जब कलेक्टर ने कहा चलिए, चलकर देखते हैं.. एक किलोमीटर पैदल, फिर दो किलोमीटर बाइक… कलेक्टर ने उसी सड़क पर महसूस की ग्रामीणों की परेशानी, जहां बरसात में रास्ता नहीं, मजबूरी बचती है

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जब कलेक्टर ने कहा चलिए, चलकर देखते हैं..
एक किलोमीटर पैदल, फिर दो किलोमीटर बाइक… कलेक्टर ने उसी सड़क पर महसूस की ग्रामीणों की परेशानी, जहां बरसात में रास्ता नहीं, मजबूरी बचती है
कटनी।। सरकारी दफ्तरों में समस्याएं अक्सर आवेदन बनकर पहुंचती हैं। फिर फाइल बनती है, नोटशीट चलती है, निरीक्षण के निर्देश होते हैं और समाधान का इंतजार शुरू हो जाता है। लेकिन ढीमरखेड़ा के ग्राम हल्का में सड़क की समस्या लेकर पहुंचे ग्रामीणों को उस समय शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि उनकी शिकायत का जवाब कागज पर नहीं, बल्कि उसी सड़क पर पैदल और मोटरसाइकिल से चलकर दिया जाएगा।
ग्रामीणों ने बोंदा तिराहा से बसहरा मार्ग की बदहाल स्थिति बताई। मिट्टी और मुरूम की सड़क, बरसात में बहता रास्ता, जगह-जगह कीचड़ और आवागमन की परेशानी,ग्रामीणों की कहानी कोई नई नहीं थी। नई बात थी उसका जवाब।
कलेक्टर आशीष तिवारी ने अधिकारियों की तरफ देखा और निर्देश देने के बजाय ग्रामीणों से कहा
चलिए, चलकर देखते हैं….यहीं से यह महज सड़क निरीक्षण की कहानी नहीं रही। पहले पैदल चले, फिर खुद थामी बाइक की कमान,कलेक्टर ग्रामीणों के साथ करीब एक किलोमीटर पैदल चले। यह वही रास्ता था, जिसकी शिकायत अभी कुछ देर पहले शब्दों में सुनाई गई थी। अब वही समस्या आंखों के सामने थी,सड़क की बनावट, रास्ते की कठिनाई और ग्रामीणों की रोजमर्रा की मजबूरी। आगे रास्ता और चुनौतीपूर्ण था। तभी गांव के एक व्यक्ति की मोटरसाइकिल सामने आई।
कलेक्टर ने मोटरसाइकिल संभाली।
पीछे पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा बैठे।
और फिर जिले के दो शीर्ष अधिकारी उसी रास्ते पर निकल पड़े, जिस पर ग्रामीण बरसात में मजबूरी में सफर करते हैं। करीब दो किलोमीटर तक कलेक्टर ने स्वयं मोटरसाइकिल चलाई और एसपी पीछे बैठे रहे। यह दृश्य अपने आप में असामान्य था, लेकिन इस दृश्य का असली महत्व तस्वीर में नहीं, उस संदेश में था जो यह ग्रामीणों तक पहुंचा।

सड़क को देखा नहीं, सड़क को जिया
किसी सड़क की स्थिति का निरीक्षण सरकारी वाहन से उतरकर कुछ मिनट में भी किया जा सकता है। लेकिन यहां बात कुछ अलग थी।
जब अधिकारी उसी रास्ते पर पैदल चलता है, जिस पर ग्रामीण रोज चलते हैं, तो समस्या केवल सड़क खराब है नहीं रह जाती। वह समझ में आती है कि
बारिश में कहां पैर फिसलेगा,कहां बाइक फंसेगी,
कहां कीचड़ रास्ता रोक देगा और कहां एक छोटी दूरी भी ग्रामीण के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी।
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। कलेक्टर का मोटरसाइकिल चलाना अपने आप में खबर नहीं है। असली खबर यह है कि उन्होंने ग्रामीण की समस्या को कार्यालयीन रिपोर्ट के बजाय उसी जमीन पर जाकर समझने की कोशिश की।

