60 वर्षों की समर्पित सेवा का स्वर्ण अध्याय: डॉ. के.एन. मित्तल ने आदिवासी अंचल में जलाया स्वास्थ्य जागरूकता का दीप

0
शहडोल। जहां सुविधाओं का अभाव हो, जहां बीमारियां अंधविश्वास और अनजानेपन के बीच पनपती हों, जहां इलाज से पहले झाड़-फूंक का सहारा लिया जाता हो,ऐसे कठिन और चुनौतीपूर्ण आदिवासी अंचल में यदि कोई चिकित्सक छह दशक तक निरंतर सेवा करता रहे, तो वह केवल डॉक्टर नहीं, बल्कि समाज का पथप्रदर्शक बन जाता है। शहडोल संभाग के वरिष्ठ चिकित्सक एवं क्षय रोग (टी.बी.) विशेषज्ञ डॉ. के.एन. मित्तल का जीवन इसी समर्पण, संवेदना और सेवा की अद्भुत मिसाल है।
भोपाल निवासी डॉ. मित्तल ने वर्ष 1965 में गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त कर शासकीय सेवा में प्रवेश किया।28 फरवरी 1966 को उन्होंने जिला चिकित्सालय शहडोल में अपनी सेवाएं प्रारंभ कीं। उस समय अस्पताल में डॉक्टरों की संख्या अत्यंत सीमित थी। सिविल सर्जन और जिला स्वास्थ्य अधिकारी को छोड़कर मात्र तीन चिकित्सकों के भरोसे 24 घंटे अस्पताल की समस्त व्यवस्थाएं संचालित होती थीं। ओपीडी से लेकर भर्ती मरीजों की देखरेख, ऑपरेशन थिएटर में सहयोग, पोस्टमार्टम, रात में गंभीर रोगियों का उपचार हर जिम्मेदारी डॉ. मित्तल ने पूरी निष्ठा और साहस के साथ निभाई।
लगातार पांच वर्षों तक सभी विभागों में कार्य करते हुए उन्होंने अनुभव और दक्षता अर्जित की। बाद में शासकीय सेवा में रहते हुए उन्हें उच्च अध्ययन हेतु इंदौर मेडिकल कॉलेज भेजा गया। वर्ष 1972 में पीजी उपाधि प्राप्त करने के बाद उनकी पदस्थापना जिला क्षय अधिकारी के रूप में हुई। वर्ष 1973 में उन्हें विशेष प्रशिक्षण के लिए बेंगलुरु भेजा गया, जहां उन्होंने टी.बी. उन्मूलन के प्रभावी उपायों का गहन अध्ययन किया।
डॉ. मित्तल ने न केवल अस्पताल में बल्कि सुदूर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में जाकर लोगों को टी.बी. के प्रति जागरूक किया। उन्होंने पाया कि अधिकांश गरीब और आदिवासी परिवार टी.बी. के लक्षणों से अनजान हैं। बीमारी बढ़ने तक वे झाड़-फूंक या स्थानीय झोला-छाप डॉक्टरों से इंजेक्शन लगवाते रहते थे। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते अक्सर काफी देर हो जाती थी। ऐसे हालात में डॉ. मित्तल ने घर-घर पहुंचकर संवाद स्थापित किया, लोगों को समझाया कि टी.बी. लाइलाज नहीं है, बल्कि नियमित छह माह तक दवाओं के सेवन से पूर्णतः ठीक हो सकती है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति का जीवन स्तर नहीं सुधरेगा, तब तक रोगों का उन्मूलन केवल कागजों तक सीमित रहेगा। अपने सेवा काल में उन्होंने सैकड़ों गांवों का दौरा किया और वहां की वास्तविक परिस्थितियों को नजदीक से देखा। उनकी कार्यशैली केवल इलाज तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक जागरूकता, विश्वास निर्माण और स्वास्थ्य शिक्षा पर आधारित थी।
वर्ष 1985 में, सेवा के 19 वर्षों बाद, उन्हें पदोन्नति देकर अधीक्षक टी.बी. अस्पताल नौगांव जिला-छतरपुर भेजने का प्रस्ताव मिला। परंतु डॉ. मित्तल ने इस पदोन्नति को अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि वरिष्ठ पद पर बैठकर फाइलों तक सीमित हो जाना, उन गरीब और जरूरतमंद लोगों से दूर होना होगा जिनके बीच उन्होंने वर्षों से सेवा का संबंध बनाया है। उन्होंने शहडोल को ही अपनी कर्मभूमि मानते हुए जीवन पर्यंत यहीं सेवा करने का संकल्प लिया।
वर्ष 1997 में शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका सेवा भाव कम नहीं हुआ। आज भी वे उतनी ही ऊर्जा और प्रतिबद्धता के साथ समाज को मार्गदर्शन दे रहे हैं। 60 वर्षों की इस अविरत यात्रा में उन्हें जो आशीर्वाद और सम्मान मिला, वह किसी भी पुरस्कार से बढ़कर है।
डॉ. के.एन. मित्तल का जीवन हमें यह संदेश देता है कि सच्ची सेवा पद, प्रतिष्ठा या सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। कठिन परिस्थितियों में भी यदि संकल्प अटूट हो, तो एक व्यक्ति पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है। शहडोल अंचल में स्वास्थ्य जागरूकता का जो दीप उन्होंने जलाया, वह आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed