चीनी कंपनियों की मनमानी से भारतीय उद्योग बेहाल: जूमलायन इंडिया (Zoomlion India) पर फिर लगे धोखाधड़ी के गंभीर आरोप
भोपाल : भारत में कारोबार कर रही चीनी कंपनियों की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। देश के प्रतिष्ठित ‘डालमिया ग्रुप ऑफ कंपनीज’ (Dalmia Group of Companies) और क्रेन व हैवी इक्विपमेंट क्षेत्र में कार्यरत चीनी मूल की कंपनी ‘जूमलायन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ (Zoomlion India Private Limited) के बीच बढ़ा व्यावसायिक विवाद अब कानूनी चौखट तक पहुंच चुका है। परचेज ऑर्डर (Purchase Order) स्वीकार करने के बाद ऐन वक्त पर मशीनों की आपूर्ति से मुकरने और झूठे वादे करने के कारण डालमिया ग्रुप को करोड़ों रुपये की भारी आर्थिक क्षति झेलनी पड़ी है। इस गंभीर लापरवाही और व्यावसायिक धोखाधड़ी को लेकर डालमिया ग्रुप अब जूमलायन इंडिया के खिलाफ पुलिस में शिकायत और एफआईआर (FIR) दर्ज कराने की तैयारी में है।
लगातार दूसरे साल धोखा: डालमिया ग्रुप को 5 करोड़ तक के नुकसान का आकलन
डालमिया ग्रुप द्वारा दिए गए बयानों के अनुसार, यह पहला मौका नहीं है जब जूमलायन इंडिया ने अपने व्यावसायिक वादों को तोड़ा है। इससे पूर्व वर्ष 2025 में भी जूमलायन इंडिया ने ग्रुप से कई करोड़ रुपये की क्रेन सप्लाई के ऑर्डर हासिल किए थे। उस समय भी परचेज ऑर्डर स्वीकार करने के बाद कंपनी ने मशीनों की उपलब्धता को लेकर अपना रुख बदल लिया था, जिससे डालमिया ग्रुप को व्यावसायिक नुकसान उठाना पड़ा था।
इसके बावजूद, व्यावसायिक संबंधों का सम्मान करते हुए 2026 में डालमिया ग्रुप ने एक बार फिर लगभग ₹10 से ₹12 करोड़ मूल्य के टायर-माउंटेड और चेन-माउंटेड क्रेन के ऑर्डर जूमलायन इंडिया को दिए। जूमलायन ने आधिकारिक रूप से इन परचेज ऑर्डर्स को स्वीकार भी किया, लेकिन जब निर्धारित समय सीमा में मशीनों की डिलीवरी की बात आई, तो कंपनी अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हट गई। समय पर क्रेन की आपूर्ति न होने के कारण डालमिया ग्रुप के कई प्रोजेक्ट अटक गए हैं, जिससे कंपनी को लगभग ₹4 से ₹5 करोड़ रुपये का सीधा आर्थिक और संभावित नुकसान झेलना पड़ा है।
डालमिया ग्रुप के डायरेक्टर का कहना है कि किसी प्रतिष्ठित व्यावसायिक समूह से करोड़ों रुपये के ऑर्डर स्वीकार करने के बाद आपूर्ति न करना केवल एक सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी व्यावसायिक अनियमितता है। इससे न केवल कंपनी का वित्तीय बजट बिगड़ा है, बल्कि उसके ग्राहकों के प्रति कमिटमेंट्स और बाजार में दशकों से बनी साख (Credibility) पर भी गहरा आघात पहुंचा है। आपसी बातचीत से जब कोई रास्ता नहीं निकला, तब जाकर समूह ने कानूनी और वैधानिक कार्रवाई का रुख अपनाया है। कंपनी अब संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर रही है, जिसमें धारा 420 (धोखाधड़ी) समेत अन्य आपराधिक धाराओं के तहत जांच की मांग की जाएगी।
पुरानी मशीनों को ‘नया’ बताकर बेचना: जूमलायन का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड
जूमलायन इंडिया पर लग रहे ये आरोप कोई अचानक उठी घटना नहीं हैं, बल्कि यह इस चीनी कंपनी के संदिग्ध और गैर-जिम्मेदाराना ढर्रे का हिस्सा प्रतीत होते हैं। इससे पूर्व, वर्ष 2025 में मुंबई की एक प्रतिष्ठित कंपनी ने जूमलायन इंडिया पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। उस मामले में आरोप था कि जूमलायन इंडिया ने पुरानी और इस्तेमाल की जा चुकी पाइलिंग मशीनों को नया बताकर रिपैक करके बेच दिया था।
यह मामला इस कदर गंभीर था कि आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने इसकी विस्तृत जांच की और जूमलायन इंडिया के खिलाफ अदालत में चार्जशीट (Chargesheet) दाखिल की। फिलहाल यह मामला न्यायपालिका के समक्ष विचाराधीन है। एक के बाद एक सामने आ रहे इन मामलों से यह स्पष्ट होता है कि चीनी कंपनियां भारतीय बाजार में बिना किसी कानूनी या नैतिक भय के धोखाधड़ी का जाल बिछा रही हैं।
क्या भारतीय अर्थव्यवस्था और स्वदेशी उद्योगों को कमजोर करने की साजिश है?
जूमलायन इंडिया जैसे मामले यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या भारत में कार्यरत चीनी कंपनियां केवल व्यावसायिक लाभ कमाने नहीं, बल्कि भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वदेशी कंपनियों को पंगु बनाने की मंशा से काम कर रही हैं। जिस तरह से लगातार भारतीय कंपनियों को करोड़ों के ऑर्डर लेकर समय पर सप्लाई न देना, धोखाधड़ी करना और गुणवत्ताहीन मशीनें बेचना जारी है, उससे स्थानीय उद्योगों की रीढ़ टूट रही है।
गौरतलब है कि बीते दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों और विभिन्न आंदोलनों में भी चीनी फंडिंग और भारत की आंतरिक स्थिरता व सत्ता को अस्थिर करने की साजिशों की चर्चाएं सोशल मीडिया और गलियारों में जोरों पर रही थीं। भारत की प्रगति में रोड़ा अटकाने और भारतीय उद्योगों को आर्थिक रूप से पस्त करने के लिए चीनी तंत्र द्वारा कई तरह के हथकंडे अपनाने के आरोप अक्सर लगते रहे हैं।
ऐसे माहौल में यह संदेह गहराता जा रहा है कि क्या जूमलायन इंडिया जैसी चीनी कंपनियां भी इसी व्यापक भारत-विरोधी या उद्योग-विरोधी एजेंडे के तहत काम कर रही हैं? दो मामले तो कागजों पर सामने आ चुके हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि अपने रसूख, प्रभाव और कानूनी दांव-पेचों के दम पर ऐसी चीनी कंपनियों ने और कितने भारतीय कारोबारियों की आवाज को दबा दिया होगा? डालमिया ग्रुप का यह कठोर कानूनी कदम केवल एक कंपनी की लड़ाई नहीं है, बल्कि भारतीय बाजार में चीनी कंपनियों की इस मनमानी और संदिग्ध गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए एक निष्पक्ष और सख्त जांच की मांग करता है।