जागो रेल प्रशासन, जागो! चार महीने से अंधेरे में डूबा गौरेला का रेलवे अंडरपास, क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है रेल प्रशासन?
मोबाइल की टॉर्च और गाड़ियों की रोशनी के सहारे जान जोखिम में डालकर गुजर रहे लोग, शिकायतों के बावजूद मरम्मत का इंतजार!
गौरेला। आम जनता की सुरक्षा से रेल प्रशासन को आखिर कितना सरोकार है? क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही जिम्मेदार अधिकारियों की नींद खुलेगी? पुराने गौरेला से मुक्तिधाम और अमरकंटक जाने वाले मार्ग पर स्थित रेलवे अंडरपास पिछले चार महीने से अंधेरे में डूबा हुआ है। अंडरपास की स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हैं, लेकिन उन्हें दुरुस्त कराने की दिशा में रेल प्रशासन की कथित उदासीनता लोगों की परेशानी बढ़ा रही है।
रेलवे फाटक बंद किया, अंडरपास बनाया, लेकिन सुविधाएं देना भूला प्रशासन!
रेल लाइन विस्तार के बाद पुराने गौरेला से मुक्तिधाम और अमरकंटक की ओर जाने वाले मार्ग पर रेलवे फाटक बंद कर अंडरपास का निर्माण कराया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार, निर्माण के बाद से ही यह अंडरपास अव्यवस्थाओं को लेकर चर्चा में रहा है। बारिश के दिनों में यहां पानी भरने की समस्या सामने आती है, वहीं अब पिछले चार महीने से बंद पड़ी लाइटों ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
सवाल यह है कि जब रेलवे ने फाटक बंद कर लोगों के आवागमन के लिए अंडरपास बनाया, तो क्या उसकी नियमित देखरेख और रोशनी की व्यवस्था सुनिश्चित करना रेल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है? यदि लाइटें खराब हैं, तो चार महीने से उनकी मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? आखिर जिम्मेदार अधिकारी किसका इंतजार कर रहे हैं?
घुप्प अंधेरे में सफर, हर पल हादसे का खतरा!
इस अंडरपास से प्रतिदिन सैकड़ों लोगों का आवागमन होता है। कामकाजी लोग देर शाम अपने घर लौटते हैं। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे भी इसी रास्ते से गुजरते हैं। लेकिन अंडरपास के भीतर रोशनी की व्यवस्था नहीं होने के कारण लोगों को मोबाइल की टॉर्च और मोटरसाइकिल की हेडलाइट के सहारे रास्ता पार करना पड़ रहा है।
अंधेरे में सामने से आने वाले वाहन, सड़क की स्थिति और रास्ते में मौजूद संभावित बाधाओं को देख पाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में दुर्घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि कोई अप्रिय घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या तब रेल प्रशासन जागेगा?
सुनसान इलाका, शाम होते ही बढ़ती परेशानी
अंडरपास गौरेला की बस्ती से दूर सुनसान क्षेत्र में स्थित है। शाम होते ही आसपास की अधिकांश दुकानें बंद हो जाती हैं और लोगों की आवाजाही भी कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में अंधेरे से गुजरना विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और अकेले आने-जाने वाले लोगों के लिए परेशानी और असुरक्षा का कारण बन सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस रास्ते से प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग गुजरते हैं, वहां बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था का अभाव समझ से परे है। रेलवे को यात्रियों और आम नागरिकों की सुविधा के साथ उनकी सुरक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए।
दो दिन का अल्टीमेटम, नहीं सुधरी व्यवस्था तो आंदोलन!
स्थानीय लोगों ने रेल प्रशासन से मांग की है कि रेलवे अंडरपास की बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों को अगले दो दिनों के भीतर दुरुस्त कराया जाए अथवा नई लाइटें लगाकर पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय में समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो वे आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
सीधा सवाल: हादसे के बाद ही खुलेगी रेल प्रशासन की आंख?
चार महीने से अंधेरे में डूबा अंडरपास रेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आम जनता को सुरक्षित रास्ता देना किसी अधिकारी की मेहरबानी नहीं, बल्कि बुनियादी नागरिक सुविधा का सवाल है।
रेल प्रशासन को चेतावनी है—जनता की परेशानी को नजरअंदाज करना बंद कीजिए। अंडरपास की लाइटें तत्काल दुरुस्त कराइए, ताकि किसी संभावित दुर्घटना से पहले जरूरी कदम उठाए जा सकें।
जागो रेल प्रशासन, जागो! जनता को अंधेरे में छोड़कर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मत मोड़ो।