सावधान! जानलेवा है शहर में बिकने वाला मीट @ एंटीमार्टम के बगैर शहर में खप रहा मीट
बीमारी को आमंत्रण देने में लगा जिला प्रशासन
आशीष कचेर शहडोल। संभाग मुख्यालय में कार्यरत खाद्य एवं औषधि विभाग कार्रवाइयों का टोटका कर मजे से कमीशन बटेार
रहा है जबकि शहर के गली कूचों में अमानक व मिलावटी खाद्य सामग्रियां बिक रहीं हैं। विभाग अपनी खाल बचाने
और शासन को जवाब देने के हिसाब से जांच पड़ताल का अपना टारगेट पूरा करता रहता है। बाकी सारा खेल चलता
रहता है। नियमानुसार जानवरों को काटकर बेचने से पहले उनका एंटीमार्टम होना बहुत जरूरी है। जबकि शहर में
मांस-मटन बेचने वाली सैकड़ों दुकानें संचालित हो रही हैं। शहर में मांस-मटन और मछली की दुकानों की संख्या
दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इन दुकानों से हर दिन हजारों किलो मीट बिक रहा है, लेकिन यह सही है या नहीं इसकी
जांच करने वाले कोई नहीं है।
खतरनाक है मीट
शहर में बिकने वाला मांस दुकानदार खुद जानवर खरीदकर उनका मीट निकाल रहे हैं ताकि बेहतर दाम मिल सके।
लेकिन आश्चर्यजनक की बात यह है कि जानवरों के एंटीमार्टम को लेकर प्रशासन मौन है, शहर में हर दिन हजारों
किलो मीट बिना जांच का ही बिक रहा है और लोग इसे खाकर गंभीर बीमारी के शिकार हो रहे हैं। शहर में मांस-मटन
की दुकानों की संख्या सैकड़ा से अधिक है। लेकिन शहर में कितनी दुकानें ही रजिस्टर्ड हैं जिन्हें लाइसेंस जारी किया
यह तो, विभाग ही जाने, लेकिन इन दुकानों से बिकने वाला मीट ज्यादा खतरनाक हो सकता है और इससे पेट में कीड़े,
डायरिया, टीबी, कोलाईटिस, पीलिया सहित अन्य बीमारी हो सकती है।
जानवरों का एंटीमार्टम जरूरी
जानकारी के अनुसार बकरा या अन्य जानवर काटने से पहले उनका एंटीमार्टम कराना जरूरी है। ताकि कोई बीमार
जानवर काटकर उसका मीट बाजार में न बेचा जाए। ऐसा मीट खाने से लोग फूड पायजनिंग सहित अन्य गंभीर
बीमारियों के शिकार हो सकते हैं, लेकिन संभागीय मुख्यालय में बैठे जिम्मेदारों के नाक के नीचे बगैर जांच पड़ताल
जानवर कटकर बाजार में बिक रहे हैं, लेकिन न तो खाद्य एवं औषधि विभाग और न ही पशु चिकित्सा विभाग इस
ओर कोई सुध ले रहा है।
खुले में बिक रहा होटलों में पका मांस
विभाग संचालित है और अमला भी जिंदा है वेतन ले रहा है, लेकिन संभाग मुख्यालय में कस्बों की तरह ठेलों और
होटलों में पके मांस की भी बिक्री धड़ल्ले से हो रही है, जहां खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है।
नालियों के ऊपर खुले में रखकर पका मांस बेचा जा रहा है, जिसमें मक्खियां अन्य पखियारी भिनकती रहतीं हैं, साथ
ही ठेलों के आस-पास आवारा श्वान मंडराते रहते हैं, इसके अलावा यहां से निकलने वाला गंदा पानी सडक़, नाली,
तालाबों में बहाया जा रहा है, गिलासों व प्लेटों की ढंग से सफाई नहंी कराई जाती है। ग्राहक एक तो पहले अमानक
है, वहीं लोगों को जूठन खानी पड़ती है। खाद्य एवं औषधि विभाग सहित अन्य विभागों को इससे कोई सरोकार नहीं
है।
…तो प्रशासन को दुर्घटना का इंतजार
जानवरों को जूनोटिक डिसीज (जानवरों में होने वाली बीमारी) होती है। ये सभी बीमारियां उसका मीट खाने वाले
इंसान को हो सकती हैं। इसलिए जानवरों का एंटीमार्टम जरूरी है। जिला प्रशासन को चाहिए कि शहर में जब तक
शहर में स्लॉटर हाऊस नहीं बन जाता तब तक इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए, साथ ही जो दुकानदार
एंटीमार्टम के बगैर मांस बेच रहे हैं, उन पर रोक लगाई जाये, लेकिन वर्षाे से जिला प्रशासन स्लॉटर हाऊस के मामले में
चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं खाद्य एवं औषधि विभाग तो त्यौहारों के समय कोरम पूर्ति के लिए मिठाई दुकानों से नमूने
उठाता है, उसके बाद ग्राहक खरीदी करते हैं और मिठाईयां खा भी लेते हैं, लेकिन नमूने साहब के फाईलों में सिमट कर
रह जाते हैं।
इनका कहना है…
इस संबंध में जब औषधि प्रशासन विभाग के बी.के. सोनी से बात करने का प्रयास किया गया तो, उन्होंने फोन रिसीव
नहीं किया।
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पूरे मामले में जब कलेक्टर श्रीमती वंदना वैद्य से बात करने का प्रयास किया गया तो, उन्होंने फोन रिसीव नहीं
किया।