रशासनिक अमले और आम जनता के बीच थू-थू का विषय बनी हुई है। इन दोनों की ‘विशेष ट्यूनिंग’ और रणनीतिक सांठगांठ ने क्षेत्र में भ्रष्टाचार के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। जमीनी हकीकत से कोसों दूर, केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर कागजों पर विकास की गंगा बहाई जा रही है। फर्जी मस्टर रोल तैयार करना, चहेते वेंडरों के माध्यम से बिना सामग्री आपूर्ति के लाखों-करोड़ों के फर्जी बिल पास कराना और पंचायतों में बिना काम के ही राशि का आहरण कर लेना अब बुढ़ार जनपद की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली बन चुका है। ग्रामीण रोजगार के नाम पर आई इस राशि का बंदरबांट इतनी बेरहमी और बेशरमी से किया जा रहा है कि वास्तविक मजदूर आज भी दो वक्त की रोटी और काम के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं, जबकि साहबों के बंगले और चमचमाती गाड़ियां इस बात की गवाही दे रही हैं कि मनरेगा का असली ‘मजदूर’ कौन है।
यह कोई पहला मौका नहीं है जब इन दोनों अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठी हैं। यदि इनके काले इतिहास को खंगाला जाए, तो दिवाकर सिंह और राघवेंद्र सिंह के कारनामे पहले भी कई बार सुर्खियों में रहकर प्रशासन को शर्मसार कर चुके हैं। एपीओ दिवाकर सिंह का ट्रैक रिकॉर्ड गवाह है कि पूर्व में भी इन पर मनरेगा के तहत तालाब निर्माण, मेढ़ बंधान और वृक्षारोपण जैसे कार्यों में भारी फर्जीवाड़ा करने के गंभीर आरोप लगे हैं। मृत व्यक्तियों और सरकारी कर्मचारियों के नाम पर मजदूरी आहरित करने, चहेती ग्राम पंचायतों को उपकृत करने और तकनीकी मूल्यांकन में हेरफेर करने के मामलों में इनके खिलाफ शिकायतें दर्ज हैं। विभागीय जांच की फाइलें आज भी वरिष्ठ कार्यालयों में धूल फांक रही हैं, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक रसूख के चलते इन पर कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। वहीं आरईएस विभाग के एसडीओ राघवेंद्र सिंह का विवादित इतिहास भी कम दागदार नहीं है। पूर्व में उप-यंत्रियों पर अनुचित दबाव बनाने, निर्माण कार्यों की तकनीकी स्वीकृति और मूल्यांकन के एवज में मोटा कमीशन वसूलने के गंभीर आरोप इन पर लग चुके हैं। इनके कार्यकाल में निर्मित कई सीसी रोड और सामुदायिक भवन पहली बारिश में ही बह गए, जिसकी शिकायतें लोकायुक्त तक भी पहुंची थीं।
जब दोनों ही अधिकारियों का पिछला रिकॉर्ड इतना विवादित और दागी रहा है, तो फिर मनरेगा जैसे संवेदनशील और सीधे गरीबों के पेट से जुड़े बजट की चाबी इन्हीं ‘साहबद्वय’ के हाथों में क्यों सौंप दी गई? क्या जिला प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारियों को इस खुली लूट की भनक नहीं है, या फिर इस बहती गंगा में ऊपर तक हाथ धोए जा रहे हैं और सब ‘प्रतिशत’ के खेल में मौन हैं? करोड़ों के सरकारी बजट को ठिकाने लगाने की यह अंधी दौड़ चीख-चीखकर उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है। यदि वक्त रहते संभाग और जिला स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बेलगाम जुगलबंदी पर नकेल नहीं कसी और इन्हें सलाखों के पीछे नहीं भेजा, तो बुढ़ार जनपद का यह मनरेगा बजट सिर्फ कागजी आंकड़ों, फर्जी बिलों और इन साहबों की आलीशान तिजोरियों तक ही सिमटकर रह जाएगा और गरीब ग्रामीण अपनी बेबसी पर आंसू बहाता रहेगा।