आखिर जिला अस्पताल है या मछली बाजार ?
शौचालय के फ्लश बॉक्स में मिला नवजात का शव, सुरक्षा व्यवस्था से लेकर सीसीटीवी निगरानी तक पर गंभीर सवाल
मुख्य द्वार पर सुरक्षा कर्मी, परिसर में कैमरे फिर भी अस्पताल के भीतर नवजात का शव पहुंचने की परिस्थितियां रहस्य के घेरे में; निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की उठी मांग
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही।
जिले के सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थान जिला अस्पताल में यदि शौचालय के फ्लश बॉक्स में प्लेसेंटा और गर्भनाल सहित नवजात शिशु का शव मिलता है, तो यह केवल एक हृदयविदारक घटना नहीं, बल्कि अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी प्रणाली और प्रबंधन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला है। आखिर अस्पताल परिसर में ऐसा कैसे हुआ? मुख्य द्वार पर सुरक्षा कर्मियों की तैनाती और सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी के बावजूद नवजात का शव शौचालय तक पहुंचने की परिस्थितियां क्या हैं? क्या अस्पताल प्रबंधन इन सवालों का संतोषजनक जवाब दे पाएगा?
घटना को लेकर सामने आ रही परिस्थितियां कई ऐसे सवाल खड़े करती हैं, जिनका जवाब निष्पक्ष और पारदर्शी जांच से ही मिल सकता है।
मुख्य द्वार पर सुरक्षा, फिर अस्पताल के भीतर यह सब कैसे?
जिला अस्पताल के मुख्य प्रवेश द्वार पर सुरक्षा कर्मियों की तैनाती रहती है। अस्पताल परिसर में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने नवजात के शव को शौचालय के फ्लश बॉक्स में डाला, तो वह अस्पताल में कब दाखिल हुआ, किस रास्ते से पहुंचा और घटना के बाद किस रास्ते से बाहर निकला?
क्या प्रवेश और निकास द्वारों के सीसीटीवी फुटेज की जांच की गई है? क्या सुरक्षा कर्मियों से पूछताछ हुई है? घटना के समय ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों की उपस्थिति और गतिविधियों का सत्यापन किया गया है?
यदि अस्पताल प्रबंधन का प्रारंभिक अनुमान है कि कोई बाहरी व्यक्ति इस घटना को अंजाम देकर चला गया, तो इस अनुमान की पुष्टि करने वाले साक्ष्य भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए। केवल आशंका के आधार पर जिम्मेदारी से बचना उचित नहीं होगा।
सीसीटीवी कैमरे की दिशा पर सवाल, क्या जांच में होगा खुलासा?
इस मामले में सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। यदि संबंधित शौचालय के सामने कैमरा लगा है, लेकिन उसकी दिशा दरवाजे की बजाय विपरीत ओर है, तो यह पता लगाना आवश्यक है कि कैमरा पहले से उसी दिशा में लगा था या उसकी दिशा में कभी बदलाव किया गया था।
क्या कैमरे की स्थिति ऐसी थी कि शौचालय में आने-जाने वाले व्यक्तियों की पहचान संभव नहीं थी? क्या घटना के समय कैमरा सही ढंग से काम कर रहा था? क्या सभी संबंधित कैमरों की रिकॉर्डिंग सुरक्षित है? क्या फुटेज में किसी प्रकार की तकनीकी कमी, रिकॉर्डिंग का अंतराल अथवा छेड़छाड़ के संकेत मिले हैं?
इन प्रश्नों का उत्तर तकनीकी जांच से सामने आना चाहिए। कैमरे की दिशा को लेकर संदेह होना अपने आप में छेड़छाड़ का प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि निगरानी व्यवस्था में कोई गंभीर खामी पाई जाती है, तो उसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
अस्पताल के भीतर की घटना, हर पहलू की जांच जरूरी
यदि सीसीटीवी फुटेज में किसी संदिग्ध बाहरी व्यक्ति की गतिविधि सामने नहीं आती, तो जांच को केवल इसी आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। अस्पताल के भीतर कार्यरत कर्मचारियों, सुरक्षा कर्मियों और घटना के समय परिसर में मौजूद अन्य व्यक्तियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
हालांकि, फुटेज में किसी संदिग्ध का दिखाई न देना इस बात का प्रमाण नहीं है कि घटना अस्पताल के अंदर ही किसी व्यक्ति ने अंजाम दी। कैमरों की कवरेज, उनकी कार्यक्षमता और उपलब्ध रिकॉर्डिंग की अवधि सहित सभी तथ्यों का परीक्षण आवश्यक है।
जांच एजेंसी को यह भी पता लगाना चाहिए कि नवजात का जन्म कहां हुआ, प्रसव से संबंधित कोई चिकित्सकीय रिकॉर्ड उपलब्ध है या नहीं, उस अवधि में अस्पताल में कितने प्रसव हुए और किन परिस्थितियों में नवजात की मृत्यु हुई। अस्पताल में भर्ती गर्भवती महिलाओं, प्रसव संबंधी रिकॉर्ड और ड्यूटी रजिस्टर का परीक्षण भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
जिंदा नवजात को फेंका गया या मृत शिशु का शव छिपाया गया?
