SECL की अधिग्रहित भूमि पर फर्जीवाड़े की परतें खुलीं, मुआवजा-नौकरी के बाद फिर बेची गई करोड़ों की जमीन
बुढ़ार में सरकारी भूमि पर संगठित कब्जे का आरोप, नामांतरण रद्द होने के बाद भी जारी अवैध निर्माणशहडोल। जिले के बुढ़ार तहसील अंतर्गत ग्राम बुढ़ार स्थित खसरा नंबर 992/2, रकबा 1.62 एकड़ भूमि को 24 फरवरी 1983 को साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड द्वारा कोयला उत्खनन प्रयोजन से विधिवत अधिग्रहित किया गया था। अधिग्रहण के समय तत्कालीन भू-स्वामी बद्री अहिर को नियमानुसार मुआवजा राशि का भुगतान किया गया था, साथ ही अधिग्रहण के लाभांश स्वरूप उनके परिवार के एक सदस्य को SECL में नौकरी भी दी गई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार, उक्त अधिग्रहण की जानकारी बद्री अहिर एवं उनके समस्त वारिसानों को विधिवत थी।
नियमानुसार अधिग्रहण के बाद संबंधित भूमि का नाम राजस्व रिकॉर्ड में SECL के नाम दर्ज किया जाना था, किंतु राजस्व अमले की कथित लापरवाही के चलते वर्षों तक खसरे में पूर्व भू-स्वामी का ही नाम दर्ज रहा। इसी प्रशासनिक चूक को आधार बनाकर बाद के वर्षों में इस भूमि को निजी भूमि दर्शाने की कोशिश की गई।
शिकायत पत्रों में उल्लेख है कि बद्री अहिर की मृत्यु के बाद उनके वारिसानों के नाम पर भूमि का स्वत्व बताते हुए योगेंद्र शर्मा द्वारा जानबूझकर फर्जी तरीके से पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार कराई गई, जबकि यह स्पष्ट जानकारी थी कि उक्त भूमि SECL द्वारा पहले ही अधिग्रहित की जा चुकी है और अब वह किसी भी प्रकार से निजी स्वामित्व की भूमि नहीं रही। इसके बावजूद वास्तविक तथ्यों को छिपाकर कलेक्टर न्यायालय से भूमि विक्रय की अनुमति प्राप्त की गई।

अनुमति प्राप्त होने के पश्चात योगेंद्र शर्मा ने स्वयं को ही विक्रेता और स्वयं को ही क्रेता दर्शाते हुए रजिस्टर्ड विक्रय पत्र निष्पादित कराया। शिकायत में यह भी आरोप है कि इस विक्रय पत्र में दर्शाए गए गवाहों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है और पूरे प्रकरण में कूटरचित दस्तावेजों का प्रयोग किया गया।
मामले का एक और गंभीर पहलू यह है कि उक्त भूमि से संबंधित राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 के निर्माण के दौरान भी मुआवजा प्राप्त किया गया। शिकायतकर्ता के अनुसार, जिस भूमि के बदले पहले SECL से मुआवजा और नौकरी ली गई थी, उसी भूमि के लिए बाद में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के अंतर्गत 14 लाख 56 हजार 500 रुपये का अतिरिक्त मुआवजा भी हासिल किया गया। इस प्रकार एक ही भूमि पर दोहरे लाभ लेकर अंततः उसे करोड़ों रुपये में बेचने की तैयारी की गई।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि नामांतरण रद्द होने के बावजूद वर्तमान में इस करोड़ों की भूमि पर नगर परिषद बुढ़ार क्षेत्र में बिना किसी वैधानिक अनुमति के निर्माण कार्य कराया जा रहा है। न तो निर्माण की अनुमति ली गई और न ही संबंधित विभागों को विधिवत सूचना दी गई। आरोप है कि पटवारी एवं राजस्व निरीक्षक स्तर पर भी वास्तविक स्थिति को छिपाकर या भ्रमित कर कार्रवाई से बचने का प्रयास किया गया।
सोमवार को शिकायतकर्ता द्वारा एक बार फिर तहसील, जिला प्रशासन एवं SECL के सोहागपुर एरिया प्रबंधन को सूचना दी गई, जिसके बाद शाम लगभग 4 बजे SECL के अधिकारी तथा तहसील से राजस्व कर्मचारी मौके पर पहुंचे। निरीक्षण के दौरान निर्माण कार्य को अस्थायी रूप से रुकवाया गया, लेकिन अधिकारियों के वहां से लौटते ही कुछ ही समय बाद निर्माण कार्य दोबारा शुरू कर दिया गया।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यह पूरा प्रकरण केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि सरकारी भूमि को सुनियोजित तरीके से हड़पने का गंभीर प्रयास है। उन्होंने मांग की है कि विक्रेता, कर्ता और इस पूरे प्रकरण में शामिल अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार करने तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धाराओं में प्रकरण दर्ज कर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि करोड़ों की सरकारी भूमि को बचाया जा सके।