एक ओर पीएम-जनमन आवास पूर्ण करने के निर्देश, दूसरी ओर राशि डकार गए सरपंच; दो साल बाद भी बैगा आदिवासियों का घर अधूरा! कागजी बैठकों में शत-प्रतिशत लक्ष्य का ढिंढोरा, मगर चुकतीपानी में धरातल पर सिर्फ धोखे के गड्ढे; कार्रवाई करने से डर रहा जनपद प्रशासन।
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जनपद पंचायत गौरेला में इन दिनों ‘प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना’ के कार्यों को समय-सीमा में पूर्ण करने और आंकड़ों की बाजीगरी दिखाने के लिए समीक्षा बैठकों का दौर जारी है। लेकिन इस प्रशासनिक दिखावे के समानांतर, ग्राम पंचायत चुकतीपानी में सरकारी तंत्र की नाक के नीचे एक शर्मनाक हकीकत दम तोड़ रही है।
यहाँ विशेष संरक्षित बैगा जनजाति के गरीब हितग्राहियों के हक पर डाका डालते हुए ₹40-40 हजार की प्रथम किस्त निकालकर डकार ली गई। नतीजा यह है कि योजना की स्वीकृति के दो साल बीत जाने के बाद भी आज तक इन आदिवासियों का आशियाना नहीं बन पाया है।
सरपंच पति का दबदबा, सुध लेने नहीं आते अधिकारी: > इस महाघोटाले के तार सीधे रसूख और व्यवस्था के रंजिशपूर्ण रवैये से जुड़े हैं। 2 वर्ष पूर्व जब इस आवास राशि का आहरण हुआ, तब सचेंद्र सिंह यहाँ के सरपंच थे। वर्तमान में भले ही सरपंची का चेहरा बदला हो, लेकिन आज भी पंचायत में सचेंद्र सिंह का ही दबदबा बरकरार है और सारे निर्माण व ठेकेदारी का काम वही संभालते हैं। बेबस बैगा हितग्राहियों का साफ तौर पर कहना है कि इतने बड़े धोखे के बाद भी आज तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी उनकी सुध-बुध लेने धरातल पर नहीं आया है।
खोखला साबित होगा लक्ष्य: आज की बैठक में जनपद पंचायत सीईओ ने कार्यों को पूर्ण करने का जो भी लक्ष्य रखा है, वह तब तक पूरी तरह खोखला और बेमानी माना जाएगा, जब तक कि इन बैगा आदिवासियों का पिछले 2 वर्षों से अधूरा पड़ा आवास कार्य धरातल पर पूरा नहीं हो जाता। केवल कागजी आंकड़ों को दुरुस्त कर देने से आदिवासियों को छत नहीं मिल जाएगी।
इस महाघोटाले का खुलासा होने पर सरपंच पति ने सार्वजनिक रूप से हितग्राहियों को पैसा वापस करने की बात तो स्वीकार की, लेकिन आज पर्यंत तक पीड़ितों को फूटी कौड़ी नसीब नहीं हुई। सबसे बड़ा सवाल जनपद पंचायत गौरेला के आला अधिकारियों पर उठता है, जो सब कुछ जानते हुए भी इस रसूखदार नामजद चेहरे पर कानूनी कार्रवाई करने और शासकीय राशि की रिकवरी करने से पूरी तरह भयभीत और मौन नजर आ रहे हैं।