मोबाइल चोरी से बैंक खाते तक: बाकल पुलिस ने खोला साइबर गिरोह का दरवाजा, लेकिन असली कहानी अभी बाकी झारखंड के तीन आरोपी गिरफ्तार, 14 मोबाइल चोरी की कबूली, 2.10 लाख की साइबर ठगी का खुलासा…अब सवाल, एक साल तक जबलपुर में कैसे जमे रहे बाहरी आरोपी, मालदा के करीम शेख उर्फ साजन तक पुलिस कब पहुंचेगी
मोबाइल चोरी से बैंक खाते तक: बाकल पुलिस ने खोला साइबर गिरोह का दरवाजा, लेकिन असली कहानी अभी बाकी
झारखंड के तीन आरोपी गिरफ्तार, 14 मोबाइल चोरी की कबूली, 2.10 लाख की साइबर ठगी का खुलासा…अब सवाल, एक साल तक जबलपुर में कैसे जमे रहे बाहरी आरोपी, मालदा के करीम शेख उर्फ साजन तक पुलिस कब पहुंचेगी
कटनी /बाकल।। एक मोबाइल चोरी हुआ… मोबाइल चोरों के हाथ बैंक खाते की चाबी लगी… यूपीआई के जरिए 2 लाख 10 हजार रुपये दूसरे खातों में पहुंच गए..और जब पुलिस ने तकनीकी जांच की तो मामला सिर्फ बाकल बाजार में हुई एक चोरी का नहीं, बल्कि जबलपुर से लेकर झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक फैले एक कथित अंतरराज्यीय नेटवर्क की ओर इशारा करता नजर आया। बाकल पुलिस ने झारखंड के तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर इस नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी तो पकड़ ली है, लेकिन पूछताछ में सामने आए तथ्य अब पुलिस के सामने कई बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है,जब आरोपी करीब एक साल से जबलपुर में रह रहे थे और अलग-अलग बाजारों में मोबाइल चोरी कर रहे थे, तो उनकी गतिविधियों की भनक स्थानीय पुलिस और निगरानी तंत्र को पहले क्यों नहीं लगी और दूसरा सवाल इससे भी गंभीर है, पुलिस के अनुसार गिरोह में मालदा, पश्चिम बंगाल निवासी करीम शेख उर्फ साजन भी शामिल है। आखिर वह जबलपुर में किस आधार पर रह रहा था उसका स्थानीय पता क्या था? उसका किरायेदार सत्यापन हुआ था या नहीं वह किन लोगों के संपर्क में था? और अब तक उसकी भूमिका की स्वतंत्र जांच कितनी आगे बढ़ी है।

26 जून का मोबाइल और तीन दिन में 2.10 लाख की निकासी
26 जून 2026 को बाकल बाजार से शंकरलाल महतो का मोबाइल फोन चोरी हुआ। कुछ ही दिनों बाद उनके बैंक खातों में हुई गतिविधियों ने पूरे मामले को साइबर अपराध से जोड़ दिया। 29 जून, 30 जून और 1 जुलाई को उनके बचत खाते एवं केसीसी खाते से कुल 2 लाख 10 हजार रुपये निकाल लिए गए। शिकायत मिलने के बाद बाकल थाने में अपराध क्रमांक 287/2026 के तहत धारा 318(4) बीएनएस में मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों की पड़ताल शुरू की और जांच धीरे-धीरे बाकल से बाहर निकलकर दूसरे जिलों और राज्यों तक पहुंच गई।
15 अगस्त को झिंझरी में मिली बड़ी कड़ी
जांच के दौरान 15 अगस्त को तीन संदिग्ध व्यक्ति झिंझरी क्षेत्र में कथित रूप से एक अन्य साइबर फ्रॉड की तैयारी में घूमते मिले। पूछताछ के बाद उनकी पहचान तिवारी महतो उम्र 35 वर्ष, उज्जवल कुमार उर्फ डिस्को महतो उम्र 39 वर्ष और रोनू महतो के रूप में हुई। तीनों साहिबगंज, झारखंड के निवासी बताए गए हैं। पूछताछ में पुलिस के अनुसार आरोपियों ने 26 जून को बाकल बाजार से शंकरलाल महतो का मोबाइल चोरी करना स्वीकार किया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