जन-विश्वास का अर्थ यहीं दिखाई देता है

मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान के तहत प्रशासन ग्रामीणों तक पहुंच रहा है। लेकिन किसी भी अभियान की सफलता का वास्तविक पैमाना शिविरों की संख्या या अधिकारियों के दौरों से अधिक यह है कि क्या आम आदमी को लगता है कि उसकी बात सचमुच सुनी जा रही है ग्राम हल्का में सड़क के निरीक्षण का यह घटनाक्रम इसी सवाल का एक अलग जवाब देता है।
ग्रामीणों ने सड़क मांगी थी। कलेक्टर ने सड़क देखी। ग्रामीणों ने बारिश की परेशानी बताई।
कलेक्टर ने उसी रास्ते की मुश्किल महसूस की।
और निरीक्षण के बाद पक्की सड़क के लिए स्टीमेट तैयार करने के निर्देश दिए गए। यानी शिकायत से समाधान की दिशा तक की पहली कड़ी मौके पर ही जुड़ गई।
बरसात में सड़क नहीं, ग्रामीणों की परीक्षा होती है
बोंदा तिराहा से बसहरा मार्ग फिलहाल मिट्टी और मुरूम का है। सामान्य मौसम में यही सड़क किसी तरह आवागमन का माध्यम बनी रहती है, लेकिन बारिश आते ही इसकी तस्वीर बदल जाती है। बारिश मुरूम बहा ले जाती है। रास्ता कीचड़ में बदल जाता है। दो पहिया वाहन चलाना कठिन हो जाता है और ग्रामीणों के लिए आवागमन रोज की चुनौती बन जाता है।
ऐसी सड़क का असर केवल आने-जाने तक सीमित नहीं रहता। गांव की अर्थव्यवस्था, बच्चों की आवाजाही, जरूरी कामों के लिए बाजार तक पहुंच और आपात परिस्थितियों में आवागमन,सब प्रभावित होते हैं। इसलिए ग्रामीणों की पक्की सड़क की मांग को केवल निर्माण कार्य की मांग मानना समस्या को छोटा करके देखना होगा। दरअसल यह गांव के बेहतर जुड़ाव और रोजमर्रा के जीवन को आसान बनाने की मांग है।

अफसर और ग्रामीण के बीच दूरी कितनी है
इस पूरे घटनाक्रम को एक और नजरिए से देखें तो यह प्रशासनिक कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा करता है। सरकारी व्यवस्था में अधिकारी और ग्रामीण के बीच अक्सर एक दूरी दिखाई देती है—एक तरफ शिकायत करने वाला नागरिक और दूसरी तरफ निर्णय लेने वाला अधिकारी। लेकिन जब अधिकारी स्वयं ग्रामीण के साथ चल पड़ता है, तो यह दूरी कुछ कम होती है।यह जरूरी नहीं कि हर समस्या का समाधान उसी दिन हो जाए। यह भी जरूरी नहीं कि हर सड़क तत्काल पक्की बन जाए।
लेकिन यह जरूर जरूरी है कि जिस व्यक्ति के हाथ में निर्णय लेने की जिम्मेदारी है, वह समस्या की वास्तविकता को समझे। ग्राम हल्का में कलेक्टर का कदम इसी अर्थ में महत्वपूर्ण है। अब असली परीक्षा स्टीमेट से आगे है,हालांकि इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अभी बाकी है।
स्टीमेट तैयार करने के निर्देश मिल चुके हैं। अब देखना यह होगा कि यह निर्देश कितनी तेजी से आगे बढ़ता है और कब ग्रामीणों को वास्तव में पक्की सड़क मिलती है। क्योंकि प्रशासनिक संवेदनशीलता का पहला चरण समस्या को महसूस करना है, लेकिन अंतिम कसौटी समाधान को जमीन पर उतारना है। बोंदा तिराहा से बसहरा मार्ग पर कलेक्टर की मोटरसाइकिल ने एक तस्वीर जरूर बनाई है, लेकिन उस तस्वीर की स्थायी याद तभी बनेगी, जब आने वाली बरसात में ग्रामीणों को उसी रास्ते पर कीचड़ से नहीं, एक पक्की सड़क से गुजरने का मौका मिले।

फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी बात यही है
ग्रामीण सड़क की शिकायत लेकर पहुंचे थे।
कलेक्टर उनके साथ सड़क पर चल पड़े। और शायद प्रशासन और जनता के बीच भरोसे की शुरुआत भी यहीं से होती है जब अधिकारी समस्या सुनने के बाद यह न कहे कि देखेंगे, बल्कि कहे—चलिए, चलकर देखते हैं।

 

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