SECL बंगवार खदान हादसा: मौत के बाद ‘सबूत मिटाने’ का खेल? बी.के. जेना और संजय सिंह पर उठे गंभीर सवाल

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शहडोल  SECL सोहागपुर क्षेत्र की बंगवार खदान में मजदूर की मौत अब केवल हादसा नहीं रह गई है, बल्कि प्रबंधन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्य महाप्रबंधक बी.के. जेना और उप क्षेत्रीय प्रबंधक संजय सिंह पर सबूत छुपाने, जिम्मेदारी से बचने और पूरे मामले को ठेकेदार पर थोपने के आरोप लग रहे हैं।

 

शहडोल । जिले के SECL सोहागपुर एरिया अंतर्गत बंगवार भूमिगत खदान में हुई मजदूर की मौत ने अब एक बड़ा विवाद का रूप ले लिया है। जहां एक ओर यह मामला सुरक्षा में लापरवाही का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर घटना के बाद प्रबंधन की कार्यशैली ने इसे और गंभीर बना दिया है। पूरे घटनाक्रम में मुख्य महाप्रबंधक बी.के. जेना और गंगवार क्षेत्र के उप क्षेत्रीय प्रबंधक संजय सिंह की भूमिका पर सीधे सवाल खड़े हो रहे हैं।

घटना में ग्राम डोंगरा टोला निवासी 43 वर्षीय मोहे लाल सिंह की मौत हुई, जो मेंटेनेंस कार्य के दौरान बिजली के पोल से गिर गए थे। सवाल यह है कि आखिर बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों के उन्हें इतनी ऊंचाई पर काम करने के लिए क्यों भेजा गया? और उससे भी बड़ा सवाल—क्या यह एक सामान्य हादसा था या इसके पीछे व्यवस्थागत लापरवाही छिपी है?

सबसे चौंकाने वाला पहलू घटना के बाद सामने आया। प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, जिस सीढ़ी के सहारे मजदूर पोल पर चढ़ा था, उसे घटना के तुरंत बाद मौके से हटा दिया गया। यह वही सीढ़ी थी जो हादसे के महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में काम आ सकती थी। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सीढ़ी क्यों हटाई गई? क्या यह साक्ष्यों को छुपाने का प्रयास था?

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें और वीडियो भी इस बात की पुष्टि करते नजर आ रहे हैं कि घटनास्थल के साथ छेड़छाड़ की गई। आरोप है कि यह सब कुछ अधिकारियों के निर्देश पर हुआ। विशेष रूप से उप क्षेत्रीय प्रबंधक संजय सिंह और मुख्य महाप्रबंधक बी.के. जेना के नाम सामने आने से मामला और गंभीर हो गया है।

इसी के साथ एक और बड़ा विरोधाभास सामने आया है। SECL प्रबंधन ने धनपुरी थाने को दिए पत्र में स्पष्ट किया कि विद्युत मेंटेनेंस का कार्य ठेकेदार—अजहर इंटरप्राइजेज—को सौंपा गया था और पूरी जिम्मेदारी उसी की है। लेकिन ठेकेदार के संचालक अजहरुद्दीन ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया।

अजहरुद्दीन ने अपने लिखित पत्र में कहा है कि उनका काम अभी शुरू ही नहीं हुआ था और मृतक मोहे लाल सिंह उनका कर्मचारी नहीं था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पहले ही चार अधिकृत कर्मचारियों—आमुद्दीन, उदयपाल यादव, रज्जू खान और रमेश यादव—की सूची कंपनी को सौंप दी थी। ऐसे में यह सवाल और गहरा हो जाता है कि जब मृतक उस सूची में शामिल नहीं था, तो वह खदान के अंदर कैसे पहुंचा?

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क्या खदान में अनाधिकृत व्यक्तियों का प्रवेश इतना आसान है? यदि हां, तो सुरक्षा व्यवस्था किस स्तर पर है? और यदि नहीं, तो फिर यह गंभीर चूक किसकी है?

यह पूरा मामला अब केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि कई स्तरों पर लापरवाही और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश को उजागर कर रहा है। एक ओर प्रबंधन ठेकेदार पर जिम्मेदारी डाल रहा है, वहीं ठेकेदार खुद को पूरी तरह निर्दोष बता रहा है। ऐसे में सच्चाई आखिर क्या है, यह जांच का विषय जरूर है, लेकिन प्रथम दृष्टया कई सवाल सीधे प्रबंधन की ओर इशारा कर रहे हैं।

सबसे गंभीर सवाल यह भी है कि घटना के बाद तत्काल पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी गई? जानकारी के अनुसार, पुलिस को घटना की खबर अन्य स्रोतों से मिली, जबकि प्रबंधन की ओर से सूचना बाद में दी गई। क्या यह देरी भी तथ्यों को छुपाने की एक कड़ी थी?

मृतक के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका कहना है कि यदि सुरक्षा के उचित इंतजाम होते, तो शायद आज मोहे लाल सिंह जीवित होते। अब उनके परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस परिवार की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

स्थानीय लोगों और मजदूर संगठनों ने भी इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि खदानों में मजदूरों से बिना सुरक्षा उपकरणों के काम लिया जाना आम बात है और जब हादसा होता है, तो जिम्मेदारी से बचने का खेल शुरू हो जाता है।

घटना के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन भी किया और मुआवजे के साथ-साथ परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की। हालांकि पुलिस ने फिलहाल स्थिति को शांत करा दिया है, लेकिन आक्रोश अभी भी बना हुआ है।

पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और मेडिकल कॉलेज से मर्ग डायरी मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, यह भी संकेत मिले हैं कि प्रबंधन के अधिकारियों से पूछताछ की जा सकती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों—बी.के. जेना और संजय सिंह—पर कोई ठोस कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी कागजों में दबकर रह जाएगा?

बंगवार खदान की यह घटना केवल एक मौत नहीं, बल्कि सिस्टम की उन खामियों को उजागर करती है, जिनकी कीमत मजदूर अपनी जान देकर चुका रहे हैं। अब जरूरत है निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को इस तरह का दर्द न झेलना पड़े।

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