हरे कत्ल पर खामोश सिस्टम: नियमों को रौंदकर पेड़ की हत्या, विभागों की टालमटोल से उठे गंभीर सवाल
शहडोल। शहर की हरियाली पर एक और वार हुआ है और इस बार मामला सिर्फ एक पेड़ के कटने का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का है। वार्ड क्रमांक 12 स्थित अर्बन बेसिक स्कूल के सामने कृषि मंडी परिसर में वर्षों से खड़ा एक हरा-भरा पेड़ बिना किसी अनुमति के काट दिया गया। घटना दिनदहाड़े हुई, लोगों ने देखा, सूचना भी दी गई, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की चुप्पी और टालमटोल ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नियम केवल कागजों में हैं और जमीन पर उनका कोई असर नहीं है।स्थानीय लोगों के अनुसार यह पेड़ लंबे समय से क्षेत्र की पहचान था, जो न केवल छांव देता था बल्कि आसपास के वातावरण को भी संतुलित बनाए रखता था। इसके बावजूद एक दुकानदार द्वारा बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के इसे कटवा दिया गया। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस अवैध कटान के बाद भी प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। न तो किसी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और न ही किसी प्रकार का दंड निर्धारित किया गया, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि ऐसे मामलों में दोषियों का मनोबल बढ़ रहा है।
मामले की जानकारी जब संबंधित विभागों को दी गई, तो कार्रवाई के बजाय जिम्मेदारी से बचने का खेल शुरू हो गया। वन विभाग ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि क्षेत्र नगर पालिका के अंतर्गत आता है, इसलिए कार्रवाई की जिम्मेदारी उनकी है। वहीं नगर पालिका ने साफ तौर पर यह कह दिया कि पेड़ कटाई का मामला वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस तरह दोनों विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आए और अवैध कटान करने वाला बेखौफ बच निकला। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम में गहरे बैठे समन्वयहीनता या संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अहम तथ्य यह है कि राज्य सरकार द्वारा मार्च 2026 में जारी राजपत्र में स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था दी गई है कि शहरी क्षेत्रों में किसी भी पेड़ को काटने या उसकी छंटाई करने के लिए वन विभाग के अधिकृत अधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। बिना अनुमति पेड़ काटना सीधे तौर पर दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। इतना ही नहीं, यदि अनुमति नहीं मिलती है तो संबंधित व्यक्ति उप वनमंडल अधिकारी के पास अपील कर सकता है। इसके बावजूद शहडोल में इन नियमों की खुलेआम अनदेखी होना यह साबित करता है कि कानून का पालन कराने वाले ही उसे लागू करने में असफल साबित हो रहे हैं।
यह घटना केवल एक पेड़ के कटने की नहीं, बल्कि उस सोच की भी है जिसमें हरियाली को महत्व नहीं दिया जा रहा। एक तरफ सरकार हरियाली बढ़ाने के लिए अभियान चला रही है, पौधरोपण के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शहर के बीचों-बीच हरे-भरे पेड़ों को काटा जा रहा है और जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में शहडोल की हरियाली गंभीर संकट में पड़ सकती है।
फिलहाल पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नियम स्पष्ट हैं, जिम्मेदार विभाग मौजूद हैं, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर पर्दे के पीछे कोई और कहानी चल रही है? अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस “हरे कत्ल” के दोषियों पर कब और कैसी कार्रवाई करता है, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।