एक साल से जबलपुर में डेरा किसकी नजर में थे आरोपी
पुलिस के मुताबिक आरोपियों ने बताया कि वे पिछले करीब एक वर्ष से जबलपुर के दीनदयाल चौक के पास किराए के मकान में रह रहे थे।
यानी जिस नेटवर्क पर अब कार्रवाई हुई, उसकी गतिविधियां कथित तौर पर एक-दो दिन की नहीं थीं। आरोपियों ने बाकल के अलावा सिहोरा, गढ़ा और लार्डगंज सहित कटनी के बहोरीबंद तथा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भी वारदातें करना स्वीकार किया है। यह तथ्य जांच को एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल तक ले जाता है। क्या जबलपुर में बाहर से आकर रहने वाले इन लोगों का पुलिस सत्यापन हुआ था। यदि हुआ था तो क्या उनके पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड की जांच हुई, यदि नहीं हुआ था तो एक वर्ष तक उनके किराए के मकान में रहने की जानकारी पुलिस रिकॉर्ड में क्यों नहीं पहुंची,और यदि गिरोह के सदस्य लगातार अलग-अलग बाजारों में मोबाइल चोरी कर रहे थे तो उनके मोबाइल नंबर, बैंक लेन-देन और स्थानीय संपर्कों का पैटर्न पहले क्यों नहीं पकड़ा गया।
करीम शेख उर्फ साजन,इस कहानी का सबसे अहम नाम
पूछताछ में पुलिस के सामने एक और नाम आया—करीम शेख उर्फ साजन, निवासी मालदा, पश्चिम बंगाल। पुलिस के अनुसार आरोपियों ने बताया कि गिरोह में करीम शेख भी शामिल था। चोरी किए गए मोबाइल फोन उसके पास भेजे जाते थे और रकम का बंटवारा गिरोह के सदस्यों के बीच किया जाता था। यदि यह जानकारी जांच में प्रमाणित होती है तो करीम शेख की भूमिका पूरे नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है,करीम शेख उर्फ साजन जबलपुर में किस आधार पर रह रहा था,क्या उसका कोई स्थायी या स्थानीय पता था,क्या वह किसी किराए के मकान में रह रहा था,क्या उसका पुलिस वेरिफिकेशन हुआ,वह किन मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल कर रहा था,उसके बैंक खातों और यूपीआई आईडी में किन लोगों से लेन-देन हुआ,चोरी किए गए मोबाइल वास्तव में उसके पास पहुंचे या नहीं,और सबसे महत्वपूर्ण क्या वह अभी जबलपुर में है या पुलिस की पहुंच से बाहर जा चुका है. इन सवालों के जवाब सामने आना इस मामले को महज तीन आरोपियों की गिरफ्तारी से कहीं आगे ले जाएगा।
मोबाइल नहीं, पूरा फ्रॉड मॉडल था निशाने पर
पुलिस के अनुसार गिरोह ऐसे मोबाइलों को निशाना बनाता था जिनमें स्क्रीन लॉक नहीं होता था या जिन्हें आसानी से खोला जा सकता था। मोबाइल हाथ लगते ही अगला निशाना फोन नहीं, बल्कि उससे जुड़े बैंक खाते होते थे। आरोपियों के अनुसार ऐसे मोबाइलों में यूपीआई पिन सेट कर खातों से रकम दूसरे खातों में ट्रांसफर की जाती थी। इसके बाद मोबाइल आगे भेज दिए जाते थे और प्राप्त रकम गिरोह के सदस्यों में बांटी जाती थी। अर्थात अपराध का मॉडल कथित रूप से तीन चरणों में काम करता था। मोबाइल चोरी, डिजिटल एक्सेस, बैंक खाते से रकम ट्रांसफर। यही वजह है कि इस मामले में बरामदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण अब डिजिटल मनी ट्रेल है।
