कचरे से रसोई गैस: IIT ग्रेजुएट के ‘वायु’ बायोडाइजेस्टर ने पेश की मिसाल, 7 साल से नहीं खरीदा LPG गैस सिलेंडर

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(मोहम्मद आरिफ, डिजिटल टेक रिपोर्टर)

 

दिनांक: 20 मार्च 2026

 

बढ़ती महंगाई और पर्यावरण संकट के बीच, IIT के पूर्व छात्र प्रियदान ने कचरा प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा का एक बेहतरीन और स्थायी समाधान पेश किया है। उन्होंने ‘वायु’ (Vayu) नामक एक ऐसा बायोडाइजेस्टर विकसित किया है, जो घरों से निकलने वाले गीले कचरे को सीधे रसोई गैस (बायोगैस) में बदल देता है। इस तकनीक की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रियदान ने पिछले 7 वर्षों से अपने घर के लिए एक भी एलपीजी (LPG) सिलेंडर नहीं खरीदा है।

 

‘वायु’ बायोडाइजेस्टर का नवाचार: प्रियदान द्वारा बनाया गया यह सिस्टम पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया पर आधारित है। यह रोजमर्रा के वेस्ट फूड और गीले कचरे को ईंधन में तब्दील कर देता है।

 

कचरे से 800 लीटर गैस का निर्माण: प्रियदान अपने घर के साथ-साथ पड़ोसियों से मिलने वाले लगभग 11 किलो गीले कचरे का उपयोग करते हैं। इस कचरे से प्रतिदिन लगभग 800 लीटर खाना पकाने वाली गैस का निर्माण होता है, जो एलपीजी का एक सशक्त विकल्प बन चुकी है।

 

बेहद आसान कार्यप्रणाली: इस बायोडाइजेस्टर का इस्तेमाल बेहद आसान है। टैंक में रसोई का गीला कचरा डालना होता है, जिसे प्राकृतिक बैक्टीरिया तोड़कर मीथेन गैस में बदल देते हैं। यह गैस एक विशेष बैलून में स्टोर होती है और सीधे रसोई के चूल्हे से जुड़ जाती है।

 

व्यापक स्तर पर प्रभाव और विस्तार: यह तकनीक अब केवल एक घर तक सीमित नहीं है। प्रियदान अब कैंटीन, होटल और हाउसिंग सोसायटियों में भी यह सिस्टम लगा रहे हैं।

 

सालाना 2500 सिलेंडरों की बचत: वर्तमान में 350 से अधिक घर ‘वायु’ बायोडाइजेस्टर का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं। इस पहल से हर साल लगभग 2500 एलपीजी सिलेंडरों की बचत हो रही है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से एक बहुत बड़ा कदम है।

 

प्रियदान का ‘वायु’ बायोडाइजेस्टर आत्मनिर्भर भारत और ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। यह न केवल कचरे के निपटान (Waste Management) की समस्या को हल कर रहा है, बल्कि आम लोगों को मुफ्त और प्रदूषण रहित रसोई गैस भी उपलब्ध करा रहा है।

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