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील प्रश्न यह है कि नवजात की मृत्यु कब और किन परिस्थितियों में हुई? क्या शिशु मृत पैदा हुआ था, जन्म के बाद उसकी मृत्यु हुई या उसे जीवित अवस्था में शौचालय के फ्लश बॉक्स में डाला गया?
इनमें से किसी भी संभावना को बिना चिकित्सकीय साक्ष्य के सही नहीं माना जा सकता। नवजात के शव का पोस्टमार्टम, उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेखों का परीक्षण और आवश्यक फॉरेंसिक जांच ही इन सवालों का जवाब दे सकती है।
यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी ने नवजात को जीवित अवस्था में जानबूझकर फ्लश बॉक्स में डाला, तो मामला अत्यंत गंभीर आपराधिक कृत्य का हो सकता है। वहीं, यदि जन्म के बाद मृत्यु हुई और शव को छिपाने या ठिकाने लगाने का प्रयास किया गया, तो उन परिस्थितियों की भी कानून के अनुरूप जांच होनी चाहिए।
डीएनए जांच की मांग, लेकिन वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच अधिकारी को नवजात के शव से वैज्ञानिक साक्ष्य सुरक्षित कराने चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार जैविक नमूनों का परीक्षण, डीएनए प्रोफाइलिंग और संभावित मातृत्व-पितृत्व की पहचान के लिए आवश्यक वैज्ञानिक जांच कराई जा सकती है।
यदि जांच में किसी व्यक्ति से संबंधित ठोस आधार सामने आते हैं, तो कानून के अनुरूप उसके नमूनों का मिलान कराया जा सकता है। अस्पताल के कर्मचारियों सहित किसी भी व्यक्ति का डीएनए परीक्षण केवल पद या संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि जांच की आवश्यकता, लागू कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी के निर्देशों के अनुरूप किया जाना चाहिए।
साथ ही, अस्पताल के प्रसव रजिस्टर, मरीजों के भर्ती रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, सुरक्षा रजिस्टर और सीसीटीवी फुटेज को तत्काल सुरक्षित रखना आवश्यक है, ताकि कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट न हो।
क्या अस्पताल प्रबंधन देगा इन सवालों के जवाब?
जिला अस्पताल में इस तरह की घटना सामने आने के बाद प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल घटना की जानकारी देने तक सीमित नहीं रह जाती। उसे सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी प्रणाली और घटना से संबंधित रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
जनता यह जानना चाहती है कि घटना की जानकारी सबसे पहले किसे और कब मिली? शव मिलने के बाद पुलिस को सूचना देने में कितना समय लगा? सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित कर लिए गए हैं या नहीं? संबंधित शौचालय और घटनास्थल को साक्ष्य जुटाने तक सुरक्षित रखा गया या नहीं? अस्पताल प्रबंधन ने अपने स्तर पर क्या कार्रवाई की है?
इन सवालों के जवाब देना इसलिए जरूरी है, क्योंकि जिला अस्पताल केवल एक सरकारी भवन नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की उम्मीद है जो उपचार और सुरक्षित प्रसव के लिए इस संस्थान पर भरोसा करते हैं।
दोषी कोई भी हो, कार्रवाई होनी चाहिए
इस मामले में किसी व्यक्ति या कर्मचारी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन निष्पक्ष जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को समन्वय बनाकर घटना की समयबद्ध जांच करनी चाहिए। सीसीटीवी फुटेज की तकनीकी जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रसव संबंधी अभिलेखों का परीक्षण और आवश्यक फॉरेंसिक जांच के आधार पर वास्तविक परिस्थितियों का खुलासा किया जाना चाहिए।
यदि अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की आपराधिक भूमिका प्रमाणित होती है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
सवाल तीखे हैं, क्योंकि मामला एक नवजात की जिंदगी और मौत से जुड़ा है। जवाबदेही तय होनी चाहिए, क्योंकि मामला जिला अस्पताल की विश्वसनीयता से जुड़ा है। और जांच निष्पक्ष होनी चाहिए, क्योंकि सच सामने आना किसी एक व्यक्ति के नहीं, बल्कि पूरे समाज के हित में है।प्रकाशन से पहले ध्यान दें: घटना की तारीख, शव मिलने का सटीक स्थान, पुलिस को सूचना और अब तक हुई कार्रवाई की पुष्टि कर लें। अस्पताल प्रबंधन तथा पुलिस का आधिकारिक पक्ष भी शामिल करें। इससे समाचार की विश्वसनीयता और कानूनी मजबूती बढ़ेगी।