14 मोबाइल चोरी कितने खातों का पैसा गया, आरोपियों ने कुल 14 मोबाइल चोरी करने की बात स्वीकार की है। अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह होगा कि,इन 14 मोबाइलों में कितने फोन से डिजिटल ठगी की गई,कितने बैंक खाते या यूपीआई आईडी प्रभावित हुए,रकम किन-किन खातों में पहुंची,उन खातों के वास्तविक संचालक कौन हैं, क्या वे स्वयं गिरोह का हिस्सा हैं या केवल मनी ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल किए गए,
चोरी के मोबाइलों का अंतिम खरीदार कौन था
क्या मालदा से लेकर जबलपुर तक मोबाइलों की कोई नियमित सप्लाई चेन चल रही थी,इन सवालों के जवाब सामने आने पर ही पता चलेगा कि 2.10 लाख रुपये की ठगी इस नेटवर्क का पूरा कारोबार है या केवल एक मामला।
जबलपुर में बाहरी अपराधियों की एंट्री पर भी हो जांच
यह मामला एक और संवेदनशील पहलू सामने लाता है,अंतरराज्यीय अपराधियों का शहर में प्रवेश और लंबे समय तक ठिकाना बनाना। झारखंड के आरोपी यदि एक वर्ष से जबलपुर में रह रहे थे और पश्चिम बंगाल के व्यक्ति का नाम भी गिरोह में सामने आया है, तो पुलिस को केवल वर्तमान घटना नहीं, बल्कि इन लोगों के जबलपुर पहुंचने से लेकर उनके स्थानीय संपर्कों तक की पूरी कड़ी खंगालनी होगी।
किसने उन्हें मकान दिलाया,किसके संपर्क में वे आए,उनकी रोजमर्रा की गतिविधियां क्या थीं
क्या किसी स्थानीय व्यक्ति ने उन्हें चोरी के मोबाइल बेचने, ठिकाना उपलब्ध कराने या बैंक खातों की व्यवस्था में मदद की,यही जांच इस कथित गिरोह के स्थानीय नेटवर्क को उजागर कर सकती है। बाकल पुलिस की कार्रवाई महत्वपूर्ण, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू बाकल पुलिस की टीम ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर मामले की कड़ी जोड़कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण सफलता है। लेकिन इस कार्रवाई से खुलने वाले सवालों के जवाब भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। करीम शेख उर्फ साजन की तलाश और उसकी भूमिका की पुष्टि, आरोपियों के जबलपुर प्रवास का सत्यापन, किरायेदार सत्यापन की जांच, 14 मोबाइलों की बरामदगी एवं उनके डिजिटल डेटा का विश्लेषण और बैंक खातों की पूरी मनी ट्रेल—अब जांच के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं। क्योंकि यह सिर्फ एक मोबाइल चोरी का मामला नहीं है। यह उस डिजिटल अपराध मॉडल की कहानी है, जिसमें जेब से चुराया गया मोबाइल कुछ ही घंटों में किसी व्यक्ति के बैंक खाते तक पहुंचने का रास्ता बन सकता है।और अगर आरोपियों का एक साल तक जबलपुर में रहना जांच में प्रमाणित होता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा अपराधी बाहर से आए थे, लेकिन इतने लंबे समय तक शहर में रहे तो उन्हें पहचानने और रोकने वाली व्यवस्था कहां थी।
अब बाकल पुलिस की इस कार्रवाई के बाद निगाहें इस बात पर हैं कि करीम शेख उर्फ साजन तक जांच कब पहुंचती है और इस कथित अंतरराज्यीय नेटवर्क में जबलपुर के कितने स्थानीय चेहरे सामने आते हैं।